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क‌िताबें/ आत्मकथा-क्रूरता पर से छंटती धुंध

तैमूर ने सुना तो हाफिज शीराजी, मौलाना रूमी और दूसरे अध्यात्मवादियों को भी ध्यान से, पर सब धर्मों और इस्लाम को बराबर मानने के उनके तर्कों से वह राजी न था

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शिवकेश मिश्रनई दिल्ली, 04 April 2019
क‌िताबें/ आत्मकथा-क्रूरता पर से छंटती धुंध तैमूर लंगः आपबीती

मध्यकालीन इतिहास के किरदारों में तैमूर लंग के बारे में न जाने कितने मिथक और किस्से-कहानियां जनमानस में हैं. पर जब तैमूर खुद अपने अंदर-बाहर के गढ़े जाने की गवाही दे तो सारी धुंध अपने आप साफ होने लगती हैः दुनिया को जीतने की जिद; दोनों हाथों से हथियार और कलम चलाना; 3,000 जल्लाद पालना; दुस्साहसी से क्रूर और क्रूरतर होते जाना; कत्ल के बाद फूटती रक्तधाराओं को देखकर आह्लादित होना; किसी भी धर्म को इस्लाम से बड़ा न मानना; मंदिर-मूर्तियां तोडऩे से परहेज करना; विद्वानों, कलाकारों, धर्मगुरुओं का आगे बढ़कर सम्मान करना.

तैमूर लंग की यह आपबीती पहली दफा हिंदी में आई है, वह भी खासा चक्कर खाते हुए. फारसी से अंग्रेजी में (1783 में) आने में इसे करीब 400 साल लगे थे. फिर उर्दू में अनुवाद हुआ. इन भाषाओं के संस्करणों की भारत में उपलब्धता ज्यादा दिखी नहीं है, जबकि तैमूर के वंश में एक सदी बाद आए बाबर की आत्मकथा बाबरनामा खासी चर्चित है. खैर अब उर्दू-फारसी की जानकार संजना कौल ने इसे करीब 550 पन्नों में सलीके से (थोड़ा ज्यादा) हिंदी में पेश किया है.

तैमूर ने चीन पर हमले की तैयारी के दौरान जिंदगी के आखिरी मकाम पर अपना किस्सा लिखा. कंठस्थ कुरआन की एक-एक आयत पर धार्मिकों से बहस करता और उन्हें विद्वान पाने पर इनाम देता लेकिन मौलाना रूमी और दूसरे अध्यात्मवादियों की लानत-मलामत करता. उसके इस रवैए पर उसकी आपबीती के उर्दू अनुवादक डॉ. हमीद यजदानी भी अपना गुस्सा रोक न सके. अपनी टिप्पणी में वे जोड़ते हैं, ''ऐसा इनसान जिसने...इतने नरसंहार किए कि इस्लाम के माथे पर और इनसानियत के लिए बड़ा कलंक का टीका साबित हुआ, किस मुंह से मौलाना रूमी का विरोध करता है...तैमूर जैसा आदमी तो उनकी जूती की धूल की भी बराबरी नहीं कर सकता."

तैमूर की आत्मकथा पढ़ते हुए आप पहली बार खाल उधेडऩे, खौलते तेल में मारने और भुस भरने जैसी क्रूर और नारकीय यातनाओं का ब्यौरा पाते हैं. इतिहास के शायद इस सबसे क्रूर शासक का क्रूरतम कृत्य सब्जवार शहर पर कब्जे के वक्त का है, जब वह जिंदा बचे नागरिकों को मृतकों के सिर काटकर लाने का आदेश देता है. वह लिखता है, ''बहुत जल्दी डेढ़ लाख इनसानी सिर दोनों तरफ जमा हो गए. मैं चाहता था इन सिरों से हरम जैसे मीनार बनवाऊं और जिन पर रात को आग भी जलाई जाए."

यह किताब हमें उस वक्त के मध्य पूर्व और यूरेशियाई भूगोल के अलावा वहां के कबायली जीवन और उनकी संस्कृतियों से रू-ब-रू कराती है. मजहबी कानून तैमूर के लिए सबसे ऊपर हैं लेकिन बीच-बीच में किस्से की लय को जैसे तोड़ते हुए वह आपबीती के पाठकों से कहता है कि जिसे शासन करना हो, उसे बेरहम होना पड़ेगा. पहली हत्या वह 14 की उम्र में मदरसे के एक सहपाठी की करता है जो उससे समलैंगिक संबंध चाहता है. 19 की उम्र में, लौंडा कहने पर वह समरकंद के शासक के सैन्य मुखिया को मार डालता है. इसी तरह के वाकयों और एक सपने से वह अर्थ निकालता है कि अल्लाह उसे शासक बनाना चाहता है.

तैमूर का हिंदुस्तान का सफर और उसकी लूटमार सौ से ज्यादा पन्नों में है लेकिन हिंदुस्तान की समृद्धि और उसके प्रति अपने लालच का जिक्र वह शुरू से करता आया. दिल्ली के पास एक पड़ाव के दौरान दलितों का एक दल उसके सामने आकर अपने पूरे समाज की दयनीयता जताते हुए मुसलमान बनने की इच्छा जताता है. तैमूर ने बड़े पैमाने पर उनका न सिर्फ धर्मांतरण कराया बल्कि क्वेटा में उनके लिए जमीन का इंतजाम कराया. पर दिल्ली के किले का एक वाकया दिलचस्प है. एक मंदिर का पुजारी कहता है कि अगर उसने हमला किया तो उसकी उम्र सात साल कम हो जाएगी. तैमूर उसकी 'बचकानी बात' पर हंसता है लेकिन आखिरी दिनों में किसी और के भी ऐसा बताने पर वह हिसाब लगाता है और उस पुजारी को याद करता है.

विडंबना देखिए कि उस वक्त बीसियों मुल्क जीत चुके तैमूर ने जन्मभूमि कैश में जश्न मनाने के लिए जब दुनिया के राजाओं को न्यौता भेजा तो चीन के बादशाह ने उसका सारा नजला उतार दिया. जवाबी चिट्ठी में उसके शब्द थे, ''तैमूर लंग! मेरे राज्य के चौधरी तुझसे ज्यादा धनवान और लोकप्रिय हैं.

धन और शक्ति की दृष्टि से अगर तू मेरे किसी एक नंबरदार के रुतबे तक भी पहुंच गया, तब मैं तुझे इजाजत दूंगा कि तू मुझे अपने घर आने का न्यौता दे...तेरे लिए यही ठीक है कि तू खुद को मेरे चाकरों में गिनता रहे, कभी अपनी औकात से ऊपर उठने की सोचना भी नहीं." बचपन से ऐसे 'अपमानों' का बदला लेना जैसे उसकी नियति बन चुकी थी. चीन को भी सबक सिखाने निकल पड़ा पर जा फंसा क्रूर इतिहास के पन्नों में.

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