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साहित्य वार्षिकी: महत्वपूर्ण साहित्यिक आयोजन

अच्छी बात यह है कि इसके संपादन और चयन में हिंदी की वैचारिक और दूसरे तरह की गुटबंदियों से बचा गया है.

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aajtak.in
अजित रायनई दिल्‍ली, 03 February 2013
साहित्य वार्षिकी: महत्वपूर्ण साहित्यिक आयोजन

शुक्रवार साहित्य वार्षिकी-2013
संपादकः विष्णु नागर
सेक्टर-19, नोएडा,
कीमतः 75 रु.
info@shukrawar.net
एक अच्छी घटना की तरह है शुक्रवार-2013 की साहित्य वार्षिकी की आमद. इस अंक के संपादक विष्णु नागर, अशोक कुमार और उनके सहयोगियों ने रचनाओं के चयन में लोकतांत्रिक नजरिया अपनाया है. अच्छी बात यह है कि संपादन और चयन में हिंदी की वैचारिक और दूसरे तरह की गुटबंदियों से बचा गया है. नए जमाने में पाठकों के लोकतंत्र को महत्व मिला है. यही वजह है कि कई सुप्रसिद्ध लेखकों के साथ नए और अपेक्षाकृत कम चर्चित रचनाकारों को भी जगह दी गई है. करीब 200 पन्नों में 100 से भी ज्यादा लेखकों की रचनाएं शामिल हैं.
पर इस वार्षिकी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है इसकी आवरण कथाः ‘लेखन में आर&ण’. इस बहस में एक तरफ नामवर सिंह सरीखे दिग्गज आलोचक हैं तो दूसरी तरफ निर्मला पुतुल, अनुज लुगुन और अनिता भारती सरीखे आदिवासी और दलित समाज से आने वाले युवा लेखक. नामवर सिंह भले ही आंखें तरेरकर कहें कि “तब तो यह होगा कि ब्राह्मण साहित्य, क्षत्रिय साहित्य, सवर्ण और अवर्ण साहित्य होगा”, पर अधिकतर लेखक इस विषय के गहराई से विश्लेषण की मांग कर रहे हैं. वीरेंद्र यादव कहते हैं कि “सामाजिक भेदभाव के प्रति हिंदी के कुलीन लेखकों की पाखंडपूर्ण चुप्पी से ही दलितों में अविश्वास पैदा हुआ. यहीं से ‘दलित ही दलित लेखन कर सकता है’ जैसा सरलीकृत नुस्खा पैदा होता है.” अच्छा होता कि साहित्य में आरक्षण की पुरजोर वकालत करने वाले राजेंद्र यादव के विचारों से भी मुठभेड़ होती.
यह अंक सुप्रसिद्ध कवि मुक्तिबोध और चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन की अप्रकाशित कविताओं के लिए भी जाना जाएगा. कम ही लोगों को पता है कि स्वामीनाथन युवावस्था में हिंदी के पत्रकार/लेखक रह चुके हैं. कविता खंड के चयन में भी एक समावेशी दृष्टिकोण दिखाई देता है. वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह तो हैं ही, सुधा उपाध्याय और अंजु शर्मा तक दर्जनों ऐसे कवि भी शामिल हैं, जो अमूमन ऐसी साहित्य वार्षिकियों में जगह पाने से वंचित रह जाते रहे हैं. यहां पिछली वार्षिकी के सारे लेखकों को दोहराने से बचा गया है. संपादकीय में विष्णु नागर लिखते भी हैं कि इससे “पाठकों में यह संदेश जाता कि हिंदी में कुल समर्थ लेखक इतने ही हैं.”
यह दिलचस्प है कि वार्षिकी की साजसज्जा में नामी चित्रकारों की जगह बच्चों के चित्रों को तरजीह दी गई है. भोपाल की एकलव्य संस्था के सहयोग से यह संभव हुआ है. इससे पता चलता है कि बच्चों की दुनिया में कला के कितने रूप हो सकते हैं. हर वार्षिकी की तरह इसमें भी कई कहानियां हैं पर हृदयेश, मृदुला गर्ग, संजीव, अवधेश प्रीत आदि की कहानियां महत्वपूर्ण हैं.
वार्षिकी का एक अहम हिस्सा संस्मरण खंड है. इसमें कई विलक्षण संस्मरण हमारा ध्यान खींचते हैं. अपनी बढ़ती उम्र और अस्वस्थता के बावजूद वरिष्ठ लेखिका मन्नू भंडारी ने अपने माता-पिता पर अविस्मरणीय संस्मरण लिखा है. दूसरी ओर ज्ञान रंजन को उनकी पत्नी सुनैना की नजरों से पढऩे की कोशिश की गई है. अजित कुमार ने नए सिरे से अमिताभ बच्चन के बचपन के दिनों को याद किया है तो डॉ. रामविलास शर्मा के पुत्र विजय मोहन शर्मा ने अपने पिता के साथ अपने पैतृक गांव की यात्रा की यादें साझ की हैं. एक आश्चर्यजनक संस्मरण हंस के संपादक और वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र यादव का है, जिसमें उन्होंने सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय को अपना आदर्श बताया है. हालांकि हम सबको पता है कि उनके एकमात्र आदर्श फ्रेंच लेखक ज्यां पॉल सार्त्र हैं.
उपन्यास अंश में एक ओर हाल ही दिवंगत कामतानाथ के आने वाले उपन्यास के अंश के साथ ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास अंश को पढऩा भी कम रोचक नहीं है. हमारे समय में लोकतांत्रिक चयन और संपादन की लाख कोशिशों के बावजूद बहुत सारे ऐसे स्वर जगह पाने से वंचित रह जाते हैं. यह हर चयन की सीमा भी है और संपादकीय दृष्टि की संभावना भी. इसकी साजसज्जा, डिजाइन स्तरीय है.

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