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फीफाः जोश और जुनून

यह छद्म युद्ध देश और काल के परे है. यूरोपीय फुटबॉल सीजन के भारी प्रतिद्वंद्विता के दौर के बाद खिलाड़ी अपनी राष्ट्रीय टीमों में लौट चुके हैं और कुछ "दोस्ताना'' मैच खेलते हुए विश्व कप की तैयारी में जुट चुके हैं
फीफाः जोश और जुनून साल्वाटोर डी नोल्फी/ईपीए
सौगत दासगुप्तनई दिल्ली,मॉस्को, 14 June 2018

यह छद्म युद्ध देश और काल के परे है. यूरोपीय फुटबॉल सीजन के भारी प्रतिद्वंद्विता के दौर के बाद खिलाड़ी अपनी राष्ट्रीय टीमों में लौट चुके हैं और कुछ "दोस्ताना'' मैच खेलते हुए विश्व कप की तैयारी में जुट चुके हैं.

मॉस्को में विश्व कप मुकाबले शुरू होने के ठीक तीन हफ्ते पहले कीव में 27 मई को चैंपियंस लीग का फाइनल हुआ. अपने देश के कुछ फुटबॉल दीवाने भारत के लिए कप्तान सुनील छेत्री का 100वां मैच देखने मुंबई का सफर तय कर आए.

छेत्री ने दो गोल किए और आखिरी दो मैचों में अपना आंकड़ा पांच गोल का कर दिया. उनके कुल गोल आश्चर्यजनक 61 के आंकड़े पर पहुंच गए हैं, जिससे वे अंतरराष्ट्रीय मैच में सर्वाधिक गोल करने वालों की कतार में बस क्रिस्टियानो रोनाल्डो और लियोनेल मेसी के पीछे खड़े हैं और बेहद प्रतिभावान तथा अभी दमखम वाले खिलाड़ियों में शुमार हो गए हैं. हालांकि छेत्री को फुटबॉल दीवानों से ट्विटर पर व्यक्तिगत अपील जारी करनी पड़ी.

आखिर ये दीवाने बतौर विज्ञापन अभियान अपनी "दूसरी कंट्री'' के आकर्षण में यूरोपीय क्लबों और विश्व कप के जादू से चमत्कृत जो हैं. ऐसे में भारतीय फुटबॉल के अधिकारियों को यह सवाल खुद से जरूर पूछना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल के प्रति इस दीवानगी को आखिर वे क्यों स्थानीय क्लबों और राष्ट्रीय टीम के सक्रिय समर्थन में नहीं बदल पाते?

आखिर क्यों वे अपने ऐतिहासिक क्लबों और खेल के प्रति जमीनी स्तर से जागरूकता बढ़ाने के बदले कॉर्पोरेट ढर्रे वाली लीग में मशगूल रहते हैं जिसमें यूरोप के रिटायर खिलाडिय़ों का बोलबाला रहता है?

आइए फिर कीव का रुख करें. फाइनल में इस साल इंग्लैंड में श्रेष्ठ खिलाड़ी घोषित 44 गोल दागने वाले मोहम्मद सलाह को अपना कंधा पकड़े, आंखों में आंसू लिए मैदान से बाहर जाते देखा गया.

लिवरपूल के उनके साथी खिलाडिय़ों ने मानो कंधा झुकाए गमगीन चेहरों के साथ बाकी का खेल पूरा किया.

आखिर गोल करने की उनकी बेताबी ही जो गुम हो गई थी. एक गोलकीपर ऐसी चूक कर बैठा कि बोस्टन के एक अस्पताल ने बाद में कहा कि उन्हें उससे भारी दिमागी आघात पहुंचा है. इसे और क्या कहा जाए कि अब वे अपने होशोहवास में नहीं हैं?

सलाह की मैच से ऐसी विदाई लिवरपूल के खेल दीवानों के लिए ही आघात नहीं है. हर मिस्रवासी सिर थामे बैठा है.

मिस्र 1990 से विश्व कप के लिए क्वालीफाइ नहीं कर पाया था. वह 1934 में इटली में फाइनल में पहुंचने वाला पहला अफ्रीकी देश रहा है (और संयोग से यह अपने पहले और दूसरे विश्व कप में सबसे अधिक अवधि के अंतराल से पहुंचने वाला देश भी है).

