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पर्यावरण: पानी को लेकर गहरी चिंता

जब पूरी दुनिया में पानी बचाने के नाम पर समाज और सत्ता के हर स्तर पर चिंताएं गहरा रहीं हैं तब रसायनशास्त्री के.एस. तिवारी ने अपनी किताब और पानी उतर गया में जल समस्या को अपने तरीके से रखने की कोशिश की है.

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aajtak.in
अमरेंद्र किशोरनई दिल्‍ली, 13 October 2012
पर्यावरण: पानी को लेकर गहरी चिंता

और पानी उतर गया
के.एस.तिवारी
राजकमल प्रकाशन,
कीमत: 150 रु.
nfo@rajkamalprakashan.com
जब पूरी दुनिया में पानी बचाने के नाम पर समाज और सत्ता के हर स्तर पर चिंताएं गहरा रहीं हैं तब रसायनशास्त्री के.एस. तिवारी ने अपनी किताब और पानी उतर गया में जल समस्या को अपने तरीके से रखने की कोशिश की है. जल से जुड़ी परंपराएं, व्यवस्थाएं और आस्थाएं—इनकी जड़ें इतिहास और धार्मिक चिंतन में अंदर तक समाहित हैं, मगर आज हम पानी से दूर हो रहे हैं. हमें पता है कि पानी न रहा तो हमारे समूचे विकास पर पानी फिर सकता है. लेखक की यह चिंता चेतावनी के तौर पर बार-बार हमारे सामने आती है.

सवाल यह है कि ऐसा क्यों? जिस देश की इतनी समृद्ध वर्षा जल संचयन व्यवस्था थी कि यहां 21,07,000 तालाब, लाखों कुएं, झीलें, पोखर और झरने थे, वहीं आज पानी के नाम पर बावेला है. 'पानी बिन पलायन’, 'सावन में सूखे की गाथा’ जैसे शीर्षक अखबारों में सजाए जाते हैं. मानो जल-संकट कोई सालाना आयोजन हो. विराट प्रश्न यह है कि आज पानी महत्वपूर्ण है या पानी का मुद्दा. हाल के अनुभव सिखाते हैं कि पानी के मुद्दे को तवज्जो देने की जरूरत है. लेखक ने किताब के ग्यारह अध्यायों के जरिए यही बताने की कोशिश की है. यह किताब उन सचाइयों से अवगत कराती है जिनकी वजह से हालात बेकाबू हुए हैं. पानी बचाने में जुटे लोगों के विवरण प्रेरित करते हैं.

औद्योगिक समाज और उसकी जीवन शैली ने जहां नदियों को नाला ही नहीं बल्कि पनाला बनाया है, उसमें बजबजाती-मलमलाती संस्कृति यह सोचने को मजबूर करती है कि हम नदियों से या नदियां हमसे हैं. इंसानी सभ्यता आज यह बात जोर देकर कह रही है कि पानी, परंपरा और समाज से इतर उसकी प्राथमिकता उपभोग की है. पानी एक उत्पाद है, जो मुफ्त का मिला है. जिसका उपयोग जैसे भी करना है. उत्तर आधुनिक समाज इसे जीवन की सहजता से जोड़कर देखता है. यह लोकमानस का कृष्ण पक्ष है. किताब में पेश आंकड़े पानी के नाम पर असंगत विकास की पोल खोलते हैं. यह किताब तथ्यपरक दस्तावेज होते हुए भी पाठक को रोचक उपन्यास की तरह बांधकर रखती है. 'बिन पानी विकास बेमानी’ अध्याय में दी गयी जानकारियां बेहद रोचक हैं. हिंदी में अमूमन ऐसी जानकारियां दुर्लभ होती हैं.

आज के इस दौर में पानी का निजीकरण, राष्ट्रीय जल नीति से हमारी अपेक्षाएं, जन सहभागिता और जल संग्रहण और संवर्धन, पानी के फलते-फूलते बाजार, विश्व बैंक के इशारे पर पानी के फर्जी सर्वेक्षण को लेकर लिखा जाना बेहद जरूरी हो गया है. सामुदायिक प्रयासों से जल संचयन, जलग्रहण के बेहतर प्रबंधन से गांवों में लौटती खुशहाली, पानी पंचायत से पलटती पलायन की धारा के कुछ उदाहरणों के अलावा जल को लेकर लिखने वाले लोगों को पानी के तीर्थ सुखोमाजरी, रूपखेड़ा, नीमी जाना चाहिए.

इस किताब में इन तमाम मुद्दों की कमी बेहद अखरती है. पानी की परंपरागत संस्कृति जरूरी संदर्भ है मगर उससे कहीं ज्यादा जरूरी है जल के उन आधुनिक तीर्थ स्थलों की चर्चा, जो जनसहभागिता के परिणाम हैं.

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