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लक्ष्मीनामाः वाणिज्य मंत्र

जब वेद लिखे गए, उस समय तक भूमि और समुद्र, दोनों ही मार्गों से लंबी यात्राओं के कई संदर्भ मिल जाते हैं.

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संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर 28 January 2019
लक्ष्मीनामाः वाणिज्य मंत्र लक्ष्मीनामाः धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की महागाथा

ब्लूमस्बर्ग इंडिया से प्रकाशित लक्ष्मीनामा किताब के लेखक अंशुमान तिवारी और अनिंद्य सेनगुप्त हैं.

यह केवल भारत के आर्थिक और वाणिज्यिक इतिहास की बात नहीं है. लक्ष्मीनामा में पौराणिक कथाओं और इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने वाली प्रमुख शख्सियतों (राजाओं, रानियों, व्यापारियों, आक्रमणकारियों, फकीरों, नाविकों, राजकुमारियों, व्यापारियों, स्वर्ण व्यापारियों और अन्य साहसी व्यक्तियों) से जुड़े प्रसंगों को इस तरह पिरोया गया है कि इससे प्राचीन भारत (सही मायनों में कहें तो विश्व) से लेकर वर्तमान दौर के व्यापार, व्यवसाय और अर्थव्यवस्था का रोचक विवरण मिल जाता है. यह किताब आधुनिक भारत के भौगोलिक क्षेत्र में पडऩे वाले विभिन्न साम्राज्यों और समाज के साथ-साथ कुछ पड़ोसी देशों के भी व्यापार, प्रणाली, लेन-देन और अर्थव्यवस्था का लेखा-जोखा पेश करती है.

लेखक गिल्गामेश (सुमेरियाई सम्राट) और पृथु (विष्णु के अवतारों में से एक) के मिथकों से शुरुआत करके हमें राम रहीम और उसके साम्राज्य तक की यात्रा पर लेकर जाते हैं. व्यापार और उद्योग को धर्म ने किस प्रकार प्रभावित किया है, इसमें इसका समुचित विश्लेषण तो हुआ ही है, साथ ही रियासतों, राज्यों, समाज और उनके नवाचारों का भी मंथन हुआ है.

कुषाणों से लेकर गुप्त वंश के राजाओं तक, दक्षिण के साम्राज्यों (पल्लवों, चोलों) से लेकर दिल्ली के सुल्तानों (तुगलकों, लोधियों), मुगलों, रॉबर्ट क्लाइव और ईस्ट इंडिया कंपनी तक, ब्रिटिश साम्राज्य और आजादी के बाद के वर्षों तक भी—पुस्तक विभिन्न साम्राज्यों की आर्थिक और व्यापारिक परंपराओं का गूढ़ विश्लेषण करती है.

किताब मुख्य रूप से वाणिज्य-व्यवहार के बारे में बात करती है. सामान्य तौर पर भारत के शासकों और सरकारों की मानसिकता संरक्षणवादी नहीं रही है. अगर वैश्विक अर्थव्यवस्था जैसी कोई व्यवस्था नहीं भी थी तो भी, भारतीय समाज का पास-पड़ोस के साथ-साथ दूर के देशों से भी व्यापारिक जुड़ाव था.

हड़प्पा जैसे स्वावलंबी समाज में भी व्यापार के प्रमाण मिलते हैं. यहां तक कि वेदों में भी भूमि के साथ-साथ समुद्री यात्राओं के संदर्भ मिलते हैं. वैसे, लेखक का मानना है कि यह बहुत दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि ऋग्वेद में बड़ी नावों से जलमार्ग से यात्रा के जो संदर्भ हैं, वे समुद्री यात्राओं के लिए हैं या फिर नदियों के लिए क्योंकि प्राचीन भारत में नदियों से यात्रा भी बहुत कठिन थी. बाद के साम्राज्यों ने दूर-दराज की यात्रा की और व्यापार का विस्तार किया. समुद्रों और महासागरों को पार करने में चोलों ने विशेष रूप से साहस का परिचय दिया है.

