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'फूफा' रसदार ब्यौरों में

फूफा किरदार से रसदार हैं. उनका विवेक 'अंतिम फैसला' सुनाए जाने जैसा साफ और पारदर्शी है. वे अपनी देहरी पर बैठ आसपास पारखी निगाह रखने वालों में से हैं. उनके जगत फूफा होने में कहीं कोई संदेह नहीं.

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर 16 April 2019
'फूफा' रसदार ब्यौरों में एक थे फूफा

एक थे फूफा पुस्तक के लेखक राहुल कुमार सिंह हैं, इसका वैभव प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब की कीमत मात्र 20 रु. है.

राहुल सिंह ने 32 पेज की और 20 रु. कीमत वाली अपनी इस पुस्तिका के आने से पहले ही सोशल मीडिया के जरिए खासी जिज्ञासा पैदा कर दी थी. अगर आपका ग्रामीण-कस्बाई संपर्क है तो आप अपनी स्मृति में बसे ऐसे किसी किरदार को एक थे फूफा में उठकर खड़ा होता देख सकते हैं. यह किरदार कहीं फूफा हो सकता है, कहीं का ताऊ और कहीं दादाजी जैसा भी. बात आसान कर समझना चाहें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के देहात में बंडी पहने, खाट पर बैठे, धूप सेंकते, हुक्का गुडग़ुड़ाते किसी बुजुर्गवार का चित्र आंखों के सामने ले आएं.

फूफा किरदार से रसदार हैं. उनका विवेक 'अंतिम फैसला' सुनाए जाने जैसा साफ और पारदर्शी है. वे अपनी देहरी पर बैठ आसपास पारखी निगाह रखने वालों में से हैं. उनके जगत फूफा होने में कहीं कोई संदेह नहीं. जीवन अनुभव इतना कि बैठे-ठाले जीवंत किस्से गढ़कर 'सच की लय' में सुना दें. आप इसे कहानी कह लें और फूफा के सघन ब्यौरों को देख उपन्यास की आहट भी सुन सकते हैं. इसमें 'लस लस ले चुरथे अंगाकर' (छत्तीसगढ़ी संत कवि पवन दीवान की कविता की एक पंक्ति) जैसा रस है और आगे फूफा क्या पराक्रम करेंगे, उसका कौतुक भी. पुस्तिका में कथोपकथन वाली पंक्तियों की सेटिंग आलेख की मानिंद सपाट रखा जाना अखरता है. जोड़ शब्दों का आधिक्य और कुछ कठिन शब्द भी रसभंग करते हैं. इसमें विस्तार की बड़ी संभावनाएं हैं.

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