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साहित्य वार्षिकी रचना उत्सव-रचनाओं का जनपथ

इंडिया टुडे के रचना उत्सव में साहित्य के विभिन्न रंगों से सराबोर भोपाल के श्रोता संगीतमय प्रस्तुति से और भी तरोताजा हुए

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शुरैह नियाजी और संतोष पाठकनई दिल्ली, 11 April 2019
साहित्य वार्षिकी रचना उत्सव-रचनाओं का जनपथ यासिर इकबाल और पंकज तिवारी

भावनाओं, संवेदनाओं और ऊर्जा का विस्फोट हुआ 29 मार्च, 2019 को भोपाल के रवींद्र भवन में आयोजित इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी रचना उत्सव के दौरान. गजल की आबरू माने जाने वाले, देश के मशहूर शायर वसीम बरेलवी, दिग्गज व्यंग्यकारों और कवयित्रियों के साथ संगीत के सुर एक साथ सजे. रचना उत्सव का प्रारंभिक सत्र अंदाज-ए-बयां  वसीम बरेलवी की गजलों और नज्मों से गुलजार हुआ. इंडिया टुडे  के संपादक अंशुमान तिवारी बीच-बीच में उनसे समाज, राजनीति समेत अनेक मुद्दों पर खुलकर चर्चा की. जवाब में उन्होंने कई बार तरन्नुम में गजल सुनाई जो उनकी जिंदगी के खट्टे-मीठे अनुभवों का सार थी.

वसीम बरेलवी ने शुरुआत करते हुए फरमाया, ''शायरी और कविता पूरे जीवन की साधना है. मुशायरों और कवि सम्मेलनों में बहुत से रंग आते हैं, जाते हैं. मैं इसका 57-58 साल से गवाह हूं. लेकिन ऐसी महफिल, ऐसी सभा जिसमें एक-एक चेहरा अपने अंदर एक पूरी दास्तान रखता हो, जिसके पास सहित्य हो, अध्ययन हो, उनके सामने मैं कोशिश करूंगा कि मैं अपनी वही रचनाएं पेश करूं जिनमें ताली से ज्यादा आप की आंखों में चमक पैदा हो." आज के राजनैतिक माहौल पर उनके कुछ शेर थेः

जमीं तो जैसी है वैसी ही रहती है लेकिन, जमीन बांटने वाले बदलते रहते हैं;

मैं इक नदी की तरह बह रहा हूं सदियों से, अगर ठहर गया तो झील हो जाता;

वो एक बूंद जो फैलाव में समंदर थी, उलझ कर रह गई मिट्टी के चंद जर्रों में;

इस जमाने का बड़ा कैसे बनूं, इतना छोटापन मेरे बस का नहीं.

किसी जमीर वाले को दूसरे की उम्मीदों-अपेक्षाओं पर जीने का दबाव किस तरह होता है, उस भाव को समेटने वाली गजल को शायर ने तरन्नुम में सुनायाः अपने चेहरे से जो जाहिर है छुपाएं कैसे, तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएं कैसे; घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है, पहले ये तय हो कि इस घर को बचाएं कैसे; लाख तलवारें बढ़ी आती हों गर्दन की तरफ, सर झुकाना नहीं आता तो झुकाएं कैसे.

कार्यक्रम में नौजवानों की अच्छी-खासी मौजूदगी की ओर तिवारी के इशारा करने पर वसीम बरेलवी ने अपने कुछ नए शेर पेश किएः जवां नजरों पे कब उंगली उठाना भूल जाते हैं, पुराने लोग हैं अपना जमाना भूल जाते हैं; कोई टूटी-सी कश्ती ही बगावत पर उतर आए, तो कुछ दिन को ये तूफां सर उठाना भूल जाते हैं.

इस गजल का अगला शेर आपसी तकरार पर कुछ यूं थाः जिन्हें आपस में टकराने से ही फुर्सत नहीं मिलती, उन्हीं शाखों के पत्ते लहलहाना भूल जाते हैं.

उन्होंने आज के माहौल में बढ़ती उन प्रवृत्तियों की ओर भी इशारा किया, जिसमें हर कोई जिंदगी कुछ यूं जीना चाह रहा है, जहां किसी को किसी से कोई मतलब ही नहीं. इतना बिखराव संभाला नहीं जाता मुझसे, खुद को यू ट्यूब पे डाला नहीं जाता मुझसे; पांव जख्मों के हुए जाते हैं ऐसे आदी, अब तो कांटा भी निकाला नहीं जाता मुझसे; फिर जो मैं लौटना चाहूं तो जमीं को तरसूं, खुद को इतना भी उछाला नहीं जाता मुझसे; जिससे डर हो कि पलटवार भी कर सकता है, हाथ ऐसे पे तो डाला नहीं जाता मुझसे; प्यार की रात हो, छत पर हो तेरा साथ तो फिर, चांद को बीच में डाला नहीं जाता मुझसे; बात करता हूं जमाने को बदल देने की, अपना ही घर तो संभाला नहीं जाता मुझसे.