 इस विषय पर केंद्रित कोई किताब उबाऊ हो सकती थी. लेकिन मिथकों, लघु कथाओं, रोचक आत्मकथाओं का, उस दौर की आर्थिक और व्यापारिक परिस्थितियों के साथ तारतम्य बनाते हुए लेखक इसे जीवंत बनाए रखने में सफल रहे हैं. प्रत्येक अध्याय को इस प्रकार पेश किया गया है कि वह अपने आप में अलग और संपूर्ण प्रतीत होता है. हर अध्याय आपको एक नई यात्रा पर लेकर जाएगा.

पुस्तक के कुछ अंश

धर्म, अर्थ और समाज का अनकहा आख्यान

भारतीय समाज धर्म, अर्थ और आस्था के अनूठे समन्वय की बेहतरीन मिसाल है. लक्ष्मीनामा अतीत में जाकर इसी परंपरा की कई रोचक, तथ्यपरक और अनकही कहानियों को सामने लाती है, जो वर्तमान से भी जुड़ी हुई हैं. इसका फलक भारत के साथ-साथ दुनिया की व्यापारिक परंपरा तक फैला है

गिल्गामेश नामक प्रतापी राजा और उसके मित्र इंकदू की कहानी दुनिया की पहली कृषि क्रांति और व्यापार की शुरुआत की गाथा है. एपिक ऑफ गिल्गामेश मानव इतिहास की पहली प्रतिष्ठित साहित्यिक कृति भी है. यह महाकाव्य जिस समय रचा जा रहा था, उस समय सुमेरियन लोग मनुष्य को समृद्ध भविष्य के सफर पर भेजने का पहला कदम उठा रहे थे.

सुमेरियन ही थे जिन्होंने दजला और फरात नदियों की घाटियों में पहली बार जरूरत से ज्यादा अनाज उगाया. यह अतिरिक्त उपज समृद्ध भविष्य की उम्मीद का पहला उत्पादन था.

जरूरत से अधिक उत्पादन के साथ व्यापार शुरू हुआ और भविष्य के दरवाजे खुल गए. कृषि क्रांति से पहले तक वस्तुओं का लेन-देन होता था. विनिमय के लिए कोई मुद्रा नहीं थी. व्यापार ने रिश्तों को भरोसे के सिक्कों (मुद्रा) से जोड़ दिया.

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दुनिया में बिकने वाले दस में से आठ हीरे बेल्जियम के शहर एंटवर्प केजरिये आते हैं और जहां हीरे के कारोबार पर ऑर्थोडाक्स यहूदी और पालनपुरी जैन समुदाय का ही राज है. एंटवर्प के डायमंड डिस्ट्रिक्ट की 500 मीटर लंबी होविनियर्स स्ट्रीट में सालाना 16 अरब डॉलर के हीरों का कारोबार होता है. यहां आपको गुजराती और हिब्रू ही सुनने को मिलेगी.

पालनपुर, गुजरात के बनासकांठा जिले में एक कस्बा है, जहां के व्यापारी अपनी परंपराओं और सिद्धांतों के लिए अलग पहचान रखते हैं. कहते हैं कि गुजरात के नवाब ने पालनपुर के जैनियों को 1930 में यहां राजाओं के लिए हीरा खरीदने भेजा था. इसके बाद यह आवाजाही नियमित हो गई.

हेसिडिक यहूदी एंटवर्प के इस कारोबार पर अरसे से काबिज थे. पालनपुरी जैनों ने 1970 में अपेक्षाकृत कमजोर क्वालिटी के कच्चे हीरों का कारोबार शुरू किया. पिछले 20 साल में एंटवर्प के हीरा कारोबार में पालनपुरी जैनों का हिस्सा 25 से 65 फीसदी हो गया जबकि यहूदी 70 से 25 फीसदी पर आ गए.

सन् 2000 में एंटवर्प के हीरा कारोबार में एक बड़ा बदलाव आया जब इस कारोबार की गवर्निंग काउंसिल में छह में से पांच सीटों पर पालनपुरी जैन काबिज हो गए.

