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रेखाचित्र: स्मृतियों से बनते रेखाचित्र

इसमें अपने दायरे में आए ख्यात लेखकों की स्मृतियां संजोई हैं ममता कालिया ने.

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aajtak.in
पल्लवनई दिल्‍ली, 25 August 2012
रेखाचित्र: स्मृतियों से बनते रेखाचित्र

कल परसों के बरसों
ममता कालिया
वाणी प्रकाशन,
दरियागंज,
नई दिल्ली-2
कीमतः 225 रु.

साहित्य की स्थापित विधाओं के स्थान पर पिछले कुछ वर्षों से जिन विधाओं ने चमकदार जगह बनाई है, उनमें संस्मरण, यात्रा वृत्तांत और रेखाचित्र मुख्य हैं. इन सबमें भी रेखाचित्र इसलिए उल्लेखनीय हैं कि अपनी तरलता में कभी ये संस्मरणों के निकट जा बैठते हैं तो कभी आत्मवृत्तांत बनते लगते हैं. ममता कालिया की पुस्तक कल परसों के बरसों ऐसे ही व्यक्ति चित्रों की किताब है.

ममता इन छोटे-छोटे रेखाचित्रों में अपने दायरे में आए ख्यात लेखकों की स्मृतियां संजोती हैं. लेकिन ये ठीक उस पारंपरिक अर्थ में संस्मरण नहीं होते क्योंकि यहां घटनाओं-यादों के अलावा व्यक्तित्व और किए-धरे पर खासी टिप्पणियां हैं.

पुस्तक के श्रेष्ठतम आलेख के रूप में शैलेश मटियानी पर लिखा पहाड़ जिन पर टूटता ही रहा को देखा जा सकता है. यहां मटियानी का संघर्ष, रचनात्मकता, आत्म स्वीकृतियां मिलकर जिस व्यक्तित्व का चित्र बनाती हैं वह पाठक के भीतर स्थायी होकर रहने वाला है. वे लिखती हैं, ''उनके मनोबल में मजदूर की मेहनत और मनीषी की स्वप्नदर्शिता मिलती है.'' इसी तरह शीर्ष कथाकार अमरकांत पर उनकी टिप्पणी है, ''अमरकांत कभी अपने को चर्चा का विषय नहीं बनाना चाहते. पांच मिनट भी उन पर बातचीत केंद्रित हो जाए तो वे परेशान हो उठते हैं. विषयांतर के लिए वे कोई विश्व समस्या ले बैठते हैं या उठ खड़े होते हैं.''

अपने इन संस्मरणात्मक रेखाचित्रों में खुद लेखिका का भी व्यक्तित्व उभरता है. ममता के लिए अच्छा मनुष्य होना रचनात्मकता की भी पहली कसौटी है और इस कसौटी पर उनके लिए विचारधारा भी उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जाती. मार्कंडेय और शिवानी, ज्ञानरंजन और विष्णुकांत शास्त्री. लगभग साठ वर्षों के वृहद दायरे में फैले इन रेखाचित्रों में ममता अपने पूरे रचनात्मक वैभव में दिखाई देती हैं. उन्होंने सत्तर के दशक के भरे-पूरे इलाहाबाद को बार-बार याद किया है और यह याद किस उत्साह से भरी है, ''इलाहाबाद में साहित्यकारों से मिलने के लिए न तो कोई अपाइंटमेंट लेना पड़ता है, न उनके घर का द्वार खटखटाना पड़ता है.''

इन रेखाचित्रों का मूल्य भी यही है कि ये हमारे समय के उन साहित्यकारों से रू-ब-रू हैं जिन्होंने समय की सच्चाइयां बताने में जीवन होम किया. ममता इन साहित्य नायकों की प्रतिष्ठा करती हैं लेकिन प्रतिमाओं को न खुरचती हैं, न संवारती हैं, हां प्रतिमा को ठीक से देख-जान सकें, यह जतन भर किया है.

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