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उपन्यास: पूरब बनाम पश्चिम का संघर्ष

आउट ऑफ वेस्ट होने का मतलब है, एक ऐसी दुनिया से ताल्लुक रखना, जो वेस्ट की तरह अमीर नहीं है, एक ऐसी भाषा में लिखना, जो अंग्रेजी नहीं है, इसलिए ताकतवर की भाषा नहीं है. ऐसे समाज से आना, जो पश्चिम के आधिपत्य से आक्रांत रहा हो.

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aajtak.in
मनीषा पांडेयनई दिल्‍ली, 04 September 2012
उपन्यास: पूरब बनाम पश्चिम का संघर्ष

स्नो
ओरहान पामुक
पेंगुइन बुक्स, 11, कम्युनिटी सेंटर
पंचशील पार्क, दिल्ली-17
कीमतः 399 रु.
www.penguinbooksindia.com

साहित्यिक कृति में राजनीति कुछ ऐसे ही है, जैसे संगीत समारोह के बीच गोली चलने की आवाज. यह क्रूर बात है, लेकिन इससे किनारा करना मुमकिन नहीं.
-स्तांधाल (फ्रांसीसी लेखक)
हम राजनीति से किनारा कर सकते हैं क्या? हालांकि राजनीति कविता जैसी खूबसूरत नहीं होती, न उसमें संगीत की लय है, न रंगों की महक, लेकिन संगीत और रंगों के बीच वह अपनी पूरी क्रूरता के साथ मौजूद है. पामुक भी इससे कहां बच पाए. बचना शायद उनका मकसद था भी नहीं, लेकिन अगर किसी के लिए राजनैतिक हकीकतें अंधों का हाथी हैं या वी.एस. नायपॉल का पश्चिमी पूर्वाग्रही चश्मा, तो बेशक यह किताब उसके लिए नहीं है. यह उनके लिए है, जो प्रिज्म के हर कोण को देखने की कुव्वत रखते हैं, जो किसी एक के साथ नहीं हैं, लेकिन सबके साथ हैं.

इसलिए 2004 में जब तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में 1952 में जन्मे नोबेल विजेता लेखक ओरहान पामुक का नया उपन्यास स्नो छपकर आया तो पूरब के साथ-साथ पश्चिम की दुनिया भी थोड़ी हैरान-परेशान थी. इसके पहले नायपॉल अपने तरीके से ईस्ट बनाम वेस्ट को व्याख्यायित करते रहे थे और एडवर्ड सईद के ओरिएंटलिज्म को पचाने की ताकत यूरोप के कुछ सेकुलर इंटेलेक्चुअल्स तक ही सीमित थी. स्नो दरअसल एक उपन्यास होकर भी पॉलिटिकल डिस्कोर्स था.

अब स्नो का हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ है और एक बार फिर ईस्ट और वेस्ट का सांस्कृतिक संघर्ष और सारे राजनैतिक सवाल बहस के केंद्र में हैं. स्नो एक कवि ‘क’ की कहानी है, जो जर्मनी में 12 साल निर्वासन में बिताने के बाद अपने मुल्क तुर्की लौटा है. आर्मीनिया की सीमा से सटे तुर्की के सुदूर पूर्वी प्रांत कार्स में कुछ समय से लड़कियों की आत्महत्या की घटनाएं बढ़ गई हैं. वहां सेकुलर और कट्टर ताकतों के बीच जंग छिड़ी है. यूरोपियन यूनियन में शामिल होने की महत्वाकांक्षा में तुर्की का एक बड़ा वर्ग यूरोपियन होना चाहता है और एक वर्ग इस्लामी सांस्कृतिक पहचान की लड़ाई लड़ रहा है. बतौर पत्रकार ‘क’ का मकसद है आत्महत्या के कारणों की पड़ताल और उस लड़की से मुलाकात, जिससे कभी वह प्रेम करता था.

‘क’ खुद को सेकुलर मानता है, जो नस्ल, धर्म और मुल्क की पहचान से ऊपर है. लेकिन यूरोप में वह पिछड़ी इस्लामी दुनिया का व्यक्ति है और तुर्की में अंग्रेजीदां यूरोपियन. अंग्रेजीदां यूरोपियन होने के पैमाने साफ हैं-तीसरी दुनिया को न सिर्फ गरीब, कमजोर और निरीह, बल्कि सांस्कृतिक रूप से पिछड़ा हुआ समझना. ‘क’ की खोज उसे सांप्रदायिक तनाव में रह रहे कार्स के कट्टर इस्लामी नेता ब्लू के पास ले जाती है.

ब्लू कमाल अतातुर्क और यूरोप का विरोधी है. उसे आधुनिकता से गुरेज नहीं, लेकिन आधुनिकता यूरोप के रास्ते आए, इससे परहेज है. स्नो के पहले यह समझऩा थोड़ा जटिल था कि कट्टर और सेकुलर ताकतों की लड़ाई में इतने पेच भी मुमकिन हैं. ब्लू का तर्क है-इससे इनकार नहीं कि यूरोप बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से उन्नत है, आधुनिक है. और यह आधुनिकता उन्हें थाली में सजाकर भी नहीं मिली. ऐतिहासिक उथल-पुथल के बाद आजादी की जमीन तैयार हुई है.

लेकिन यूरोप का औपनिवेशिक इतिहास, पूरब के प्रति उसका पूर्वाग्रह भरा रवैया और भयानक खूनी संघर्ष उसी आधुनिक सिक्के का दूसरा पहलू है. तुर्की में सरकारी संस्थानों में हिजाब प्रतिबंधित है, लेकिन ब्लू की प्रेमिका हिजाब पहनती है. इसलिए नहीं कि इसमें उसका विश्वास है, इसलिए कि उसे न पहनने का निर्णय उसका अपना हो, थोपा हुआ नहीं.

कार्स ‘क’ की दुनिया में निर्णायक मोड़ लेकर आता है. बरसों के अंतराल के बाद वह किसी स्त्री (पुरानी प्रेमिका इपेक) के साथ सेक्स करता है, बरसों बाद कविताएं लिखता है. जब हमें लगता है कि अब उसकी जिंदगी में सब ठीक होने वाला है तभी जर्मनी के एक चैराहे पर वह कट्टर इस्लामी नेता के हाथों मारा जाता है. इस नेता के लिए वह यूरोप का पिट्ठू था और यूरोप के लिए सिर्फ एक मुसलमान.

स्नो प्रेम के सबसे कोमल जज्बात में गुंथी ईस्ट और वेस्ट की सांस्कृतिक पहचान व अंतःसंघर्ष की कहानी है. यह पामुक की ताकत थी, जो यूरोप में स्वीकार्य होने के लिए उन्हें नायपॉल होने की जरूरत नहीं पड़ी. वेस्ट उन्हें पसंद करे या न करे, लेकिन उन्हें इग्नोर नहीं कर सकता. जैसा कि पामुक ने कहा था, “आउट ऑफ वेस्ट होने का मतलब है, एक ऐसी दुनिया से ताल्लुक रखना, जो वेस्ट की तरह अमीर नहीं है, एक ऐसी भाषा में लिखना, जो अंग्रेजी नहीं है, इसलिए ताकतवर की भाषा नहीं है, ऐसे समाज से आना, जो हमेशा पश्चिम के आधिपत्य से आक्रांत रहा हो.”

पामुक ने निश्चित ही उस आधिपत्य को तोड़ा है.

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