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सानिया की युगल जीत किस काम की?

ग्रैंड स्लैम के युगल खिताब हमारे जज्बे और जुनून की कमी पर परदा डालने का काम कर रहे हैं.
सानिया की युगल जीत किस काम की? सानिया मिर्जा (दाएं) मार्टिना हिंगिस के साथ
कुणाल प्रधान 18 September 2015

इस बार जब नोवाक जोकोविच ने नई ताकत से उठ खड़े हुए रोजर फेडरर का महारत के साथ मुकाबला किया, तब मंत्रमुग्ध कर देने वाले अमेरिकी ओपन की धमक भारत में भी महसूस की गई. सानिया मिर्जा भी खिताब जीतने वालों की फेहरिस्त में थीं. उन्होंने टेनिस की दुनिया में अपनी चमक खोने के बाद वह काम कर दिखाया, जिसे उनका निजी पुनरोत्थान माना जा रहा है. उन्होंने गुजरे जमाने की सुपरस्टार मार्टिना हिंगिस के साथ महिला युगल खिताब जीता. हिंगिस ने लिएंडर पेस के साथ मिश्रित युगल खिताब भी अपनी झोली में डाल लिया.
पिछले छह सत्रों के दौरान भारतीय सितारों ने 11 ग्रैंड स्लैम खिताब जीते. इनमें से सात मिश्रित युगल, जबकि दो-दो महिला और पुरुष युगल खिताब थे. इससे किसी को भी लगेगा कि यह भारतीय टेनिस का शानदार दौर है. इसमें निरंतरता, महत्वाकांक्षा, जज्बा, जुनून और फतह है.

मगर हकीकत इससे अलहदा है, जिसे हम आसानी से नजरअंदाज कर रहे हैं. पिछले छह सत्रों का यह दौर बीती आधी से ज्यादा सदी का बदतर दौर भी है. भारतीय टेनिस उस खतरनाक गोशे में लौट आया है, जहां न महत्वाकांक्षा है, न जज्बा, न जुनून है. जब हम अपने अगले महारथी खिलाडिय़ों की तलाश में नजर डालते हैं, तो हमें नाउम्मीदी का एहसास होता है, जिस पर एक के बाद एक युगल खिताबों ने परदा डाल दिया है.

भारत के बेहतरीन एकल खिलाड़ी युकी भांबरी एटीपी टूर में 125वीं रैंक पर हैं. उनके बाद सोमदेव देवबर्मन 164वीं रैंक पर हैं, जो 30 साल के हो चुके हैं. साकेत मैनेनी 195वीं रैंक पर हैं. हमारी अव्वल महिला खिलाड़ी अंकिता रैना 238वीं रैंक पर हैं. इनमें से किसी ने भी अब तक वल्र्ड टूर खिताब नहीं जीता है.

इसकी तुलना उस दौर से कीजिए, जब भारत का एक न एक टेनिस खिलाड़ी शिखर के मैचों में हमेशा बड़े उलटफेर की काबिलियत से लैस था. रामनाथन कृष्णन बीती सदी के पचास और साठ के दशक में दुनिया के बेहतरीन खिलाडिय़ों में थे. वे छठी रैंक पर थे और दो बार विंबलडन के सेमीफाइनल में पहुंचे. उसके बाद विजय अमृतराज की चमक से सत्तर और अस्सी के दशक रोशन रहे. वे रैंकिंग में 16वीं पायदान पर पहुंचे, उन्होंने 16 खिताब जीते और जॉन मैकेनरो तथा जिमी कोनर्स को उस वक्त हराया जब दोनों अपने शिखर पर थे. अस्सी के दशक में रमेश कृष्णन भी निखरकर आगे आए. उनके दिल को छू लेने वाले टेनिस में उनके पिता रामनाथन की झलक थी. रमेश ने आठ खिताब जीते, 23वीं रैंक तक पहुंचे और 1989 के ऑस्ट्रेलियाई ओपन में उन्होंने उस वक्त दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी मैट्स विलेंडर के छक्के छुड़ा दिए.

