एडवांस्ड सर्च

पुस्तक समीक्षा-निम्नवर्गीय दुनिया के किस्से

तराना की कहानियों में आजीविका के लिए परेशान पात्र बहुत आए हैं. इनमें छोटे बच्चे (बाल मजदूर) हैं तो काम पा चुके लेकिन शोषण के आगे बेबस नौकरीशुदा युवा भी. पर्यटन स्थल पर शायरी कहकर तुकबंदियां सुना रहे एक छोटे लड़के की कहानी 'राजू शायर' है जिसमें उस लड़के के मन में कलाकार होने का दर्प आया है.

Advertisement
aajtak.in
पल्लव 26 September 2019
पुस्तक समीक्षा-निम्नवर्गीय दुनिया के किस्से एक सौ आठ कहानी संग्रह

राजपाल ऐंड सन्ज से प्रकाशित कहानी संग्रह एक सौ आठ के लेखक तराना परवीन हैं.

समाजशास्त्रीय शब्दावली में निम्नवर्गीय माने जाने वाले लोग भूमंडलीकरण के बाद साहित्य की दृष्टि से भी ओझल से हैं. विमर्शों ने अस्मिताओं का ऐसा आरोपण किया कि गरीब की गरीबी से ज्यादा उसकी जाति महत्वपूर्ण हो गई. प्रगतिशील और जनवादी कथाकारों ने रूढि़ की तरह निक्वन वर्ग की कथाएं लिखी थीं लेकिन युवा पीढ़ी ऐसी किसी भी रूढि़ से मुक्त है. तराना परवीन का पहला कहानी संग्रह 'एक सौ आठ' भारतीय समाज के उस चेहरे को उद्घाटित करता है जिसके पास भूमंडलीकरण की संपन्नता का कोई हिस्सा अब तक नहीं पहुंचा जबकि उसकी माया का आकर्षण उनमें भी आकार ले चुका है.

संग्रह की शुरुआत एंबुलेंस चलाने वाले एक साधारण ड्राइवर की कहानी से हुई है जो बीमारों और मुर्दों को ढोते-ढोते थक गया है. बदलाव के लिए वह ऑटो रिक्शा चलाने लगा लेकिन यहां भी एक दुर्घटना में घायल महिला को देखकर उसकी संवेदना फिर जाग जाती है. 'चतुर्थ श्रेणी' में सफाई कर्मचारियों की भर्ती की खबर से कच्ची बस्ती के एक परिवार में उत्साह, ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता का वातावरण है किंतु इनको पता ही नहीं है कि व्यवस्था भर्ती के नाम पर बेगार करवाना चाहती है. भौतिक आवश्यकता और उपभोग की भूख का द्वंद्व 'झुर्रियों के दाम' में आया है तो नए जमाने की बदल रही स्वाभिमानी स्त्री का सुंदर चित्र 'वी जी आर' में है. 'वी जी आर' जैसी कहानियां स्त्री विमर्श के बावजूद कभी-कभार पढऩे को मिलती हैं जिनमें स्त्री का स्वाभिमानी और आकुंठित स्वर पूरे तेज के साथ आ रहा हो. यहां सामूहिक बलात्कार से उबर रही एक युवती की कथा है जो वैवाहिक विज्ञापन में इस सच्चाई को लिख देना जरूरी समझती है.

तराना की कहानियों में आजीविका के लिए परेशान पात्र बहुत आए हैं. इनमें छोटे बच्चे (बाल मजदूर) हैं तो काम पा चुके लेकिन शोषण के आगे बेबस नौकरीशुदा युवा भी. पर्यटन स्थल पर शायरी कहकर तुकबंदियां सुना रहे एक छोटे लड़के की कहानी 'राजू शायर' है जिसमें उस लड़के के मन में कलाकार होने का दर्प आया है. अफसोस कि हमारी व्यवस्था में इनकी कोई गुंजाइश नहीं और उसे भी अंत में कार साफ करने का पेशा चुनना पड़ता है. 'रद्दीवाला' में इस मजदूर जीवन का ही एक और चित्र है तो लिटमैन की बेबसी 'डिब्बाबंद' में आई है.

यह वर्जनाओं के टूटने का समय है और तराना परवीन में अपने आसपास के साधारण जीवन संसार में इस बदलाव को देख सकने की समझ है. वे कहानी को रिपोर्ट या समाजशास्त्रीय विवरण बनने से बचा सकी हैं क्योंकि उनके पास अपने पात्रों की ठेठ बोली—बानी मौजूद है. 'चतुर्थ श्रेणी' का यह अंश द्रष्टव्य है, ''दिन भर घर में पड़ा रेवे है, चरता रेवे है या इधर उधर रबड़ता फिरे है, कबी काम करने की सोची तेने? हरामखोर हड्डी हो गई है तेरी. इस नौकरी के लिए तो मैं और तेरा बापू भी, अगर चावे तो एचएम दोनों ही फारम भरेंगे.''

***

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay