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किताब समीक्षाः उस तिलिस्मी द्वार के पीछे

थियाम के व्यक्तित्व और रंगकर्म के अब तक लगभग अज्ञात या अल्पज्ञात रहस्यमय संसार को जानने-समझने के जिज्ञासु रंगकर्मियों, पाठकों, प्रेक्षकों और शोधार्थियों के लिए यह यह किताब एक अवसर की तरह है.
किताब समीक्षाः उस तिलिस्मी द्वार के पीछे भव्यता का रंगकर्मः रतन थियाम से संवाद
जयदेव तनेजा 07 September 2018

पुस्तक भव्यता का रंगकर्मः रतन थियाम से संवाद के लेखक उदयन वाजपेयी हैं. किताब राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित की है.

थिएटर इज नॉट लॉजिक, इट्स मैजिक.'' यदि किसी नाट्य-प्रेमी को कन्नड़ के सुप्रतिष्ठित नाटककार और नाट्य-चिंतक आद्य रंगाचार्य के इस कथन पर ज़रा भी संदेह हो तो अंतिम निर्णय करने से पहले रतन थियाम का कोई भी प्रमुख नाट्य-प्रदर्शन अवश्य देख लेना चाहिए. मणिपुरी भाषा के एक शब्द का अर्थ न जानने के बावजूद उसके सिर पर चढ़कर बोलते जादू के सम्मोहक प्रभाव को आप नकार नहीं पाएंगे. पिछले तीन दशकों में देश-विदेश के लगभग सभी महत्वपूर्ण नाट्य-केंद्रों और अंतरराष्ट्रीय नाट्योत्सवों में प्रदर्शित उनकी प्रस्तुतियों पर दर्शकों की प्रतिक्रियाओं और उन्हें मिले पुरस्कारों/सम्मानों से तो यही प्रमाणित हुआ है.

अभी तक हमने रतन के रंगकर्म की विस्मयकारी उपलब्धियों के उत्कर्ष और शिखर ही देखे हैं, उनकी नींव के घने अंधेरे नहीं देखे. उनके रचनाकार की तलाश के द्वंद्व, आशा-निराशा, सफलता-विफलता और बहुस्तरीय चुनौतियों से जूझने के अनवरत संघर्ष नहीं देखे.

परंतु रतन थियाम के व्यक्तित्व और रंगकर्म के अब तक लगभग अज्ञात या अल्पज्ञात रहस्यमय संसार को जानने-समझने के जिज्ञासु रंगकर्मियों, पाठकों, प्रेक्षकों और शोधार्थियों के लिए यह एक सुखद सूचना और विरल अवसर है. वे चाहें तो उदयन वाजपेयी जैसे सुविख्यात साहित्यकार, विभिन्न कलाओं और नाट्य परंपराओं के गंभीर अध्येता के साथ उनकी सद्य प्रकाशित पुस्तक भव्यता का रंगकर्म के माध्यम से इस अजानी किंतु अत्यंत रोचक खोज-यात्रा पर निकल सकते हैं.

इंफाल में उनकी कोरस रिपर्टरी थिएटर के दूर तक फैले परिसर के बीचोबीच बने खूबसूरत प्रेक्षागृह द श्राइन (पूजा स्थल) में ही बैठकर वाजपेयी उनसे संवाद करते हैं. वे उनकी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता के उत्स, उनके अवचेतन का उत्खनन और उनकी रंग-सृष्टि के अंधेरे नेपथ्य में भी ताक-झांक करने का प्रयास करते हैं. परिणामस्वरूप जो सूत्र, सत्य, तथ्य उभरकर आते हैं, उनमें से कुछेक का उल्लेख संक्षेप में किया जा रहा है.

1. रतन मानते हैं कि वे कोई बुद्धिजीवी, दार्शनिक, शिक्षक नहीं, केवल एक कलाकार हैं. इसलिए वे अपनी रचना को दर्शकों से साझा करते हैं. कुछ स्वांतःसुखाय भी करते हैं.

2. उनकी दिलचस्पी केवल उन्हीं नाटकों में होती है, जो उन्हें चुनौती देते हैं, उनकी सोच, समझ और रचनात्मकता को उद्वेलित करते हैं.

3. वे नाटककार और उसके शब्द का पूरा सम्मान करते हैं. वे स्वयं को उसमें छेड़छाड़ का अधिकारी नहीं मानते. लेकिन नाटककार की सुझाई संचरना को ज्यों का त्यों दोहराना जरूरी नहीं समझते.

4. युद्ध केवल मणिपुर, भारत या एशिया की ही नहीं, विश्व की और मानव-भविष्य की सबसे विकराल समस्या है. युद्ध केवल बाहर ही नहीं भीतर भीकृकई रूपों और स्तरों पर लड़ा जा रहा है. अंधायुग, उरुभंग, उत्तर प्रियदर्शी, चक्रव्यूह जैसे नाटक रतन की आत्मा को मथती इस चिंता के प्रमाण हैं.

5. उनमें हर पल कुछ नया देखने-सुनने, जानने की अनबूझ प्यास है. उनका रंगकर्म एक निरंतर खोज और प्रयोग है.

वे मानते हैं कि रंगों का अपना नाट्यशास्त्र है. इनका संबंध भी रस से है. ध्वनि रंग उत्पन्न करती है और रंग भी ध्वनि उत्पन्न करते हैं. मंच पर अभिनेता को नहीं, उसके मनोभावों को आलोकित करना चाहिए.

रतन थियाम के रंगकर्म की भव्य सुंदरता के रहस्य को जानने-समझने के उत्सुक रंगकर्मियों और नाट्य-प्रेमियों के लिए यह पुस्तक पढऩा अलीबाबा के तिलिस्मी द्वार को खोलने वाले "खुल जा सिमसिम'' को जानने के लिए बेहद जरूरी है.

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