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किताब समीक्षाः जिद और जज्बे की उपज

कहानियों में चित्रित हर्ष, उल्लास और उदासी देर तक दिमाग में गूंजते रहते  हैं. इस कहानी संग्रह को लिट-ओ-फेस्ट में अवार्ड भी मिल चुका है.हर कहानी समाज के ताने बाने को दर्शताी है. जैसे बिट्टू कहानी में नायिका यौनावस्था में कदम रखती है. प्रेम में पड़ती है. फिर टूटती-बिखरती है.

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दिव्या विजय 09 August 2018
किताब समीक्षाः जिद और जज्बे की उपज अलगोजे की धुन पर

लेखक दिव्या विजय की किताब का प्रकाशन राजपाल ऐंड संस, नई दिल्ली से हुआ है.

अलगोजे की धुन पर नाम के दिव्या विजय के इस पहले संग्रह में दस कहानियां हैं. लिट-ओ-फेस्ट, मुंबई 2017 में इसे श्रेष्ठ पांडुलिपि का अवार्ड मिल चुका है. हर कहानी का केंद्रीय पात्र स्त्रियां हैं, जो कथाक्रम में धीरे-धीरे अपने आशावाद और मजबूत इरादों के साथ उभरती हैं.

जिंदगी में उनकी जद्दोजहद कम नहीं है, उन्हीं से जूझते हुए वे आगे बढ़ती हैं. उनकी जिद है अपने माफिक जीवन जीना, जहां से उनका कॉन्क्रिक्ट पैदा होता है. वे खूबसूरत भी हैं, पढ़ी-लिखी और भावुक भी.

इसकी बिट्टो कहानी की बुनावट थोड़ी हटकर है, जिसमें यौवनावस्था में कदम रख रही नायिका कुदरत और परिंदों से अठखेलियां करती जीती है, अनजान युवक के प्रेम में पड़ती, टूटती-बिखरती है.

प्यार की कीमिया की नायिका रोज अलग-अलग लोगों के साथ समय बिताती, उनके अकेलेपन को बांटती है. रोज एक नया अनुभव. उसे प्रेम जैसी संस्था पर भरोसा नहीं होता. हालांकि अंततः उसे भी प्रेम होता है पर वह अपनी पसंद का जीवन जीने का फैसला करती है. उसे दुनिया जीतने की जिद है.

इन कहानियों में चित्रित हर्ष, उल्लास और उदासी देर तक दिमाग में गूंजते हैं.

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