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आखिरकार हाथ आई कामयाबी

बहरहाल गेंदबाजी तो कहीं सधी दिखाई देती थी; चिंता थी तो बल्लेबाजी को लेकर—फिर कोहली और सिर्फ कोहली से बात नहीं बननी थी. पुजारा का आगाज होता है. घरेलू मैदानों पर वे सालों से बल्लेबाजी का मुख्य आधार बने हुए थे.

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बोरिया मजूमदारनई दिल्ली, 17 January 2019
आखिरकार हाथ आई कामयाबी मार लिया मैदान ऑस्ट्रेलिया में पहली टेस्ट सीरीज जीत के बाद खुशी से झूमते कोहली और भारतीय टीम

फरवरी 2017 में हिंदुस्तान की टीम दक्षिण अफ्रीका से अभी लौटी ही थी और वहां उसकी वनडे सीरीज में 5-1 से जीत चारों तरफ चर्चा में छाई थी. मगर उस सीरीज में जुनूनी शख्स की तरह बल्लेबाजी करने वाले कप्तान कोहली बहुत संयत ढंग से जश्न मना रहे थे. वजहः दक्षिण अफ्रीका में टेस्ट सीरीज की जीत उनके हाथ से फिसल गई थी. पहले तो वह पकड़ में दिखाई दे रही थीरू गेंदबाजों ने कुछ शानदार प्रदर्शन किए थे, पर बल्लेबाजी में मायूसी हाथ लगी. दक्षिण अफ्रीका के दौरे के महीने भर बाद जब हम कोलकाता में मिले, तो कोहली बोले, ''ए.बी. डिविलियर्स ने मुझसे कहा था कि उस दौरे में उन्होंने जिन गेंदबाजों का सामना किया, उनमें जसप्रीत बुमराह सबसे मुश्किल थे.

उसने अजीबोगरीब उछाल पैदा की और बल्लेबाज को बहुत कम वक्त दिया. तेज गेंदबाजों को मदद करने वाली स्थितियों में वह सही मायनों में मैच जिताऊ हो सकता है.'' मोहम्मद शमी और ईशांत शर्मा आजू-बाजू थे और कोहली का 'समुद्र पार मिशन' खुद उन्हीं के लफ्जों में तेजी से 'जुनून' में तब्दील होता जा रहा था. जुलाई 2018 में जब टीम इंग्लैंड दौरे पर गई, तब भी मिशन हासिल करने लायक नजर आ रहा था.

इंग्लैंड में हालांकि, चीजें मन-मुताबिक नहीं हुईं. बर्मिंघम के एजबस्टन में खेले गए पहले टेस्ट में टीम ने पांचवें गेंदबाज को टीम में जगह देने के लिए नंबर 3 पर मजबूत चेतेश्वर पुजारा को छोडऩा मुनासिब समझा. टीम चैथी पारी में 194 रन का पीछा न कर पाई. कोहली शानदार खेले पर उन्हें किसी से मदद न मिली. पुजारा और रहाणे के छिटपुट योगदान के बावजूद यही उस दौरे की कहानी बन गई; विराट बल्ले के साथ जूझते अकेले योद्धा की तरह मजबूती से डटे रहे. और गेंदबाजी के काबिलेतारीफ प्रदर्शन के बावजूद भारत को 1-4 से मात खानी पड़ी. विदेशी हालात में टीम की संभावनाओं को लेकर सवाल खड़े हो गए और अपने तथा टीम के लिए अनजान परिस्थितियों में सही टीम चुनने की कोहली की काबिलियत पर भी.

गेंदबाजी कोच भरत अरुण याद करते हैं, ''इंग्लैंड में आखिरी टेस्ट के बाद हम मिले और मुख्य कोच रवि (शास्त्री) ने सबसे पूछा कि सारे स्मार्ट बंदे वही गलतियां बार-बार क्यों करते रहे? जब हम ऑस्ट्रेलिया पहुंचे तो शास्त्री ने गेंदबाजों से कहा, 'उम्मीद करता हूं कि आप अपने ड्राइविंग लाइसेंस घर छोड़ आए हैं.''' अरुण समझाते हुए कहते हैं कि उनका मतलब था, ''बुमराह और पेस बॉलरों की तिकड़ी ऑस्टेलियाई बल्लेबाजों को ड्राइविंग लेंग्थ जितनी गुंजाइश भी नहीं देगी.''

