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कला: श्वेत-श्याम टिप्पणियां

समकालीन कला के कई पहलुओं पर बेबाक टिप्पणी.

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aajtak.in
रामबली प्रजापतिनई दिल्‍ली, 04 August 2012
कला: श्वेत-श्याम टिप्पणियां

समकालीन भारतीय चित्रकलाः 'सैन के बहाने
अशोक भौमिक
अंतिका प्रकाशन,
गाजियाबाद,
कीमतः 160 रु.
antika56@gmail.com

प्रबुद्ध चित्रकार अशोक भौमिक की यह किताब समकालीन चित्रकला से एक नए नजरिए से रू-ब-रू कराती है. समकालीन कला की परंपरा, अंदरूनी हलचल और कलाकारों आदि पर यह ठोस जानकारी देती है. सवा सौ पन्नों में सिमटी किताब में करीब उतने ही श्वेत-श्याम चित्र शामिल किए गए हैं. लेखक ने अपने तर्कों को मजबूती से रखने के लिए चित्रों का बखूबी इस्तेमाल किया है, फिर चाहे वह हुसैन प्रकरण हो या यामिनी राय का या फिर कोई और.

हुसैन के विवादित चित्रों के बारे में लेखक अपना मत रखते हुए कहता है कि हजारों वर्षों से भारतीय कला में स्त्री के अनावृत वक्ष और योनि का चित्रण और देवी-देवताओं की अनावृत मूर्तियां मिलती रही हैं. हुसैन के विवादित चित्रों (सरस्वती, दुर्गा, पार्वती, सीता, द्रौपदी, लक्ष्मी, भारत माता, हनुमान) की तुलना हजारों वर्ष पुराने आदिकाल, मौर्यकाल, शुंगकाल के देवी-देवताओं के अनावृत चित्रों से करके लेखक हुसैन को निर्दोष साबित करने की कोशिश करता है.

वह कहता है, ''हुसैन ने जो कुछ रचा, वह तो भारतीय कलाकार पिछले छह हजार वर्षों से रचते आए हैं. फिर अकेले हुसैन को क्यों दंडित किया गया?'' अतिवादी हिंदुओं के दुराग्रह के चलते हुसैन के शिकार होने की घटना को वह कलाजगत के लिए बेहद शर्मनाक मानता है.

भौमिक ने किताब में कई ज्‍वलंत मुद्दे उठाए हैं. मिसाल के तौर पर बाजारवाद के प्रभाव में कलाकृति का माल में तब्दील होना, ज्‍यादातर कलाकारों का पैसे और प्रसिद्धि के पीछे भागना, अधिकतर कलाकारों का अल्पशिक्षित और मूर्ख होना, बड़े कलाकारों का नेताओं, अभिनेताओं, उद्योगपतियों के साथ मिलकर चित्र रचने का नाटक करना. इन मुद्दों पर बेबाकी से अपना मत रखते हैं भौमिक.

कई लेखों में सोमनाथ होड़, कमरुल हसन, चित्त प्रसाद, जैनुल आबेदिन, भाऊसमर्थ जैसे जनधर्मी कलाकारों, उनकी रचनाओं, संघर्षों पर अच्छी जानकारी जुटाई गई है. यहां पर भौमिक जोड़ते हैं, ''समकालीन भारतीय चित्रकला और लोककला के समानांतर चित्रकला की एक तीसरी धारा विकसित होगी, जो समाज के बड़े वर्ग से संवाद करेगी और समाज में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाएगी.''

पर किताब के एक लेख में हुसैन के बहाने कला परंपरा की चर्चा है. पाठक को यहां थोड़ी निराशा होती है. अच्छा होता कि लेखक हुसैन के व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों, उनके रचना संसार से रू-ब-रू कराते हुए समकालीन भारतीय कला पर उसके प्रभावों की ठीक से व्याख्या करते.

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