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पत्रिका: बौद्धिक उपद्रव

पहल जैसी महत्वपूर्ण वैचारिक पत्रिका के अचानक अवसान के बाद एक शून्य की स्थिति बन गई थी. ठीक चार साल बाद बिना अपनी वैचारिक रीढ़ को छोड़े हताशा, निराशा और अवसाद के वातावरण के बीच फिर इसके निकलने की सुखद सूचना है.

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aajtak.in
मनोज मोहननई दिल्‍ली, 13 October 2012
पत्रिका: बौद्धिक उपद्रव

पाखी
सितंबर-2012
एल.पी.-61/बी, पीतमपुरा,
दिल्ली-34,
कीमत: 50 रु.
पहल जैसी महत्वपूर्ण वैचारिक पत्रिका के अचानक अवसान के बाद एक शून्य की स्थिति बन गई थी. ठीक चार साल बाद बिना अपनी वैचारिक रीढ़ को छोड़े हताशा, निराशा और अवसाद के वातावरण के बीच फिर इसके निकलने की सुखद सूचना है. ऐसे क्षणों में, दिल्ली के साहित्यकारों पर केंद्रित विशेषांकों से थके हिंदी समाज में पाखी के ज्ञानरंजन पर केंद्रित अंक का आना सुखद है. सवा दो सौ पन्नों की पत्रिका में ज्ञानरंजन पर केंद्रित नई कहानी और पल-प्रतिपल के पुराने विशेषांकों से सामग्री लेते हुए भी इस अंक में काफी कुछ नया है.

योगेंद्र आहूजा के साथ वैभव सिंह और दुर्गा प्रसाद गुप्त ने ज्ञानरंजन के साहित्य को आज के समय के बीच रखकर देखने की कोशिश की है. उनकी पीढ़ी के सभी यार-दोस्तों के संस्मरणों में ज्ञानरंजन के व्यक्तित्व से आतंकित होने का भाव ज्यादा है. हां! नीलाभ का 'शहर में बन रहा एक शख्स’ जो ज्ञानरंजन के बहाने पुस्तक का महत्वपूर्ण हिस्सा है, को पढऩा बेहद दिलचस्प है.

राजेश जोशी के 'कुछ नोट्स’ और विमल कुमार की 'साहित्यिक परिदृश्य पर ज्ञानजी की उपस्थिति’ उनके व्यक्तित्व की उस परत को खोलने में सक्षम हैं, जिसके कारण ज्ञानरंजन नए-पुराने सभी लेखकों और साहित्यिक एक्टिविस्टों के लिए 'ज्ञानजी’ बने हुए हैं.

'हंसता हुआ मेरा अकेलापन’ में ज्ञानरंजन के जीवन से जुड़ी आत्मीय सूचनाएं शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण हैं. जमाने का रुख मोडऩे का माद्दा, लडऩे का किसी योद्धा सरीखा ज़ज्बा और जोश के लिए ज्ञानरंजन पर केंद्रित यह विशेषांक आज के समय में बौद्धिक और भावनात्मक उपद्रव करने में पूरी तरह सक्षम है.

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