वसीम बरेलवी रामकथा गायक मोरारी बापू के भी पसंदीदा शायरों में  हैं. इस पहलू की ओर उनका ध्यान खींचे जाने पर उन्होंने इस संत को हिंदुस्तानियत की अमानत बताया.

उन्होंने अपना एक पुराना मशहूर शेर भी सुनायाः तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना खो चुका हूं मैं, कि अब तू मिल भी जाए तो तेरे मिलने का गम होगा. वसीम बरेलवी ने झूठ पर भी कई शेर सुनाए. लगभग एक घंटे से ज्यादा चले इस सत्र में उन्होंने श्रोताओं को पूरे समय बांधे रखा और खूब दाद बटोरी.

दूसरे सत्र व्यंग्य के रंग में ज्ञान चतुर्वेदी, शांतिलाल जैन और अनुज खरे मुखातिब हुए. खरे ने शुरुआत करते हुए बताया कि मोबाइल किस तरह से हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गया है और किस तरह से हम उसके बगैर एक मिनट भी नहीं रह पा रहे हैं. बेटा से ज्यादा अहम अब डेटा हो गया है. किस तरह से इस जमाने में लोगों की ख्वाहिशें भी बदल गई हैं. पहले वे कुछ और पाना चाहते थे लेकिन अब उनकी जिंदगी का मकसद कुछ और हो चुका है. इस नए जमाने पर तंज कसते हुए खरे के शब्द थे, ''आजकल आदमी ऑनलाइन है, लेकिन इनसानियत ऑफलाइन हो रही है."

अब बारी थी शांतिलाल जैन की. जैन बहुत संवेदनशीलता के साथ व्यंग्य लिखते है. उन्होंने अपने एक पाठ में प्लेन में बैठने और उसमें सफर करने को लेकर कुछ सहज जिज्ञासाओं की बात के जरिए गरीबों और साधन संपन्न लोगों का फर्क बयान किया. व्यंग्य में उन्होंने उस नेता की पीड़ा बताई जिसने चार बच्चों के बाद फैमिली प्लैनिंग कर ली थी. अब उसे महसूस हो रहा था कि कम बच्चे पैदा किए क्योंकि चुनाव में गठबंधन में ज्यादा सीटें मिल गई हैं.

सत्र के अंत में मशहूर व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी ने पाठ किया. उनकी रचना में हंसी नहीं थी बल्कि उनमें छिपे सवालों ने श्रोताओं को झकझोर दिया. उनकी राय थी कि सांप्रदायिक हिंसा पर हम बात करना कम पसंद करते हैं, लेकिन हिंसा करने से नहीं डरते. उन्होंने सांप्रदायिक हिंसा को लेकर तंज किया और कई सवाल उठाए. उनका सवाल था, ''क्या दंगे ईश्वर की अनुमति से होते हैं, हमने दंगों का हेडक्वार्टर भगवान के घर को क्यूं बनाया है? और भगवान है किसकी तरफ? आदमी की तरफ? हिंदू की तरफ या मुसलमान की तरफ?" उनके सवालों ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया. उन्होंने दंगों का मार्मिक चित्रण कर लोगों की भावुक कर दिया.

कविता पाठ के रूप में तीसरा सत्र था कविता समय. इसमें हिंदी कविता में सक्रिय, मध्य प्रदेश की दो युवा कवयित्रियों बाबुशा कोहली और अन्ना माधुरी तिर्की मौजूद ने अपनी नई-पुरानी रचनाएं पढ़ीं.

तिर्की मूलतः छत्तीसगढ़ के जनजातीय परिवेश से आती हैं लेकिन लंबे अरसे वे मध्य प्रदेश में हैं. उनकी कविताओं में आदिवासी समाज का जातिबोध, शहर में आकर रहने से उभरता द्वंद्व और वेदना सब मौजूद थे. उनके शब्द और पाठ के साथ चेहरे पर मौजूद भावों से भी उस तनाव को काफी कुछ पढ़ा जा सकता था.