बहरहाल गेंदबाजी तो कहीं सधी दिखाई देती थी; चिंता थी तो बल्लेबाजी को लेकर—फिर कोहली और सिर्फ कोहली से बात नहीं बननी थी. पुजारा का आगाज होता है. घरेलू मैदानों पर वे सालों से बल्लेबाजी का मुख्य आधार बने हुए थे. और जैसा कि चयनकर्ताओं के अध्यक्ष एम.एस.के. प्रसाद कहते हैं, ''उनमें यह काबिलियत है कि वे बल्लेबाजी के लिए मैदान पर उतरते ही एकाग्रता हासिल कर लेते हैं. आप उन पर कुछ भी फेंके, एकाग्रता नहीं टूटती. ऑस्ट्रेलिया में इसी की जरूरत थी.''

बुमराह लगातार 145 किमी की रफ्तार से गेंद फेंक रहे थे और ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों को बचने, उछलने, बल्ला अड़ाने को मजबूर कर रहे थे और विकेट भी चटका रहे थे. ऐसे में बैटिंग को बांधे रखने के लिए विराट को टीम से कुछ अच्छी पारियों की दरकार थी. उप-कप्तान अजिंक्य रहाणे कहते हैं, ''एडिलेड में 40 रन पर चार विकेट जैसी स्थिति में पुजारा ने शानदार जौहर दिखाए. उसमें गजब का धैर्य है, वे दिन भर बल्लेबाजी कर सकते हैं. पुछल्ले बल्लेबाजों के साथ वे जिस तरह खेले, वह देखने लायक था. यह उनका शानदार शतक ही था जिसकी बदौलत हम पहली पारी में बढ़त बना पाए.''

शास्त्री भी तारीफ के पुल बांध देते हैं, ''पुजारा ने साबित कर दिया कि 10 घंटे क्रीज पर रहना ग्लैमरस हो सकता है. आप अपनी पूरी जिंदगी किसी को बैटिंग करते देखना चाहते हैं? इस आदमी को चुनिए!'' इस सारी तारीफ और शाबाशी के केंद्र मैन ऑफ द सीरीज पुजारा आखिर में राहत महसूस करते हैं. ''हमने ऑस्ट्रेलिया में अच्छा प्रदर्शन करने की ठान ली थी. इंग्लैंड के बाद हम सब आहत थे. हमें अच्छे रन बनाने थे. मेलबॉर्न में हम एक दिन में 200 से ज्यादा नहीं बना सके. वहां 300 तक पहुंचना पहली नजर में मुश्किल दिखाई देता था. वहां बल्लेबाजी बहुत मुश्किल थी पर हमने ठान लिया था कि इसे हाथ से नहीं जाने देना है. हमने इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका की गलतियों से सीखा. यह अब तक सबसे खूबसूरत एहसास है.''

शास्त्री याद करते हैं, ''मेलबर्न में चौथा दिन खत्म होने के बाद हममें से कोई भी सो नहीं सका. मौसम की भविष्यवाणी में पांचवें दिन बारिश बताई गई थी और मैच के बारिश में धुल जाने के अंदेशे से टीम परेशान थी. ऑस्ट्रेलिया के दो विकेट अटके थे और पांचवें दिन का पहला सत्र बारिश में धुल गया. ऊपरवाला इतना बेरहम नहीं हो सकता, मुझे याद है मैं यही सोच रहा था. मैच धुल जाने का अर्थ होता स्कोर अब भी 1-1; सारी मेहनत बेकार जाती.'' कप्तान भी बेचैनी साझा करते हैं, ''ड्रेसिंग रूम में बेचैनी थी; हम यही चाहते थे कि जाएं और खेल खत्म करें.''

