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किताब समीक्षाः अयोध्या का यथार्थ

राजनीति से लेकर इतिहास और अदालत तक अयोध्या और विवादित ढांचे के विभिन्न पहलुओं का साक्षी भाव से और कुछेक का दस्तावेजी बयान है एक खबरनवीस की यह किताब.
किताब समीक्षाः अयोध्या का यथार्थ राजेंद्र कुमार
हेमंत शर्माउत्तर प्रदेश, 14 August 2018

युद्ध अयोध्या किताब के लेखक हेमंत शर्मा हैं, इसे प्रभात पेपरबैक्स ने प्रकाशित किया है.

लाख कोशिशों के बावजूद कारसेवक कंटीली बाड़ फांद ढांचे की बाहरी दीवार और गुंबदों पर चढ़ गए. एकदम पूरा माहौल बदल गया. सुरक्षा बल जब तक कुछ समझते तब तक वहां जमा लाखों कारसेवकों का रुख ढांचे की तरफ हो गया. समूची व्यवस्था फेल हो गई. कोई दो सौ लोग गुंबद के ऊपर थे और 25,000 के आसपास विवादित परिसर में थे. लाखों कारसेवक जो इधर-उधर रामकथा कुंज में भाषण सुन रहे थे, वे भी विवादित ढांचे के चारों ओर गोलबंद होने लगे.

जो काम सुरक्षाबलों को पहले करना चाहिए था कारसेवकों को रोकने के लिए, वह काम कारसेवक सुरक्षा बलों को रोकने के लिए कर रहे थे. उनके पास बैरिकेड्स नहीं थे इसलिए सड़क पर बाड़ और गुमटियां रखकर आग लगा दी थी, ताकि सुरक्षा बलों का कोई वाहन न आ सके. लेकिन अगर पुलिस थोड़ा संघर्ष करती तो उन्हें खदेड़ सकती थी. पर स्थानीय प्रशासन की मंशा नहीं थी, वहां केंद्रीय बलों को पहुंचाने की. इस रुकावट की आड़ में जिला प्रशासन ने केंद्रीय बलों को लौट जाने को कहा.

नगर मजिस्ट्रेट सुधाकर अदीब ने डी.आई.जी. सीआरपीएफ को हाथ से लिखकर एक आदेश दिया कि साकेत डिग्री कॉलेज पर आपकी जो टुकडिय़ां हैं, वे वहां मौजूद उग्र भीड़ की वजह से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं, इसलिए आप उन्हें वापस लौटने को कहें. एक बजकर 45 मिनट पर सिटी मजिस्ट्रेट ने सुरक्षा बलों को लौटने को कहा, दो बजकर 45 मिनट पर सिटी मजिस्ट्रेट ने सुरक्षा बलों को लौटने को कहा, दो बजकर 45 मिनट पर बाबरी ढांचे का पहला गुंबद गिरा था. केंद्रीय बल वापस लौट गए.

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सेना से लखनऊ में हेलिकॉप्टर और जहाज का इंतजाम करने को कहा. इस बीच ध्वंस जारी था. स्थानीय प्रशासन और पुलिस मूकदर्शक बने रहे. कारसेवा के दौरान पुलिस की मानसिकता और भक्ति को जाने बिना बात अधूरी रहेगी. कंट्रोलरूम के बाहर पुलिस के एक राजपत्रित अधिकारी उत्तेजना के चरम क्षणों को जी रहे थे.

वे आंख बंद कर रामनाम जप रहे थे. बीच-बीच में उनकी आंखें खुलतीं तो ढांचे को देख उनके मुंह से निकलता— "अभी तो बहुत बाकी है.'' वे फिर आंखें बंद कर रामनाम का जाप शुरू कर देते. वे ढांचा गिरने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. फर्क सिर्फ इतना था कि "जय श्रीराम'' के नारे कारसेवक जोर से लगा रहे थे और सुरक्षा में लगे लोग मन ही मन जाप कर रहे थे. वातावरण राममय ही था.

अयोध्या में ढांचा ढहाए जाने के बाद अस्थायी मंदिर में रामलला की मूर्तियां स्थापित करने को लेकर संग्राम मचा हुआ था. केंद्र सरकार इस स्थापना की खातिर विशेष तौर पर सक्रिय थी. राव सरकार के मंत्री पी.आर. कुमारमंगलम राजा अयोध्या विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के संपर्क में थे. राजा साहब कांग्रेस पृष्ठभूमि के थे.

