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पुस्तक समीक्षाः मिथकीय स्त्री चरित्रों की वेदना का स्वर

स्त्रीशतक में उन स्त्रियों की छवि को अंकित करने का प्रयास किया गया है जिन्हें प्रायरू भुला दिया गया है. तारा, सवर्णा मालिनी, सुप्रिया, मदयन्ती, सुकन्या, सुवर्चा, तारणी, इला, सुनीति आदि अनेकानेक पात्रों के माध्यम से मिथकीय आख्यानों का स्त्री पाठ प्रस्तुत किया गया है.

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर 18 October 2018
पुस्तक समीक्षाः मिथकीय स्त्री चरित्रों की वेदना का स्वर स्त्रीशतक

स्त्रीशतक के लेखक पवन करण हैं. इस किताब को भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रकाशित किया है.

पवन करण के नवीनतम काव्य-संग्रह स्त्रीशतक को एक तरह से प्राचीन संस्कृत साहित्य, पुराणों, मिथकों और आख्यानों का स्त्री पक्ष कहा जा सकता है. यह स्त्री पक्ष ध्वंसात्मक न होकर रचनात्मक है क्योंकि यहां आधुनिक स्त्री विमर्श की अतिक्रांतिकारिता से बचते हुए देश काल और परिस्थिति के अनुरूप ही स्त्री प्रश्न को उठाया गया है. कवि ने संस्कृत वाड्मय से चुनकर सौ स्त्री पात्रों की वेदना और सिसकियों को अपनी सौ कविताओं के माध्यम से स्वर देने का काम किया है. इन स्त्रियों की कराहों से हमारी सभ्यता का भव्य महल अपने-आप भरभराकर गिरने लगता है.

स्त्रीशतक में उन स्त्रियों की छवि को अंकित करने का प्रयास किया गया है जिन्हें प्रायरू भुला दिया गया है. तारा, सवर्णा मालिनी, सुप्रिया, मदयन्ती, सुकन्या, सुवर्चा, तारणी, इला, सुनीति आदि अनेकानेक पात्रों के माध्यम से मिथकीय आख्यानों का स्त्री पाठ प्रस्तुत किया गया है. संग्रह की कविताओं के साक्ष्य पर कहा जा सकता है कि प्राचीन संस्कृत साहित्य चाहे जितना महान हो पर वह मुख्यतः पुरुषवादी साहित्य है और उस साहित्य के पास स्त्री प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है. ऋषि के सामने संतानोत्पत्ति के लिए प्रस्तुत कल्पाषपाद की भार्या मदयन्ती कहती हैं—"मैं तुम्हारे सामने खड़ी हूं'' तो मुझे उत्तर दो मेरे प्रश्नों से पैदा अपने भीतर के प्रकोप से मेरे "शील को रख दो रौंदकर.''

कीर्तिमालिनी (राजा मद्रायु की पत्नी) बुनियादी प्रश्न उठाती हैं कि "परीक्षा लेने के लिए देव्य स्त्री देह ही क्यों चुनते हैं यह तो सरासर देह-लोलुपता है.'' इन प्रश्नों के उत्तर तो नहीं हैं पर इससे इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि अधिकांश मिथकीय आख्यानों में पुरूषवादी दृष्टि बहुत गहरे पैठी है.

ऋषियों और देवताओं की स्त्री संबंधी लोलुपताओं से हमारे मिथकीय आक्चयान भरे पड़े हैं. आश्चर्य इस बात का है कि आख्यानों में उनके कृत्यों के प्रति निंदा भाव न होकर किसी न किसी तरह से उनका महिमामंडन है. पवन करण ने बहुत ही साहस के साथ इन मिथकों के घोर स्त्री विरोधी स्वरूप को उजागर करके अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है.

इन कविताओं में माएं, बहनें, प्रेमिकाएं, पत्नियां आदि सभी रूपों में स्त्री के दुख-दर्द को अभिव्यक्त किया गया है पर इन सब के मूल में स्त्री के प्रति पुरुष की भोगवादी दृष्टि ही है. एक ऐसे समय में जब परंपरा को एकांगी बनाने की कोशिशें तेज हो रही हैं, पवन करण का यह "स्त्रीशतक'' हर तरह के ऐसे प्रयासों का रचनात्मक प्रतिरोध है. ठ्ठ

जैसे गगन ने अपने अनुपम यात्रा वृत्तांत अवाक में एक नया गद्य रचा था, वैसे ही रची गई है एक नई काव्य भाषा इस कविता संग्रह में.

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