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एक पहलू कॉमिक रिलीफ से परे

भारतीय रंगजगत की एक अहम शख्सियत बंसी कौल घोर मानवी त्रासदी को लेकर कॉमिक रिलीफ वाले रवैए पर उंगली रखते हैं. उनके हिसाब से यह हंसी-मजाक का नहीं. गहरे सोच-विचार और पहल का वक्त है.

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aajtak.in
शिवकेश मिश्र 08 April 2020
एक पहलू कॉमिक रिलीफ से परे बंशी कौल

वक्त ये सख्त है. न तो नाटकों के शो, न रिहर्सल और न बेमकसद भटकने, नुक्कड़-चौराहे पर चाय चुक्कड़ की गुंजाइश. थिएटर वालों ने भी एक अरसा इंतजार के बाद अपने अंदाज में जुगत निकालनी शुरू कर दी है. अपने नाटकों के वीडियो, उनके छोटे-बड़े विलाप साझा करना. रंगकर्मियों के कई व्हाट्स ऐप ग्रुप पर ग्रीक नाटकों से लेकर हिंदी, मराठी, अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं के साहित्य पीडीएफ और लिंक जमकर साझा किए जा रहे हैं. अभिनेता जीसान अयूब मशहूर व्यंगकार हरिशंकर परसाई के व्यंग्य महात्मा गांधी की चिट्ठी पहुंचे का पाठ करते हुए दूसरे रंगकर्मियों से ऐसा ही कुछ पढ़ने की अपील कर रहे हैं.

रंगमंच और सिनेमा के वरिष्ठ अभिनेता राकेश बेदी मोबाइल पर पढ़ी अपनी एक हास्य-व्यंग्य कविता शेयर कर रहे हैं-इसीलिए तो मोदी जी को चीख-चीखकर कहना पड़ रहा है. लेकिन भारतीय रंगजगत की एक अहम शख्सियत बंसी कौल घोर मानवी त्रासदी को लेकर इस तरह के कॉमिक रिलीफ वाले रवैए पर उंगली रखते हैं. उनके हिसाब से यह हंसी-मजाक का नहीं. गहरे सोच-विचार और पहल का वक्त है.'टीवी वालों ने तो पहले ही इसे तमाशा बना दिया है. उन्हें क्यों लगता है कि बॉलीवुड के किसी ऐसे-गैरे की बात को पूरा देश गंभीरता से सुनता है?

अरे यार, इस वक्त देश के ऐसे डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, लेखकों, यहां तक कि पत्रकारों को सामने लाए जाने का वक्त है, जिनकी बात को इस देश की जनता इस वक्त देश के ऐसे डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, लेखकों, यहां तक कि पत्रकारों को सामने लाए जाने का वक्त है, जिनकी बात को इस देश की जनता इसे संजीदगी से ले. और ये लोग इस विकट संकट के बारे में ठीक से उसे समझाएं.उसकी जिम्मेदारियों से आगाह करें.

यह क्या है कि बॉलीवुड का कोई भी हीरो-हीरोइन आकर किसी को भी कहने लगे, आप ऐसा नहीं करते तो देश के दुश्मन हैं. आप पुलिस वाले हैं क्या? हीरो-हीरोइन को कुछ करना ही है तो उन्हें लोगों से सोशल मीडिया पर एक्सपर्ट बनने से बाज आने की सीख देनी चाहिए. यहां तो हर कोई कोरोना से निपटने का फार्मूला लिए चला आ रहा है.''कौल कहते हैं कि यह कॉमिक रिलीफ का वक्त बिल्कुल नहीं है. '' आप देखिए कि कितना बड़ा तबका है, जिसके सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट आ खड़ा हुआ है.

रिक्शे, वाले रेहड़ी वाले, छोटे-छोटे पेशे कर परिवार पालने वाले लोग. उनके लिए हमें100-50 रु. के योगदान से उनका कुछ इंतजाम करना चाहिए. सारी कलाओं के लोग जो भी पढ़ना, देखना, सुनना हो, करें लेकिन इस वक्त तो देश के नागरिक के नाते उन्हें आगे आने की जरूरत है. यह हट जा, जा जा कोरोना गाने का वक्त नहीं है.

यह हमारे भीतर संवेदनशीलता को जगाने का वक्त है. कोरोना ने देशों के बीच की सारी सीमाओं को ही मिटा दिया है. इस त्रासदी से गुजरने के बाद एक नई दुनिया बनेगी. यह दुनिया भाईचारे की दुनिया, संवेदनाओं से भरी दुनिया हो. इस बारे में हमें सोचना चाहिए.तभी हम भविष्य में इस तरह की त्रासदियों से निपट पाएंगे.

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