अयोध्या में कर्फ्यू था. दुकानें बंद थीं. आनन-फानन में राजा अयोध्या ने अपने घर से रामलला की मूर्तियां भिजवाईं, जो उनकी दादी ने इसी काम के लिए अपने घर में एक अस्थायी मंदिर बनाकर उसमें रखी थीं. राजा अयोध्या ने मूर्तियां रखे जाने के बाद पी.आर. कुमारमंगलम को जानकारी दी.

फौरन बाद नरसिंह राव ने कैबिनेट की बैठक बुलाकर कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश की. यह भी अजीब बात थी कि कल्याण तीन घंटे पहले इस्तीफा दे चुके थे. फिर भी उनकी बर्खास्तगी का नाटक रचा गया.

अयोध्या के इस ध्वंस में एक बड़ी कड़वी सच्चाई यह भी थी कि जो लोग, खासकर कांग्रेस नेता अयोध्या में त्वरित कार्रवाई चाहते थे, गोली चला ढांचे को बचाना चाहते थे, वे सब उस वक्त बगलें झांकने लगे, जब उनके कार्रवाई करने का वक्त आया.

उस रात नौ बजे उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग जाता है. बावजूद उसके 36 घंटे बाद तक भारत सरकार अयोध्या में कोई कार्रवाई नहीं करती है? कारसेवकों से विवादित परिसर खाली नहीं करा पाती है? यह सब कुछ अनायास नहीं था.

इसके पीछे हिंदुत्व की जमीन हथियाने की शातिर सोच थी, जिसने कांग्रेस के ऊपरी सेकुलर ताने-बाने को तार-तार किया. कांग्रेस को उसका चुनावी खामियाजा भी भुगतना पड़ा. बाद में 2014 के चुनाव में राहुल गांधी को इस ताने-बाने की तुरपाई करने के लिए कहना पड़ा कि बाबरी मस्जिद न गिरती, अगर नेहरू-गांधी परिवार का प्रधानमंत्री होता.

अब यह देखिए कि सरकारें कैसे काम करती हैं. जब कारसेवकों का दबाव था तो 36 घंटे तक केंद्रीय बल वहां फटकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. जब कारसेवक खुद चले गए तो आंसू गैस के सिर्फ पांच गोलों से परिसर खाली हो गया. लेकिन कारसेवकों से परिसर को खाली कराने के लिए भारत सरकार ने खाली कराने गई टीम में से साठ से ज्यादा जवानों और अफसरों को उनकी बहादुरी के लिए पदक दिए.

कल्याण सिंह का कहना था—अब भी वक्त है, गैर-बीजेपी दल जनता की भावनाओं को समझें. राम जन्मभूमि केलिए अब तक 76 लड़ाइयां हो चुकी हैं. तीन लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. इसको हमें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

उन्होंने कहा कि आखिर क्या कारण थे कि केंद्र सरकार ने सत्ता संभालने के 40 घंटे बाद तक वहां कोई कार्रवाई नहीं की. 40 घंटे तक कारसेवकों पर बल प्रयोग न कर केंद्र ने गोली न चलाने के मेरे फैसले के औचित्य को मंजूरी दी.

पी.वी.आर.के. प्रसाद की किताब नरसिंह राव से उनके लंबे साथ का गोपनीय विवरण है. वे लिखते हैं— "आदतन प्रधानमंत्री रविवार को मुझे बुलाते थे. 6 दिसंबर को भी रविवार था. जब मैं गया तो कमरे में पीवी अकेले थे. उन्होंने मुझे बैठने को कहा.

मैंने देखा, वे अपने से जोर-जोर से बातें कर रहे थे, हम भारतीय जनता पार्टी से लड़ सकते हैं, लेकिन हम भगवान राम से कैसे लड़ेंगे? भारतीय जनता पार्टी का बरताव ऐसा है, जैसे भगवान राम पर सिर्फ उन्हीं का अधिकार है....''

अयोध्या को लेकर छिड़े राजनीति के इस संग्राम में ध्वंस की तारीख से थोड़ा पीछे जाने की सख्त जरूरत है. यह जरूरत उस राजनीति को समझने की खातिर है, जो ध्वंस के काले साये के आगे मशाल की शक्ल में जलती जा रही थी. उसे रास्ता दिखा रही थी. सच यही है अगर ताला न खुलता तो ढांचा न गिरता. फिर शिलान्यास न होता तो भी ढांचा न गिरता. चंद्रशेखर सरकार न गिरती तो भी ढांचा गिरने से टाला जा सकता था.