अक्सर स्टार पावर नहीं बल्कि एक बेरहम जज्बा और जुनून ही कामयाबी का औजार बनता है. इसमें शक नहीं कि तूफानी गेंदबाजी (बुमराह जैसी), पक्के इरादे और लगन के साथ बल्लेबाजी और कठिन समय में एकाग्रता (पुजारा जैसी) की अहमियत है, मगर उतनी ही अहमियत टीम के चुस्त और कड़े फोकस की भी है. यही नई भारतीय टीम है और कोहली इसकी अगुआई के वाजिब श्रेय के हकदार हैं.

विदेशी धरती पर वह कभी न हाथ आती जीत की खोज दक्षिण अफ्रीका में शुरू हुई थी. उसी अधूरे मिशन के साथ टीम ऑस्ट्रेलिया पहुंची और वह काम आखिरकार धूमधाम से पूरा हो चुका है. शास्त्री कहते हैं, ''विदेश में सीरीज न जीत पाने का वह हौवा अब काफूर हो चुका है. अब यह वापस नहीं लौटेगा.''

इस नामवर जीत के बाद की आभा और चमक में भारतीय टीम का यह लाइन-अप कुछ ज्यादा यथार्थपरक दिखाई देता है, जिसमें गेंदबाजों में बुमराह, शमी, शर्मा, कुलदीप यादव और रवींद्र जडेजा, साथ में आर. आश्विन; और बल्लेबाजों में कोहली, पुजारा, रहाणे और ऋषभ पंत, साथ में युवा मयंक अग्रवाल हैं. ऐसे में भारत अगर लगातार तीसरे साल दुनिया की नंबर 1 टेस्ट टीम के तौर पर साल का अंत करे तो हैरत की बात क्या!

और कप्तान कोहली? इस जीत से उन्हें क्या हासिल होगा? तीनों फॉर्मेट में आसानी से दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज होने के नाते वे इंग्लैंड में खुश नहीं थे तो यह बात समझ में आती है, क्योंकि उनकी नेतृत्व क्षमता पर संदेह किया जाने लगा था. ऑस्ट्रेलिया में भारत की जीत की शाम जब वे और उनकी अभिनेत्री पत्नी अनुष्का शर्मा किसी तय कार्यक्रम के लिए निकल रहे थे, तभी टीम के होटल में हम टकरा गए. उनके चेहरे पर राहत और खुशी साफ दिखाई दे रही थी—विदेशी धरती पर सीरीज जीत के कोष्ठक में भी आखिरकार उन्होंने सही का निशान लगा दिया था.

मगर वे हाल ही हासिल तमगों से सब्र करने वाले शख्स नहीं हैं. उनकी रनों की कभी न पूरी होने वाली भूख का मुकाबला कोई कर सकता है तो वह उनकी बतौर कप्तान कामयाब होने की गहरी तलब ही है. कोहली ने नए लक्ष्य पर निशाना साधने के लिए अपनी नजरें जमाना पहले ही शुरू कर दिया है. ऑस्ट्रेलिया फतह कर लिया, अब विश्व कप ट्रॉफी उनकी नजर में आ चुकी है, जिसके लिए 14 जुलाई, 2019 को लॉड्र्स में जंग लड़ी जाएगी. यह भारतीय टीम लगातार जीतने की अपनी काबिलियत में जिस तरह स्वाभाविक ढंग से यकीन करने लगी है, कुछ उसी हकीकी अंदाज में शास्त्री कहते हैं, ''लाल गेंद का क्रिकेट तो फिलहाल हो चुका.

अब सफेद गेंद की टीम को सान पर चढ़ाने का वक्त आ गया है; विश्व कप के दौरान इंग्लैंड में अच्छा करने का असल मौका हमारे सामने है.'' क्या वे ऐसा कर सकते हैं? कोहली और युवा ऊर्जा से भरपूर उनकी टीम ने उम्मीद तो बेशक पैदा कर ही दी है. उन्होंने यह भरोसा भी दिलाया है कि अगर नतीजा कुछ कमतर भी रह जाता है, तो ऐसा उनके आत्मविश्वास या कोशिश की कमी की वजह से नहीं होगा.

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