जुझारू खिलाडिय़ों की यह परंपरा नब्बे के दशक में पेस के साथ जारी रही. 'वन वॉली ऐंड वन हार्ट' से लैस पेस एटीपी में 73वीं पायदान पर पहुंचे, एक टूर खिताब जीता, 1996 के अटलांटा ओलंपिक में एकल कांस्य पदक हासिल किया और अपने से ऊंची रैंक के खिलाडिय़ों को लगातार हराकर डेविस कप में हमारी शानदार परंपरा को कायम रखा. हमारी अगली बड़ी उम्मीदें थीं नए रास्ते गढऩे वाली महिला खिलाड़ी सानिया और देववर्मन. सानिया जो कई बाधाओं को पार करती हुई 2007 में विश्व खिलाडिय़ों की जमात में 27वीं रैंक तक पहुंचीं और देववर्मन 2011 में 62वीं रैंक तक पहुंचे और लगा था कि वे टॉप 50 में आ जाएंगे.

मगर पिछले दशक के दौरान, खासकर 2010 के बाद से भारतीय खिलाड़ी छोटी-मोटी चमक-दमक के फेर में पड़ गए हैं. इसके लिए पेस और महेश भूपति को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. दोनों ने उस वक्त युगल जोड़ी बना ली, जब उनके एकल करियर ढलान पर थे. उनकी केमिस्ट्री से सर्किट जगमगाने लगा. 1997 में उन्हें छह खिताब मिले और 1999 में वे सभी चारों ग्रैंड स्लैम फाइनल मुकाबलों में पहुंचे. यह वह दौर था, जब युगल टेनिस को उतार पर होने के बावजूद पूरी तरह दरकिनार नहीं किया गया था. मैकेनरो-लेमिंग का जमाना लद चुका था पर वूडीज सरीखी जोडिय़ां अब भी मौजूद थीं.

अलबत्ता युगल टेनिस ज्यों-ज्यों सुखद अतीत में ढलता गया, पेस और भूपति की देखा-देखी भारतीय खिलाडिय़ों ने उनकी कामयाबी से गलत मतलब निकाल लिए. उन्हें इस फॉर्मैट में अपने गुजारे का फौरी इंतजाम नजर आया, जिसके लिए उन्हें ज्यादा मेहनत नहीं करनी थी. इससे इतनी सारी रकम उनके हाथ लगनी थी कि उन्हें एकल करियर की फिक्र करने की जरूरत नहीं थी. एक बार जब मीडिया भी उनकी इस नई कामयाबी को भुनाने लगा और इसकी खामियों पर उंगली रखने के नजरिए को भी तिलांजलि दे दी गई, तो पीछे लौटने की गुजांइश नहीं बची. आम तौर पर सटीक जवाब देने के लिए मशहूर मैकेनरो ने 2013 में लंदन के द टाइम्स के साथ एक इंटरव्यू में पूछा था, ''युगल हम खेल ही क्यों रहे हैं?'' ''मैं अब इसे देखता हूं और कहता हूं, ये क्या है? युगल खेलने वाले धीमे लड़के हैं, जो इतने फुर्तीले नहीं हैं कि एकल खेल सकें. कोई बेकद्री नहीं, पर क्या यह बेहतर नहीं होगा कि युगल बिल्कुल न हों...?''

आप पिछले दशक के दौरान के युगल चैंपियनों पर नजर डालें, तो मुकाबलों का स्तर जाहिर हो जाता है. अगर मार्टिना नवरातिलोवा 49 वर्ष की उम्र में 2006 में अमेरिकी ओपन का मिश्रित युगल खिताब जीत सकती हैं और मार्टिना हिंगिस अपने दूसरे रिटायरमेंट के सात साल बाद 2015 में एक के बाद एक ग्रैंड स्लैम महिला युगल खिताब झोली में डाल सकती हैं, तो स्तर भला कितना ऊंचा हो सकता है?

तो सानिया को बहुत-बहुत मुबारक. मगर इन ग्रैंड स्लैम खिताबों से कहीं ज्यादा उनकी एक दशक पहले की ऊंचाइयों के कसीदे पढऩे के लिए हमें माफ करें. भारतीय टेनिस के पतन पर आंसू बहाने के लिए फुर्सत निकालें, जो चमक-दमक के अंधे फेर में फंस गया है और जहां से उसे निकालने वाला भी कोई नहीं है.

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