प्रधानमंत्री चंद्रशेखर अयोध्या पर सहमति बना रास्ता ढूंढने में संकल्प के साथ जुटे थे. यह दुर्भाग्य था कि उनकी सरकार सिर्फ चार महीने रही. सिर्फ एक सवाल पर उन्होंने दोनों पक्षों को आमने-सामने बिठा दिया था कि क्या उस जगह पर मस्जिद से पहले कोई हिंदू ढांचा था. उस द्विपक्षीय वार्ता के छह दौर हुए.

शरद पवार, भैरोंसिंह शेखावत और मुलायम सिंह यादव इन बैठकों में पर्यवेक्षक के तौर पर आते थे. छठे दौर में जब मुस्लिम पक्ष को मंदिर के प्रमाण के खंडन में अपना प्रमाण देना था, तब वे लोग नहीं आए. इसके बाद प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने अध्यादेश लाने का फैसला किया. शरद पवार से समझौते के कुछ सूत्र हासिल कर राजीव गांधी ने चंद्रशेखर सरकार ही गिरा दी.

लालकृष्ण आडवाणी की इस रथयात्रा के वैसे तो संयोजक प्रमोद महाजन थे, पर गुजरात में इस यात्रा के रणनीतिकार और शिल्पी नरेंद्र मोदी ही थे. आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस वक्त गुजरात राज्य बीजेपी के महामंत्री (संगठन) थे. इस यात्रा के संयोजन ने नरेंद्र मोदी को पार्टी की अगली लाइन में ला दिया. इस लिहाज से अयोध्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन का अभिन्न पड़ाव रही.

दरअसल, प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंदिर के सवाल पर बीजेपी से टकराव का फैसला कर लिया था, इसलिए एक तरफ समझौते से पीछे हटते हुए वी.पी. सिंह सरकार ने अध्यादेश वापस लिया. दूसरी तरफ 23 अक्तूबर की सुबह बिहार के समस्तीपुर में बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोक दी गई. उन्हें समस्तीपुर के सर्किट हाउस से गिरफ्तार कर लिया गया.

पहले आडवाणी के रथ को देवरिया में रोका जाना था. मुलायम सिंह यादव रथ रोकने वाले नेता बनते. वी.पी. सिंह को यह मंजूर नहीं था. अरुण नेहरू ने बताया कि प्रधानमंत्री ने लालू यादव को संदेश भेजा कि वे आडवाणी को बिहार में ही रोक लें, ताकि धर्मनिरपेक्षता का सारा नेतृत्व मुलायम सिंह केपास ही न रहे.

राजीव गांधी के निजी सहायक आर. के. धवन ने मुझे एक साक्षात्कार में बताया कि "उन्हंन यह समझाया गया कि शिलान्यास करा, आप चुनाव वक्त से पहले कराएं और अयोध्या से ही अपने चुनाव की शुरुआत करें'' बाद में यह बात सच साबित हुई. राजीव गांधी ने अपना चुनाव अभियान अयोध्या से ही शुरू किया और भाषण में कांग्रेस पार्टी की प्रतिबद्धता "रामराज्य'' के प्रति दुहराई. उस वक्त राजीव गांधी के भाषण लेखक मणिशंकर अय्यर होते थे.

उनका कहना था कि मेरे लिखे भाषण में रामराज्य का कहीं जिक्र भी नहीं था. राजीव गांधी ने इसे माहौल के दबाव में खुद से शायद जोड़ा था, ताकि भावनात्मक स्तर पर चुनाव में इसका फायदा हो. क्योंकि वे यह समझ चुके थे कि चुनाव भावनाओं पर लड़े जाते हैं.

वोटबैंक की तात्कालिक राजनीति ने राजीव गांधी से अयोध्या में ताला खुलवा दिया. वे इसके दूरगामी नतीजों से बेखबर थे. इस नाकाम रणनीति से कांग्रेस न इधर की रही, न उधर की. मुसलमान ताला खुलने से कांग्रेस से नाराज हुआ और हिंदू मंदिर बनवाने के लिए बीजेपी के पास चला गया. उसके हाथ कुछ नहीं बचा. कांग्रेस आज भी इसी त्रासदी से जूझ रही है. क्या आपने कभी सुना है कि आजाद भारत में किसी अदालत के फैसले का पालन महज चालीस मिनट के भीतर हो गया हो?

