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फुसरतः करो न दिल की बात

वैश्विक महामारी ने साहित्यिकों की संवेदना को भी झकझोरा. उनकी राय में कोरोना के असर ने रचनाओं की जमीन को हमेशा के लिए बदल डाला.

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aajtak.in
शिवकेश मिश्रनई दिल्ली, 06 April 2020
फुसरतः करो न दिल की बात आलोक धन्वा

हरियाणा और दिल्ली की ओर से सिर पर गठरी और गोद में बच्चे चिपकाए, राष्ट्रीय राजमार्ग 9 पर कतारों में चले जा रहे प्रवासी मजदूर कथाकार ममता कालिया को 1946 की याद दिला रहे थे, जो गाजियाबाद में उसी के किनारे एक सोसाइटी में रहती हैं. ''उस वक्त बंटवारा हुआ नहीं था लेकिन चारों तरफ उसकी तैरती चर्चाओं से ही एक माहौल बन गया था. पाकिस्तान की ओर से हिंदुओं को मैंने इसी तरह झुंड में आते देखा था.

कोरोना महामारी ने जिस तरह दुनिया को धीरे-धीरे अपनी कुंडली में लपेटा है, उससे महाशक्तियों के मुंह से भी झाग आने लगा है. कोरोना वायरस मनुष्यों के फेफड़ों में पानी भर रहा है, दूसरी ओर खासकर लेखकों-रचनाकारों की सोच के कैनवास को बुनियादी स्तर पर बदले दे रहा है. ''यह तृतीय विश्वयुद्ध है,'' ''यह चीन का शक्ति परीक्षण है,'' ''यह (मजदूरों का बहिर्गमन) कोरोना से ज्यादा सरवाइवल का मुद्दा है'' जैसी टिप्पणियां लेखकीय बिरादरी में सुनी जा सकती हैं.

मराठी में दलित चेतना के बड़े लेखक शरण कुमार लिंबाले रहते पुणे में हैं. 22 मार्च को जनता कक्रर्यू से एक दिन पहले ही वे शोलापुर (महाराष्ट्र) में अपने मूल गांव हन्नूर गए थे, तब से वहीं फंसे हैं. फोन पर पीछे से आती मुर्गों की बांग के बीच वे थोड़ा अनमने-से कहते हैं, ''कोई किताब भी नहीं लाया था. खाली हाथ. अपने भीतर के लेखक के बारे में तो क्या ही बताऊं! मैं शून्य मानसिकता में पहुंच गया हूं. कुछ सूझ ही नहीं रहा.''

यह त्रासदी लेखकों को भी साहित्यिक स्मृतियों में उतरने और क्लासिक्स को खंगालने का मौका दे रही है. पटना में एकांत में जी रहे हिंदी के 72 वर्षीय कवि-चिंतक आलोक धन्वा शरत्चंद्र के वृहद उपन्यास श्रीकांत का जिक्र करते हैं, जिसमें पिछली सदी के दूसरे दशक में बंगाल में फैले प्लेग का वर्णन है, ''उसमें एक जगह लिखा है कि लोग गांव में एक लाश दफनाकर लौटते और पीछे 3-4 तैयार मिलतीं...पूर्वी उत्तर प्रदेश में खुद मेरे बाबा भी प्लेग से मरे थे.

100-100 गांव एक कतार से साफ हो गए थे, ऐसा बताया गया.'' कालिया इस कड़ी में श्रीकांत के अलावा श्रीनरेश मेहता के उपन्यास उत्तर कथा को जोड़ती हैं जिसमें साठ के दशक के हैजे का कारुणिक चित्रण है.

उसमें एक मां ससुराल से आई बेटी को दूर से ही ड्योढ़ी पर रोककर वापस भेज देती है. उसकी सोच यह है कि घर में फैला हैजा उसे भी न अपनी जद में ले ले.'' उसी से जोड़कर जरा आज के दृश्यों को देखें, जहां अपने गांव-जवार में वापस पहुंच रहे प्रवासी मजदूरों को गांव की देहरी पर रोका और शक की नजर से देखा जा रहा है कि कहीं उनमें कोरोना वायरस का संक्रमण तो नहीं है.

क्या इस तरह की भीषण बीमारियों के पेट में भविष्य के लिए उम्मीद की कोई चमक भी होती है? क्या इसमें ऐसा कुछ निहित होता है जो इनसानी उद्यमशीलता को चैलेंज करे? उसे और आगे धकेले? लिंबाले इन जिज्ञासाओं को भीतर समेटकर तर्क को एक नई दिशा देते हैं और अपनी रचनाओं की तरह ही थोड़ा जोखिम उठाते हुए कहते हैं, ''नई-नई बीमारियां आनी ही चाहिए. ये चुनौतियां आएंगी तो मनुष्य उनसे निबटने की तैयारी करेगा. उसकी कल्पना, सोच और उद्यमशीलता को नए पंख लगेंगे.

