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पत्रिका: इंद्र सभा के बहाने

रंग चिंतक नेमिचंद जैन ने 1965 में भारतीय रंगमंच को केंद्रीयता प्रदान करते हुए नटरंग का पहला अंक संपादित किया था. और आज सैंतालीसवें वर्ष में उसका 91वां अंक पीयूष दईया के अतिथि संपादन में इंदर सभा पर एकाग्र किया गया है.

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aajtak.in
मनोज मोहननई दिल्‍ली, 18 August 2012
पत्रिका: इंद्र सभा के बहाने

नटरंग-अंक 91
अतिथि संपादकः पीयूष दईया
बी-31, स्वास्थ्य विहार, विकास मार्ग, दिल्ली-92,
कीमतः 40 रु.

natrang1965@gmail.com

रंग चिंतक नेमिचंद जैन ने 1965 में भारतीय रंगमंच को केंद्रीयता प्रदान करते हुए नटरंग का पहला अंक संपादित किया था. और आज सैंतालीसवें वर्ष में उसका 91वां अंक पीयूष दईया के अतिथि संपादन में इंदर सभा पर एकाग्र किया गया है. वर्षों की निरंतरता में अंकों की संख्या भले कम हो लेकिन स्तरीयता को जिस जतन से बरकरार रखा गया है वह कम ही देखने को मिलता है.

वाजिद अली शाह के दरबारी कवि सैयद आन्नगा हसन 'अमानत' के 1853 में लिखे इंदर सभा को बिना काट-छांट के यहां फिर से छापा गया है. इसके संपादकीय में अशोक वाजपेयी लिखते हैं, ''इंद्र/इंदर सभा उत्तर भारतीय रंगमंच का एक अनूठा क्लैसिक है, जिसे मुंशी नवल किशोर ने भी प्रकाशित किया था.

इंद्र सभा न केवल विभिन्न विद्यानुशासन के अध्येताओं के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि अपने समावेशी नाट्यरूप के कारण उत्तर आधुनिक रंगकर्मियों के लिए भी. यह दिलचस्प है कि यह नाटक हिंदी और उर्दू दोनों ही भाषाओं का पहला रंगमंचीय क्लैसिक है.''

पिछले वर्षों में हिंदी नाटक और रंगमंच की परनिर्भरता जिस तरह अनूदित नाटकों और कहानियों के रूपांतरणों पर बढ़ चली है, संपादकीय टिप्पणी उसी के बरअक्स इस नाटक की महत्ता को आज के रंगमंच के साथ भी जोड़कर देखना चाहती है.

कैथरिन हैवसन के लिखे 'इंदर सभा परिघटना' लेख में इस नाटक के पूरे ऐतिहासिक संदर्भ और तत्कालीन समय की घटना-परिघटनाओं को स्पष्ट किया गया है. यह लेख नाटक/रंगमंच से जुड़े रंगप्रेमियों के लिए ऐतिहासिक धरोहर से परिचित होने जैसा है. इसी अंक में मदारीलाल रचित इंद्र सभा को भी प्रकाशित किया गया है, जिससे पाठकों को यह पता चले कि अमानत की तरह मदारीलाल का उद्देश्य भी नाच-गानों से दर्शकों के लिए मनोरंजन का साधन उपलब्ध कराना था लेकिन उन्होंने अपने इंद्र सभा को ज्‍यादा संक्षिप्त और सघन रूप में लिखा.

लेकिन वे कहीं भी अमानत के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सके. मोहन उप्रेती के निर्देशित/संगीतबद्ध इंदर सभा का प्रदर्शन आलेखांश और नटरंग प्रतिष्ठान के संग्रह से इंद्र सभाः छवि वीथी को भी प्रस्तुत किया गया है. नटरंग असल में एक नए तेवर-कलेवर में सामने आ रहा है. इस अंक के कुशल संयोजन के लिए अतिथि संपादक पीयूष दईया की कल्पनाशीलता और सुरुचिपूर्णता के लिए उन्हें धन्यवाद दिया जाना चाहिए.

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