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आज की औरत का जिंदगीनामा

ये कहानियां स्त्री जीवन के विभिन्न पहलुओं को खंगालती हैं लेकिन नए संदर्भों और पृष्ठभूमि के साथ में.

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aajtak.in
कलावंती सिंहनई दिल्ली, 18 August 2014
आज की औरत का जिंदगीनामा

पढऩे के चलन के कम होने के दौर में सार्थक हस्तक्षेप की तरह हमारे सामने आती हैं नीला स्कार्फ की कहानियां. ये कहानियां देखने में आसान-सी लगती हैं पर जीवन को करीब से छूती हैं. इनमें सेंस ऑफ ह्यूमर जबरदस्त दिखता है, जो इन्हें मर्ज और इलाज दोनों बनाता है.

बिसेसर बो की प्रेमिका इस संग्रह की यादगार कहानियों में है. बिसेसर बो उर्फ चंपाकली विपन्न होते हुए भी अपनी स्थितियों से समझौता नहीं करती. उसका प्रतिवाद लगातार कुचले गए वर्ग में बची हुई जिजीविषा की दूब है, जो हर हाल में जीवित रहना जानती है. वह अपनी बात कहेगी, कहकर रहेगी, चाहे जो कुछ भुगतना पड़े. जहां बड़की कनिया पढ़ी-लिखी होकर, संपन्न परिवार की होते हुए भी चूहामार दवाई खाकर स्थितियों से पलायन करती दिखती है, वहीं बिसेसर बो मालिक की आंखों-में-आंखें डालकर उन्हें सच बताने का साहस रखती है.

रूममेट कहानी में नई स्त्री की जटिल जीवन-स्थितियों को बयान किया गया है. ये आत्मनिर्भर हैं, स्मार्ट हैं, लेकिन कहीं-न-कहीं घर-समाज से डरती हैं. कहीं किसी पर भावनात्मक रूप से आश्रित भी हैं. ये भी टूटती हैं. आधुनिक और आजाद दिखने वाली लड़कियों का यह अपना नरक है. लेकिन वे इससे बाहर निकलती हैं. ये कहानियां सिर्फ जीवन की कटुताओं और विषमताओं से भरी गाथाएं ही नहीं हैं, इनके पात्र मुश्किलों से हिम्मत के साथ उबरते हैं और फिर चल पड़ते हैं. देखवकी कहानी ऐसी ही कहानी है. बड़े शौक और अरमान से, बड़ी तैयारियों के साथ अपनी बेटी को गांव से दिल्ली लेकर आई चाची का दिल, तब टूट जाता है, जब लड़के वाले विवाह के लिए अनाप-शनाप शर्तें रखते हैं. गांव लौटकर क्या कहेंगे? इस चिंता में घुल रहे एक तरह की परिवार को चाची यह कहकर मुक्ति दिलाती है, “भक्क! एकदम ठीक नहीं था लड़का जी.” वे सिर्फ रिजेक्ट होना नहीं जानती, रिजेक्ट कर भी सकती हैं.

नीला स्कार्फ मियां-बीवी के बदलते संबंधों की कहानी है. जहां भौतिक चीजें जुटा लेने को तत्पर पति, पत्नी के पहले गर्भ को उसकी मर्जी के बिना ही खत्म करवा देता है. मां बनने को उत्सुक लड़की के मन में अपराधबोध की तकलीफ बहुत गहरी है. वह फेलोशिप के लिए बाहर जा रही है. लेकिन इसके लिए सिर्फ अपने पति को ही जिम्मेदार नहीं समझ्ती, “अब शांभवी किसी को दोषी नहीं ठहराएगी, सिवाए खुद के.”

मर्ज जिंदगी इलाज जिंदगी की शिवानी को यह जान आश्चर्य होता है कि उसके दुख और आशंकाओं को डॉक्टर ठीक-ठीक समझती है. अपनी किस्मत भी अपनी, अपने फैसले भी अपने. लिव-इन कहानी में अवि और नैना ब्लॉग और डायरी के माध्यम से अपनी अपनी-बात कहते हैं. यह विवाह से पहले साथी के साथ रहकर उसे ठीक तरह से जान लेने को आतुर नई पीढ़ी की कहानी है. लेकिन अंत में नायक इस निष्कर्ष पर पहुंचता है, “अगर शादी दुनिया का सबसे वाहियात इंस्टीट्यूशन है तो लिव-इन रिश्तों के बरबाद हो जाने की कहानी.” कहानियों में अंत तक जिज्ञासा बनी रहती है.

हिंदी में किताबें पढऩे वाले लगातार कम हो रहे हैं, नई पीढ़ी के पास फुरसत से किताबें पढऩे का समय ही नहीं है. यह फटाफट नूडल्स वाली पीढ़ी है. अब इसे साहित्य से कैसे जोड़ा जाए, यह महत्वपूर्ण है. नीला स्कार्फ संग्रह को तभी सफल माना जाएगा जब यह नए पाठकों को अपने साथ जोड़ पाने में सफल होगा. हालांकि किताब जहां मौजूदा जिंदगी के किस्सों को समेटे हुए है, वहीं कुछ कहानियों में पात्रों के चरित्र का विस्तार पूरी तरह नहीं हो पाया है और थोड़ी जल्दबाजी नजर आती है. अंग्रेजी के शब्दों का अत्यधिक प्रयोग भी कहीं-कहीं खटकता है लेकिन कन्टेम्पररी फील देने के लिए सही लगता है.

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