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अनाचारी टैक्सखोर राजा और ऋषियों

का न्याय

भारत के मिथकीय साहित्य में सबसे चर्चित प्रेमकथा एक टैक्सखोर राजा की है जिसे समाज ने ऋषियों की मदद से सत्ता से उतार फेंका. मत्स्यपुराण और महाभारत की यह कथा पुरुरवा-उर्वशी की है. स्वर्गलोक की अप्सरा उर्वशी जब अपनी शर्तें टूटने के कारण पुरुरवा को छोड़कर चली गई तो राजा पागल हो कर अन्यायी और अत्याचारी हो गया. राजपाट चौपट हो गया और उसने जनता पर भारी टैक्स लाद दिये. राजा के अन्याय से पीड़ित प्रजा को तब मुक्ति मिली जब ऋषियों ने पुरुरवा को सत्ता से उतारकर उसके बेटे आयु को राजा बनाया.

कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में कथात्मक संदर्भ कम ही  दिये हैं पर टैक्सखोर राजा के तौर पर पुरुरवा का उदाहरण वहां मौजूद है.

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मसालों का महासमुद्र

केरल के समाज में, जहां परंपरागत रूप से कोई व्यापारिक जाति नहीं थी, ब्राह्मण समुदाय, ईसाइयों को नए वैश्य के रूप में स्वीकार करने के लिए उत्सुक थे क्योंकि व्यापार उनके धार्मिक विरोधियों-बौद्धों और जैनों के हाथों में था.

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2016 में, लंदन के अखबार 'संडे टाइम्स' ने डेविड और साइमन रूबेन को ब्रिटेन के सबसे अमीर व्यक्तियों का दर्जा दिया, जिनकी संपत्ति 13 बिलियन ग्रेट ब्रिटेन पाउंड से अधिक थी. यह संपत्ति लंदन के प्रॉपर्टी बाजार और रूस में एल्युमीनियम के कारोबार सहित कई व्यवसायों से पैदा की गई थी.

19वीं सदी के मध्य तक, रूबेन परिवार, कई अन्य अमीर और उद्यमी बगदादी यहूदियों की तरह बम्बई में रहते थे.

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कुबलई खान का शिवलिंग

दक्षिण चीन का क्वांजू आज एक हलचल भरा औद्योगिक शहर है. यह इसके प्रसिद्ध दक्षिणी समकक्ष गुआंगजू की छाया जैसा है. मध्यकालीन क्वांजू एशिया में सबसे व्यस्त बंदरगाहों में से एक था, जहां 800 साल पहले से तमिल व्यापारी रहते थे. इस चीनी शहर में और इसके आसपास एक दर्जन से अधिक हिंदू मंदिरों के अवशेष हैं. इन मंदिरों में से कुछ में आज भी स्थानीय लोग हिंदू देवी की मूर्तियों की पूजा करते हैं, वे उन्हें एक  महिला बोधिसत्व गौइनिन मानते हैं! यहां स्तंभों पर हिंदू देवी-देवताओं की छवियां उकेरी गई हैं. यहां तक कि यहां के सबसे बड़े बौद्ध मंदिर काइयन में भी ऐसे स्तंभ पाए गए हैं.

यहां से कुछ दूर बांस के पेड़ों के एक पार्क में कई मीटर ऊंचा शिवलिंग है जो निश्चित ही मध्यकालीन क्वांजू के दो बड़े हिंदू मंदिरों में से एक से लाया गया होगा. पत्थर का शिलालेख भी एक निजी निवास से पाया गया, जो मूल रूप से इन दो मंदिरों में से एक का होना चाहिए.

यह शिलालेख बताता है कि शिव मंदिर का नाम राजा कुबलई खान (मंगोल सुल्तान) के नाम पर तिरू-के-कन्यास्वरम रखा गया है. मंदिर का निर्माण एक सामबंधापुरुमल ने किया. वह एक शैव धार्मिक नेता रहा होगा.

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2006 में एक बहुत बड़े कछुए 'अद्वैत' की कलकत्ता के चिडिय़ाघर में मौत हो गई. यह विशालकाय अलडाब्रा कछुआ, करीब 250 साल पहले सेशल्स से कलकत्ता लाया गया था. इसे रॉबर्ट क्लाइव को भेंट किया गया था, क्लाइव ने ब्रिटिशों के लिए बंगाल जीता था और लूटपाट के दौर की शुरुआत की.

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