मिस्र, अफ्रीकन कप ऑफ नेशंस (अफ्रीकी देशों की फुटबॉल प्रतियोगिता) सबसे अधिक बार जीतने वाला देश भी है लेकिन उसकी महादेशीय श्रेष्ठता विश्व कप में नहीं दोहराई जा सकी.

अफ्रीकी फुटबॉल दीवानों को तो उसके उत्तरी अफ्रीका के पड़ोसी अल्जीरिया तथा मोरक्को और पश्चिम अफ्रीका के प्रतिद्वंद्वी कैमरून, नाइजीरिया, घाना और सेनेगल ही लुभाते रहे हैं.

सो, आश्चर्य नहीं कि सलाह की चोट को राष्ट्रीय आपदा की तरह देखा जा रहा है और उसी तरह उसका उपचार किया जा रहा है. सलाह की कांगो के खिलाफ आखिरी पलों में पेनाल्टी की वजह से रूस में मिस्र की जगह पक्की हो पाई.

वाकई सलाह इतने लोकप्रिय हैं कि मार्च में वे मिस्र के राष्ट्रपति पद के चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे. दस लाख से ज्यादा लोगों ने अब्दुल फतह अल सीसी और मूसा मुस्तफा मूसा जैसे उम्मीदवारों के बदले बैलेट पेपर पर सलाह का नाम लिख दिया. कामगार वर्ग से आने वाला यह गांव का लड़का स्विट्जरलैंड, इटली और इंग्लैंड में अपनी पेशेवर जिंदगी के बावजूद एकदम बदला हुआ नहीं लगता है.

वे पक्के मुसलमान हैं, हर गोल के बाद घुटनों के बल झुककर दुआ करते हैं, अपनी भारी आमदनी का एक हिस्सा देश में अस्पताल और स्कूल की इमारतें बनवाने में खर्च करते हैं. वे मिलनसार हैं, परिवार के प्रति समर्पित हैं, और हर वक्त चेहरे पर मुस्कराहट लिए मिलते हैं. यह अकूत कमाई और सेलेब्रिटी जैसी चमक-दमक वाले खेल के खिलाडिय़ों में विरले ही मिलता है.

सलाह के कंधे की चोट की हालत की खबरें लगातार जारी की जा रही हैं. डॉक्टरों का कहना है कि वे खेलने के लिए फिट हो जाएंगे. अगर सलाह अपने पूरे फार्म में हुए तो वे मिस्र को नॉकआउट राउंड तक ले जा सकते हैं और इसकी कीमत शायद मेजबान रूस को चुकानी पड़े.

दो साल पहले यूरोपीय चैंपियनशिप में रूस का प्रदर्शन इतना लचर था कि वह स्लोवाकिया और वेल्स से भी पिछड़ गया. ये दोनों देश विश्व कप के लिए क्वालीफाइ भी नहीं कर पाए. तो, अब रूस भला सलाह के मिस्र और उरुग्वे के झटके को कहां झेल पाएगा. मेजबान देश का पहला मैच सऊदी अरब से है और वह उसका मनोबल बढ़ाने का मौका हो सकता है.

जनवरी में करोड़ों पाउंड की पेशकश पर बार्सिलोना में जाने के पहले तक लिवरपूल के खिलाड़ी रहे, ब्राजील के युवा मिडफील्डर फिलिप कोटिन्हो के मुताबिक, सलाह इस विश्व कप के बेस्ट प्लेयर हो सकते हैं. हालांकि कोटिन्हो ने उनके साथ अपने साथी खिलाड़ी नेमार का भी नाम लिया.

सीजन में ज्यादातर समय चोटिल रहे नेमार इस खेल के इकलौते ऐसे सितारे हैं जिनकी पहचान किसी क्लब की बजाए अपने देश से ही जुड़ी हुई है. मेसी को अपने दौर का महानतम खिलाड़ी अर्जेंटीना के बदले बर्का में अपने प्रदर्शन के दम पर ही माना जाता है.

अपने स्वदेशी तथा जीओएटी खिताब के लिए उनके प्रतिस्पर्धी माराडोना के उलट मेसी अभी तक विश्व कप या महादेशीय खिताब जीतने के लिए अपने साथी खिलाडिय़ों में दमखम नहीं भर पाए हैं. अर्जेंटीना चार साल पहले ब्राजील में फाइनल तक तो पहुंचा लेकिन बेहद चुस्त खेल में माहिर जर्मनी की टीम के आगे हथियार डाल दिए जबकि जर्मनी की टीम का वह श्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं था.