अयोध्या में 1 फरवरी, 1986 को विवादित इमारत का ताला खोलने का आदेश फैजाबाद के जिला जज देते हैं और राज्य सरकार चालीस मिनट के भीतर उसे लागू करा देती है. शाम 4.40 पर अदालत का फैसला आया. 5.20 पर विवादित इमारत का ताला खुल गया. अदालत में ताला खुलवाने की अर्जी लगाने वाले वकील उमेश चंद्र पांडेय भी कहते हैं, "हमें इस बात का अंदाजा नहीं था कि सब कुछ इतनी जल्दी हो जाएगा.''

वीर बहादुर सिंह ने कहना शुरू किया—राजीव जी चाहते हैं, सोमनाथ की तर्ज पर अयोध्या में भव्य राममंदिर बने. लेकिन इसे सरकार बनाएगी. इसमें सिर्फ तीन शर्त हैं. एक-मंदिर केंद्र सरकार अपने खर्चे से बनाएगी. दो-मंदिर निर्माण का बीजेपी से कोई मतलब नहीं होगा और तीन—विवादित भवन गिराया नहीं जाएगा.

चारों तरफ खंभों पर एक छत पड़ेगी. और उसकी छत पर भव्य मंदिर बनेगा. नीचे का ढांचा जस का तस खड़ा रहेगा. प्लान यह है कि विवादित ढांचा पहले से ही कमजोर है. बिना मरम्मत के वह कुछ दिन में खुद ही गिर जाएगा.

फिर वहां केवल राम जन्मभूमि मंदिर ही रहेगा.'' वीर बहादुर सिंह के इस प्रस्ताव से अवैद्यनाथ जोर से हंसे और कहा कि इससे बीजेपी और विहिप को क्या फायदा होगा?  राजनैतिक फायदा तो कांग्रेस को होगा. फिर बात यहां खत्म हुई कि अवैद्यनाथजी विहिप के दूसरे नेताओं से बात करें और अपनी राय बताएंगे. लेकिन इस मुद्दे पर अवेद्यनाथ जी ने आगे फिर कोई बात नहीं की और फायदे-नुक्सान के चक्कर में यह मौका भी हाथ से चला गया. यह प्रसंग इस बात की गवाही है कि राजीव गांधी किसी भी तरह मंदिर बनाने के लिए नेपथ्य से प्रयासरत थे.

एएसआई ने कुल 90 खाइयां खोदीं. पूरे क्षेत्र को पांच हिस्सों में बांटा. इनमें पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी, उत्तरी क्षेत्र और उभरा हुआ प्लेटफॉर्म शामिल था. इन सभी क्षेत्रों में क्रमवार खुदाई हुई, जिससे ढांचों की प्रकृति और उसकी सांस्कृतिकता का अंदाजा लगे. ए.एस.आई. ने यह माना कि ढांचे के नीचे एक और ढांचा था. जो अवशेष मिले, उससे साबित होता था कि वहां ग्यारहवीं शताब्दी का हिंदू मंदिर था. खुदाई में एक शिलालेख और भगवान शंकर की मूर्ति भी मिली थी.

एएसआई की इस खुदाई ने हिंदू मान्यता और दावों पर ही मुहर लगाई. इसके अलावा आजादी से पहले के राजस्व और वक्फ के दस्तावेज, विदेशी यात्रियों और ब्रिटिश शासकों के द्ब्रयोरे और हिंदू देवी-देवताओं से जुड़े हुए मामलों में दिए गए न्यायिक फैसले, ये सभी बाबरी मस्जिद के दावे को कमजोर करते थे.

22 सितंबर, 2003 को एएसआई ने अपनी 574 पन्नों की रिपोर्ट तस्वीरों के साथ हाइकोर्ट को सौंपी. जिससे पुरातत्व साक्ष्य से तय हुआ कि तोड़े गए ढांचे केनीचे ग्यारहवीं सदी का हिंदू मंदिर था. इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर हाइकोर्ट के तीन जजों ने माना कि विवादित स्थल का केंद्रीय स्थल राम जन्मभूमि ही है. खास बात यह रही कि तीनों जज गर्भगृह के सवाल पर एकमत थे.

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