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पुस्तक समीक्षाः टीवी रिपोर्टिंग की कहानियां

खबर की तह तक पहुंचने के लिए कभी कैमरामैन चोट खाता है तो कभी पत्रकार. मीडिया के माध्यम से जनता खबर देखती है और पत्रकार खबर बनने से पहले और बाद की कहानी. किताब की भाषा सरल है. कहानी की तरह पढ़ेंगे तो मन में विजुअल्स स्वतः ही तैरने लगेंगे.

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर 23 October 2018
पुस्तक समीक्षाः टीवी रिपोर्टिंग की कहानियां ऑफ द स्क्रीन

पुस्तक ऑफ द स्क्रीन के लेखक ब्रजेश राजपूत हैं. इसे मंजुल पब्लिशिंग हाउस से प्रकाशित किया गया है.

प्राइम टाइम में चैनलों पर होने वाली बहसों से इतर टीवी की असली पत्रकारिता को समझने का बेहतरीन माध्यम है ऑफ द स्क्रीन. मौके पर खड़े रिपोर्टर और विजुअल्स की मदद से किसी खबर को समझना दर्शकों के लिए आसान होता है और रोचक भी. लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए पत्रकार और कैमरामैन की जद्दोजहद अमूमन सामने नहीं आती.

दरअसल, उसी संघर्ष के किस्से हैं टीवी रिपोर्टिंग की इन 75 कहानियों में. हादसे हों या समारोह, शख्सियत हो या सरकार, प्राकृतिक आपदा हो या सामाजिक सरोकार के मुद्दे—टीवी पत्रकार की आंखें कैमरे की आड़ से हमेशा वह देखने की कोशिश करती हैं जो दिखाया न जा रहा हो. बकौल ब्रजेश, "टीवी में सामान्य काम तो होता ही कम है. जो नहीं होता वही करना तो टेलीविजन रिपोर्टिंग की चुनौती है.''   

खबर की पुष्टि, विजुअल्स लाने की होड़, मौके से पीस टू कैमरा और कैमरे की आंख से असामान्य दिखाना—टीवी पत्रकारिता की इन उलझनों से कैसे एक रिपोर्टर रोज संघर्ष करता है, इसे इस किताब केजरिए समझा जा सकता है.

खबर की तह तक पहुंचने के लिए कभी कैमरामैन चोट खाता है तो कभी पत्रकार. मीडिया के माध्यम से जनता खबर देखती है और पत्रकार खबर बनने से पहले और बाद की कहानी. किताब की भाषा सरल है. कहानी की तरह पढ़ेंगे तो मन में विजुअल्स स्वतः ही तैरने लगेंगे.

टीवी पत्रकारिता पर लिखी गई यह किताब कई ऐसे मुद्दों पर चोट करती है जिनसे रिपोर्टर आए दिन दो-चार होते रहे हैं. मसलन, एक स्थिति ऐसी भी है जहां ऐसा है तब भी खबर है और ऐसा नहीं है तब भी खबर है.

हार्ड न्यूज बहुत ज्यादा है तो जरूरी मुद्दों से जुड़ी सॉफ्ट खबरों को कैसे जगह दिलाएं, न्यूज में टीवी का मटीरियल है या नहीं, यह कैसे ढूंढें, टीआरपी की दौड़ में कैसे बने रहें, इन सबके चक्कर में कई बार रिपोर्टर्स ऐसी चीजों के पीछे दौडऩे लगता है जिस पर बाद में खुद हंसी आती है. किताब में बेबाक तरीके से कुछ ऐसे किस्से शामिल किए गए हैं जहां न्यूज की कवरेज से ज्यादा क्षमता किसी छोटे-से वीडियो या ऑडियो के हिस्से की होती है.

टीवी पत्रकारिता में करियर बनाने की इच्छा रखने वाले युवा इसे कोर्स की किताब समझ कर पढ़ें. क्लास के किसी लेक्चर में इतनी कहानी और किस्से नहीं मिलेंगे. किताब में संजोया गया फील्ड का यह ज्ञान प्रैक्टिकल से कम साबित नहीं होगा.

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