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यानी शीर्ष पर कविता!

गुजरते 2018 की पांच प्रमुख किताबों के बारे में पूछने पर आठ-दस लेखकों-आलोचकों ने अलग-अलग पसंद बताई लेकिन पांचेक किताबें कमोबेश साझा दिलचस्पी की निकल ही आईं

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शिवकेश मिश्रनई दिल्ली, 08 January 2019
यानी शीर्ष पर कविता! इलेस्ट्रशनः सिद्धांत जुमडे

साल की पांच उम्दा किताबें कौन-सी? आसान कहां होता है दिसंबर के अंत में हर बार आ खड़े होने वाले इस तरह के सवालों का जवाब? हमने कुछ लेखकों-कवियों-आलोचकों की रुचियों के जरिए इसे टटोला. कुछ ने बेबाकी से जवाब दे दिए तो कुछ थोड़ा ठिठके और कई पहलुओं से सोचकर जवाब दिया. हमारी मंशा भी थी कि अलग-अलग पहलू विचार में लिए जाएं. कथाकार-आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी इस सवाल पर अपने अंदाज में बोले, "देखो भइया, इस साल-उस साल का हमको नहीं पता, जो पसंद आती है उसे बार-बार पढ़ते हैं.

जैसे अभी सोनम गुप्ता बेवफा नहीं पढ़ रहा हूं. बहुत छोटे-छोटे निबंध. माना जाता है कि यह विधा रचनात्मकता का नाश कर देती है लेकिन अनिलवा (अनिल यादव) ने इसी को औजार बना लिया. और सुनिए, निलय उपाध्याय का उपन्यास पहाड़. दसरथ नाम का मांझी, उसके जैसा हनीमून आज तक नहीं पढ़ा. साधारणता में विलक्षणता.'' पर ये किताबें तो पहले आ चुकी हैं! कथाकार असगर वजाहत बेबाकी से कह देते हैं, "पढ़ता तो रहता ही हूं लेकिन इस साल ऐसा कुछ देखने में नहीं आया.'' (हालांकि उनकी दो किताबों भीड़तंत्र (कहानी संग्रह) और अतीत का दरवाजा (यात्रा वृत्तांत) के नाम दो पैनलिस्ट्स ने लिए).

काम और मुश्किल हो गया जब किन्हीं वजहों से कुछ के जवाब नहीं मिल सके. पर विमल कुमार, प्रभात रंजन, दिनेश कुमार, पल्लव, राजीव कुमार, रजनी अनुरागी और रश्मि भारद्वाज ने 2018 में आई अपनी पसंद की किताबों की सूची हमें दी. रजनी ने स्पष्ट कहा कि उन्होंने दलित साहित्य ज्यादा पढ़ा है, सो उसी के बारे में बताएंगी. रजनी तिलक संपादित/शेखर पवार अनूदित सावित्री बाई फुले समग्र के अलावा उन्होंने असंग घोष, मुसाफिर बैठा, करमानंद आर्य और सतीश खनगवाल के ताजा कविता संग्रहों के नाम लिए. जिज्ञासा का विषय यह था कि कोई एक पुस्तक किन-किन की सूचियों में जगह बना पाती है. और यह सुई आकर टिकी हिंदी के मूर्धन्य कवि केदारनाथ सिंह के जाने के बाद आए उनके कविता संग्रह मतदान केंद्र पर झपकी पर, जो तीन सूचियों में थी.

उपन्यास पागलखाना (ज्ञान चतुर्वेदी) और रेत समाधि (गीतांजलि श्री), कहानी संग्रह अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार (विजयश्री तनवीर) और कथेतर कश्मीरनामा (अशोक कुमार पांडेय) को, इस चुनावी मौसम के मुहावरे में कहें तो, दो-दो वोट मिले. केदार जी के संग्रह को "स्थानीयता की जमीन से सार्वभौम को परखने का सुंदर उदाहरण'', "उनकी कविताओं की विशिष्टता रही मनुष्यता, राग, विस्थापन की पीड़ा को अभिव्यक्त करने वाली'' और "कविता प्रेमियों को सत्ता और समय के प्रश्नों को परखने की दृष्टि देने वाला'' बताया गया. इस सूची में सबसे कम उम्र तनवीर का प्रवेश चौंकाने वाला है. उनके इस पहले ही कहानी संग्रह ने "भाषा, प्रवाह, शिल्प और कथ्य के बूते'' पाठकों का ध्यान खींचा है. पागलखाना के बारे में पल्लव लिखते हैं, "बाजारीकृत व्यवस्था किस कदर मनुष्यविरोधी हो सकती है, यह पागलखाना का हासिल है.'' और कश्मीरनामा में, प्रभात रंजन के शब्दों में, "एक जिल्द में कश्मीर के इतिहास, राजनीति और साहित्य सब कुछ बहुत ऑथेंटिक तरीके से दर्ज किया गया है.''

जाहिर है, यह एक प्रतीकात्मक सूची है. तमाम विधाओं में जहां सैकड़ों बल्कि हजारों किताबें हर वर्ष छपती हों, उनमें कुछेक के कुछ पर उंगली रख देने के आधार पर "टॉप-5'' को कैसे चुना जा सकता है? पर इससे संकेत मिलता है किस तरफ नजरें ज्यादा गई हैं. यहीं पर यह सूची खुल जाती है और कथा/कथेतर/कविता के बीसियों शीर्षक इसमें रुतबे के साथ दाखिल हो उठते हैं. मसलन उपन्यासों में सहेला रे (मृणाल पांडे), एक सेक्स मरीज का रोगनामचा (विनोद भारद्वाज), हम यहां थे (मधु कांकरिया), हमन हैं इश्क मस्ताना (विमलेश त्रिपाठी), नए समय का कोरस (रजनी गुप्त); कहानी संग्रहों में ग्यारहवीं ए के लड़के (गौरव सोलंकी), कहीं कुछ नहीं (शशिभूषण द्विवेदी), किरदार (मनीषा कुलश्रेष्ठ), फोटो अंकल (प्रेम भारद्वाज), लेडीज सर्कल (गीताश्री), मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है (प्रियंका ओम).

इसके अलावा कविता संग्रहों में ईश्वर नहीं नींद चाहिए (अनुराधा सिंह), कदाचित अपूर्ण (मनोज कुमार झा), कथेतर गद्य में मैं बोनसाई अपने समय का (आत्मकथा; रामशरण जोशी), चीन डायरी (यात्रा वृत्तांत; ऋतुराज), साहित्य, संस्कृति और भाषा (लेख संग्रह; जगदीशचंद्र माथुर) और लक्ष्मीनामा (शोध पुस्तक; अंशुमान तिवारी और अनिंद्य सेनगुप्त). अंत में कथाकार और अंतिका प्रकाशन के प्रमुख गौरीनाथ जैसे एक क्षेपक-सा जोड़ते हैं, "इसी साल हमारे यहां से छपी, 11 मशहूर मनोचिकित्सकों से साक्षात्कार वाली किताब मनोचिकित्सा संवाद (विनय कुमार) की 2,500 से ज्यादा प्रतियां अब तक बिक चुकी हैं.'' यानी आज का मध्यवर्ग झिझक और दोहरापन छोड़कर अब मानसिक संत्रास के सच को कुबूल कर रहा है! मनोचिकित्सकों के सामने ही सही.

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