बाबुशा अपनी कविताओं में खुद कविता को भी परिभाषित कर रही थीं. स्त्री विमर्श में जाए बगैर उन्होंने स्त्रियों की पीड़ा को भी संजीदगी से रेखांकित किया.

रचना उत्सव के दूसरे हिस्से की शुरुआत गीत संध्या में कवयित्री अनामिका अंबर ने की.

उन्होंने अपने गीतों में व्यंग्य बाणों का भी खूब इस्तेमाल किया. कभी दरिया के भीतर भी समंदर जाग उठता है, मिले सम्मान हीरे का तो पत्थर जाग उठता है; मेरा ईश्वर तेरा अल्लाह... मालिक एक है सबका, मेहरबानी हो उसकी तो मुकद्दर जाग उठता है. उनकी इस कविता के उत्तेजक पाठ को श्रोताओं ने सराहा. पुलवामा हमले पर लिखे अनामिका के गीत सेना तेरा करम.. तोड़कर सब भरम, घर में घुसकर के मारा मजा आ गया... को भी दाद मिली.

कार्यक्रम का आखिरी सत्र रंगत-संगत खासा मनोरंजक रहा. झारखंड की लोकगायिका मेघा श्रीराम डाल्टन ने संगीत की स्वरलहरियों के साथ सबसे पहले भगवान शिव की आराधना को रॉकस्टार के अंदाज में पेश कर वहां मौजूद युवाओं को झूमने पर मजबूर कर दिया. भक्ति के बाद मेघा ने अपना प्रसिद्ध गीत धीरे-धीरे गाया. भोजपुरी, चैती, कजरी, गारी गीतों की प्रस्तुति ने श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन किया.

अपनी प्रस्तुति देने के पहले मेघा ने रचना उत्सव के मंच पर इंडिया टुडे का शुक्रिया अदा करते हुए कहा, ''इंडिया टुडे से हमारा गहरा पुराना नाता है. मेरे घर में ज्यादा पढ़ाई-लिखाई नहीं थी लेकिन फिर भी इंडिया टुडे घर में अक्सर आती थी." इंडिया टुडे रचना उत्सव के मंच पर अपनी प्रस्तुति को इस लोकप्रिय गायिका ने अपने लिए अहम क्षण माना.

महादेवा के बाद मेघा ने झारखंड का खेल गीत गाया. उनकी अगली प्रस्तुति राजा कुर्ती सिलवादो मुलतानी, बटन चांदी का लगा दो  ने गांव की खुशबू बिखेर दी. ऐ मेरे हमसफर गीत समेत कुछ नए पुराने गीतों को उन्होंने मेडले की शक्ल में पेश किया. मेघा ने खड़ी समधनिया करके सिंगार, फगुनवां में रंग रस रस बरसे...के अलावा एक सौ साल पुराना गीत भी पेश किया. मेघा के गाने की ऊर्जा इतनी होती है कि कोई भी श्रोता सुस्ती से नहीं बैठ सकता. उनकी आवाज की खनक आपको अपनी ओर खींच ही लेगी.

कार्यक्रम खत्म होने का समय हो गया था लेकिन मेघा आंखें बंद करके एक के बाद एक गाने गाए जा रही थीं, जैसे कहीं खो गई हों, हाल आ गया हो उन्हें. रचना उत्सव में छह घंटे बाद भी लोगों का जोश कायम था. एक गायक की कामयाबी की इससे बड़ी निशानी भला और क्या हो सकती है!

साहित्य वार्षिकी रचना उत्सव के मंच पर संपादक अंशुमान तिवारी ने आयोजन के मकसद पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साहित्य वार्षिकी पढऩा ही नहीं, कुछ ऐसे मंच भी होने चाहिए जहां पर हम साहित्य की रचनात्मकता को उसकी पूरी ऊर्जा में प्रस्तुत कर सकें. ''कविता अगर प्रश्न पूछ सकती है, तो कविता ही उसका उत्तर भी दे सकती है. व्यंग्य यदि सवाल करता है तो व्यंग ही उसका उत्तर भी दे सकता है. अगर संगीत के पास अपने प्रश्न होते हैं तो अपने उत्तर भी होते हैं.

हमने यही प्रयास किया है कि साहित्य वार्षिकी को संवाद के मंच के तौर पर लेकर आएं. भोपाल रचनात्मकता के लिहाज से खासा सक्रिय शहर है. यहां संगीत है, नाट्य है, कविता है, कला है. आयोजन में लोगों की दिलचस्पी ने इसे साबित भी कर दिया है."

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