विज्ञान की राह में भी वे नए दरवाजे खोलंगे.'' लिंबाले के कहे में थोड़ा तंज भी है. वह यह कि पर्यावरण हो या फिर यातायात, मनुष्य अपने आराम और अय्याशी के लिए किसी क बख्श नहीं रहा. यह भी जब शांति रहती है तो पाकिस्तान ही सबसे बड़े दुश्मन के रूप में खड़ा रहता है, कोरोना सरीखा संकट आने पर इनसान और इनसानियत की फिक्र की जाने लगती है. सियासत भी उस बीच काल्पनिक और गढ़े गए दुश्मनों से तौबा किए रहती है.

लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग वक्त की जरूरत होने के बावजूद लेखकों की बिरादरी ख्याली तौर पर ही सही, इसमें थोड़ा पोएटिक रियायत लेती है. कोई फिराक (गोरखपुरी) का शेर याद करता है:

यारो बाहम गुंधे हुए हैं कायनात के बिखरे टुकड़े,

इक फूल को जुंबिश दोगे तो इक तारा कांप उठेगा.

कोई गालिब के दर्द से खुद को जोड़ता है

मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं.

धन्वा कहते हैं कि सृष्टि में ज्यादा दिनों के लिए आइसोलेशन संभव नहीं. ''प्रकृति के खिलाफ बैठता है यह सब. मां-बेटी-बहन-भाई-पिता. त्रासदी बड़ी जरूर है और हमें जरूरी एहतियात बरतना ही चाहिए. पर ऐसे रिश्तों के लोग कब तक दूर रह सकते हैं.'' कोरोना की त्रासदी के दौरान आपस में दूरियों का पालन करने के पीछे दूसरी ज्यादा मानवीय वजहें हैं. डर उन्हीं में से एक है. ''लिंबाले बताते हैं कि ''हमारे यहां गांव में लोग खासे डरे हुए हैं. हर किसी को स्वाभाविक तौर पर जान की फिकर है. दुनिया में इसके कहर को देखते हुए मीडिया ने भी लोगों को जागरूक करने में बड़ा रोल निभाया है.''

लेकिन इस त्रासदी ने मानवीय संवेदनाओं को जिस तरह से झंझोड़ा है, उससे रचनात्मकता की दिशा और उसकी जमीन भी बदलने वाली है, ऐसे संकेत मिल रहे हैं. कालिया कहती हैं, ''मैंने एक प्रेम कहानी लिखनी शुरू की थी. 22 पन्ने लिख भी लिए थे. लेकिन अब तो उसकी अकाल मृत्यु हो गई. इतने निगेटिव समय में पॉजिटिव कोई कैसे लिखेगा भला? हां संस्मरण वगैरह लिखना आसान है, जिसमें हृदय की भावनाओं वाली बात न आए.

कविता की पंक्ति है ना लहर छूने से सलिल को क्लेश होता है. तो अब हंगरी पर एक संस्मरण शायद पूरा हो जाए. देखिए न! विभाजन पर अभी तक भी मार्मिक कहानियां आ रही हैं. हाल के नया ज्ञानोदय के अंकों में ऐसी दो कहानियां छपी हैं.

उसी तरह से श्रमिकों का यह जो बहिर्गमन हुआ है, उस पर भी अगले 30-40 साल तक कहानियां आती रहेंगी.''

धन्वा इस त्रासदी को दो तरह से देखते हैं. उनका कहना है कि ''अगर यह सचमुच सृष्टि को खत्म करने आई है, जैसा कि विश्वयुद्ध में होता था, तो यह समझिए कि यह विश्वयुद्ध से भी खतरनाक है. दूसरे, सारे उपक्रम बंद हैं. यह सिलसिला लंबा चला तो डिप्रेशन शुरू हो जाएगा. वह भी हमारी सबसे बड़ी आबादी युवाओं के दिमाग में. क्योंकि प्रतिस्पर्धा बहुत ज्यादा है. उनके भीतर यह भय बैठेगा कि अब उनका क्या होगा!'' यानी साहित्यिकों के हलके में कोरोना पर बहस लंबी चलेगी.

एक प्रेमकथा के 22 पन्ने लिखकर छोड़ देने वालीं कथाकार ममता कालिया कहती हैं कि उसकी अकाल मृत्यु हो गई.

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