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एक ऋषि व्यक्तित्व की आंच

स्वामी ने चित्रकला की ग्लैमरस दुनिया से अलग कई और जिंदगियों को जिया. कभी पैसा कमाने के लिए सिनेमा के टिकट ब्लैक किए तो जासूसी उपन्यास भी लिखा.

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विनोद भारद्वाज 16 April 2019
एक ऋषि व्यक्तित्व की आंच स्वामीनाथनःएक जीवनी

स्वामीनाथनः एक जीवनी पुस्तक के लेखक प्रयाग शुक्ल और प्रकाशक राजकमल हैं.

जगदीश स्वामीनाथन (1928-1994) आधुनिक भारतीय चित्रकला के असली बोहेमियन कलाकार थे. सौ प्रतिशत फक्कड़ और फकीर. उनकी मृत्यु के बाद कला नीलामियों में उनके चित्र भले ही करोड़ों में बिके पर स्वामी ने अपने जीवन में कभी सुख-सुविधाओं की परवाह नहीं की. नब्बे के दशक की शुरुआत में दिल्ली के एक नामी बिल्डर ने कनॉट प्लेस में एक आधुनिक कला दीर्घा कुछ समय तक चलाई. उसने खान मार्केट के पॉश इलाके में हुसेन और मनजीत बावा को उनकी पेंटिंग के बदले में आलीशान फ्लैट दिए थे. स्वामी को भी ऑफर मिला पर उन्होंने उसे गंभीरता से नहीं लिया. वे अपनी शर्तों पर जीवन जीते रहे.

स्वामी का जीवन हेमिंग्वे सरीखी किसी बड़ी जीवनी का कैनवास है. उन पर 700-800 पन्नों की जीवनी भी शायद छोटी लगे. स्वामी ने चित्रकला की ग्लैमरस दुनिया से अलग कई जिंदगियां और जीं. कभी वे अपने कम्युनिस्ट दिनों में पैसा कमाने के लिए कोलकाता के सिनेमाघर के सामने ब्लैक में टिकट बेचने से नहीं हिचकते थे और कभी किसी प्रकाशक ने थोड़े पैसे देकर उनसे हिंदी में जासूसी उपन्यास भी लिखवा लिया.

स्वामीनाथन नोबेल पुरस्कार विजेता मेक्सिकी कवि और कलाविद् ऑक्टेवियो पाज (दिल्ली में राजदूत भी रह चुके थे) से बौद्धिक स्तर के सार्थक संवाद की सामर्थ्य भी रखते थे और मध्य प्रदेश के किसी आदिवासी इलाके में बाबा बनकर आसानी से घुलमिल जाते थे और उनकी जादुई लिपि में आधुनिक कला के संकेत-चिन्ह पहचान लेते थे. आदिवासी संसार के प्रतिभाशाली युवा कलाकार जनगढ़सिंह श्याम को उन्होंने ही खोजा था, जिनके चित्रों को आज शीर्ष आधुनिक कलाकारों की बगल में प्रदर्शित किया जाता है.

वरिष्ठ हिंदी कवि और कला समीक्षक प्रयाग शुक्ल की नई किताब स्वामीनाथनः एक जीवनी रजा फाउंडेशन के सहयोग से हाल में ही छपी है. शुक्ल ने स्वामी के साथ काफी वक्त बिताया था. भारत भवन के जन्म के प्रारंभिक दिनों में वे स्वामी के साथ आदिवासी इलाकों में भी भटक चुके हैं. हिंदी में स्वामी की जीवनी लिखने के वे स्वाभाविक हकदार हैं. वे स्वामी को बातों के रसिया भी कहते थे. कनाट प्लेस में धूमीमल गैलरी के रवि जैन स्वामी के अच्छे मित्र-प्रशंसक थे. उस गैलरी में सत्तर के दशक में स्वामी ने आधुनिक भारतीय कला का नक्शा ही बदल दिया था. साठ के दशक में स्वामी ने 'ग्रुप 1890' (गुलाम मोहम्मद शेख, हिम्मत शाह, अंबा दास, राजेश मेहरा जैसे नाम इस ग्रुप के सदस्य थे) और कला विचारों की पत्रिका कांट्रा से कला की एक नई सोच पैदा करने की कोशिश की थी. लेकिन सत्तर के दशक में उन्होंने धूमीमल गैलरी के परामर्शदाता की हैसियत से जोगेन चौधरी, अर्पिता सिंह, विकास भट्टाचार्य, मनजीत बावा सरीखे कलाकारों को प्रारंभिक और विचारोत्तजक प्लेटफॉर्म दिया था.

अस्सी के दशक में स्वामी, ब.व. कारंत और अशोक वाजपेयी की तिकड़ी ने भोपाल में भारत भवन की अद्भुत कल्पना की थी. वहां बड़े आधुनिक कलाकारों की बगल में आदिवासी और लोक कला को बराबर का महत्व देकर स्वामी ने कला का एक नया संवाद स्थापित किया, पर्सीविंग फिंगर जैसी किताबें लिखीं. स्वामी कविता के प्रेमी थे और 1979 में धूमीमल गैलरी की अपनी एकल प्रदर्शनी में अपनी हिंदी की कविताओं का एक छोटा-सा संकलन भी रिलीज किया था. शुक्ल ने उसकी भूमिका लिखी थी. उर्दू शायरी में स्वामी को जिगर मुरादाबादी का व्यक्तित्व अधिक आकर्षित करता था. काला रंग, पान से रंगे होंठ और गजब की शायरी.

स्वामीनाथन तमिलभाषी थे पर उनका जन्म शिमला में हुआ था. बचपन में जिस स्कूल में वे पढ़ते थे, वहीं निर्मल वर्मा और राम कुमार भी छात्र थे. बाद में स्वामी और निर्मल वर्मा की अच्छी बौद्धिक मित्रता भी हो गई थी. स्वामी अंग्रेजी में तो श्रेष्ठ कला चिंतन करते ही थे पर हिंदी में भी अच्छा लिख लेते थे.

इस जीवनी के अंत में स्वामी की हिंदी में लिखी सात कविताएं भी शामिल हैं. दूसरा पहाड़ कविता की प्रारंभिक पंक्तियां (यह जो सामने पहाड़ है/इसके पीछे एक और पहाड़ है/जो दिखाई नहीं देता) स्वामी के व्यक्तित्व को समझने की जैसे एक कुंजी भी हैं. कन्नड़ लेखक यू.आर. अनंतमूर्ति ने अपनी आत्मकथा में लिखा है और शुक्ल ने उसे उद्धृत भी किया है, ''स्वामी एक ऋषि की तरह लगते थे और किसी के भी सामने, किसी को भी खुलकर अपने मन की बात खरे-खरे शब्दों में कह सकते थे; आचरण में हर समय विनम्रता ही बरती जाए, वे इसके कायल नहीं थे. ऐसे खरे ऋषि के आंच वाले व्यक्तित्व को समझना-जांचना, उसके सामने खड़े होना भी आसान काम नहीं है.

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