लेकिन कभी फुटबॉल के दीवानों में नशे की तरह उतरने वाले विश्व कप का अब वह जलवा नहीं रहा. अब वह बहुत अनजानी प्रतिभाओं और अनोखे खेल हुनर की चकाचौंध वाला महामेला नहीं रह गया है. जिन देशों के खिलाड़ी अपने ही देश में खेलते हैं, वे अमूमन ग्रुप स्टेज में ही बाहर हो जाते हैं.

बाकी विश्व कप में खेलने वाले करीब 75 प्रतिशत खिलाड़ी यूरोप के क्लबों के ही सितारे हैं. सभी उक्वदा खिलाड़ी स्पेन, इंग्लैंड, इटली, जर्मनी या फ्रांस में खेलते हैं. दुनिया भर के खेलप्रेमी इन्हें लगभग हर हक्रते एक-दूसरे से होड़ लेते देखते हैं. इस तरह विश्व कप यूरोपीय फुटबॉल क्लब मैचों का ही एक और विस्तार जैसा लगने लगता है.

बार्का, रियल, मैनचेस्टर युनाइटेड, लिवरपूल, जुवे, इंटर, बायर्न म्युनिख वगैरह जैसे सुपरक्लबों ने फुटबॉल के रहस्य और रोमांच को बुलंदी पर पहुंचा दिया है. इसी वजह से विश्व कप के ग्रुप स्टेज के मैच एक बेहद जरूरी ताजी हवा लेकर आ सकते हैं.

यकीनन, यूरोपीय क्लब फुटबॉल में अपनी अटैची खोलकर पैसा लुटाने वाले दुनिया के सरमाएदार जरूर उसकी क्वालिटी पर नाक-भौं सिकोड़ेंगे. लेकिन फुटबॉल का रोमांच, चौंकाऊ हुनर और खूबसूरती तो नाइजीरिया बनाम आइसलैंड या ट्यूनिशिया बनाम पनामा या कोलंबिया बनाम सेनेगल जैसे मैचों में दिखेगी. इन देशों में फुटबॉल चैंपियंस लीग की तरह बटुआ लहराते खरबपतियों का शगल बनकर नहीं रह गया है.

इस विश्व कप में ज्यादातर लोगों की उम्मीद यही है कि नेमार बेहतरीन फुटबॉलर साबित होंगे क्योंकि मेसी और रोनाल्डो पर उम्र चढऩे लगी है, अलबत्ता दोनों में ही अभी ढलान का कोई लक्षण नहीं दिख रहा है और पेरिस सेंट जरमेन को बार्का के लिए 22.2 करोड़ यूरो खर्चने पड़ रहे हैं. फ्रांस की फुटबॉल लीग में किसी तरह वे चोटिल होते हुए भी बने रहे.

हालांकि अब ऐसी अफवाह है कि स्पेन में वे रियल की वर्दी फिर पहनने वाले हैं. उधर, ब्राजील के नेमार खुद से अधिक एक बड़े मकसद के लिए खेल रहे हैं. जहां तक अर्जेटीना और पुर्तगाल के लिए क्रमशः मेसी और रोनाल्डो की बात है तो वे शायद पहले के विश्व कप मैचों की ही तरह ऐसे खेलें कि उनकी ताकत किन्हीं कमजोरियों को न ढक पाए.

फ्रांस, ब्राजील, जर्मनी और स्पेन बेहतरीन टीमें हैं जबकि बेल्जियम में प्रतिभाएं भरपूर हैं लेकिन उनका अपने संभावित प्रतिस्पर्धियों के खेल के अनुभव से ज्यादा साबका नहीं है. बहरहाल, विश्व कप आगे बढ़ते हुए ही खिलेगा. हर बार की तरह इस विश्व कप में भी चमत्कार और चौंकाऊ नतीजों की उम्मीद लगाई जा सकती है.

मेक्सिको के 39 वर्षीय राफेल मार्केज की तरह कई दिग्गज उम्रदराज फुटबॉलरों के लिए यह अखिरी विश्व कप भी हो सकता है. आइए, फुटबॉल के इस युद्ध का भरपूर आनंद लें. उसकी तैयारी के वे पल जब आप पुरानी स्मृतियों के साथ भविष्य के चौंकाऊ हुनर की कल्पना करते हैं, एक सपना जैसा पालते हैं, मनाइए कि वह सब देखकर आंखें चमक उठें.

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