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यह कोच मुक्केबाजों को अपनी गलतियां भूलने नहीं देता

हर कोई फौरन नतीजे चाहता है. आंकने का यह कोई बहुत अच्छा तरीका नहीं है

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aajtak.in
मंजीत ठाकुर/ संध्या द्विवेदी नई दिल्ली, 23 May 2018
यह कोच मुक्केबाजों को अपनी गलतियां भूलने नहीं देता यासिर इकवाल

उन्होंने सब कुछ व्हाट्सऐप के जरिए हमारे फोन में रख दिया है. वे हमें भूलने नहीं देंगे.'' यह बात सीनियर बॉक्सर मनोज कुमार हंसी-मजाक में कहते हैं.

वे सैंटियागो निएवा के बारे में बात कर रहे हैं, जो भारतीय मुक्केबाजी टीम के कोच हैं. वे मुक्केबाजों को अपनी गलतियां 'भूलने' नहीं देंगे. आप न तो धीमे हो सकते हैं और न ही अपनी रफ्तार बढ़ा सकते हैं.

नतीजे सामने हैं. हिंदुस्तान ने 2018 के कॉमनवेल्थ गेम्स में तीन स्वर्ण पदक जीते. उनमें से एक महिलाओं के 48 किलो मुकाबले में एम.सी. मैरी कॉम ने जीता, जो तकरीबन तय ही था. बाकी दो पुरुषों—गौरव सोलंकी (52 किग्रा) और विकास कृष्ण (75 किग्रा)—के खाते में गए.

मुक्केबाजी में कुल नौ पदकों के साथ यह शानदार प्रदर्शन था. इंग्लैंड भी छह स्वर्ण समेत नौ पदक जीतकर पदकों की तालिका में शीर्ष पर रहा. कॉमनवेल्थ खेलों में, जिनमें अमेरिका, कजाखस्तान और क्यूबा सरीखे मुक्केबाजी के बड़े देश शामिल नहीं थे, पदकों की यह गिनती तीन स्वर्ण समेत सात की उस गिनती से बेहतर थी जो हिंदुस्तान के पुरुष मुक्केबाजों ने 2010 में दिल्ली में जीते थे और जब भारत की पुरुष मुक्केबाजी अपने शिखर पर पहुंची थी.

इसमें से बहुत कुछ निएवा की बदौलत मुमकिन हुआ. 42 वर्षीय निएवा मूलतः अर्जेंटीना के हैं, पर उन्होंने कई साल मुक्केबाज और कोच के तौर पर स्वीडन में बिताए हैं.

2017 की विश्व चैंपियनशिप में पदक—सभी कांस्य—जीतने वाले तीसरे हिंदुस्तानी पुरुष मुक्केबाज गौरव बिधूड़ी उन्हें नए-नए तरीके अपनाने वाला कोच बताते हैं, वहीं कृष्ण 'धैर्य' और 'समर्पण' के लिए उनकी तारीफ करते हैं.

निएवा स्वीडन में बसे अपने परिवार से दूर रहते हैं और महीनों बाद मिलने जा पाते हैं. वे कहते हैं, ''भाषा और संस्कृति जैसी कई रुकावटें हैं मगर पहले ही दिन से मुझे लगा कि कोच, मुक्केबाजों और हर किसी ने मेरा तहेदिल से स्वागत किया. मैं शिकायत नहीं कर सकता.''

निएवा भारतीय मुक्केबाजी के अफसाने में उस वक्त आए जब 2012 के लंदन ओलंपिक खेलों के बाद लगातार कई घटनाओं ने हिंदुस्तानी बॉक्सिंग को हिला दिया था. वे कहते हैं, ''भारतीय मुक्केबाजों के लिए वह बहुत बड़ा झटका था—2012 के ओलंपिक में सात पुरुषों से 2016 में तीन.

2012 में एक कांस्य और 2016 में कोई महिला मुक्केबाज नहीं.'' निएवा कहते हैं कि हिंदुस्तान अब वापस पटरी पर लौट आया है, यह भी कि पुरुष मुक्केबाजों ने साल के पहले चार महीनों में 13 पदक जीते हैं.

पर अगला कदम बढ़ाने के लिए अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है. निएवा ने कहा, ''कभी-कभी बहुत ज्यादा अफसरशाही सुचारु तरीके से काम करना मुश्किल बना देती है. इसमें हम सुधार लाने की कोशिश कर रहे हैं. अगला कदम हिंदुस्तान में वल्र्ड क्लास होने के लिए सुविधाएं हासिल करने की कोशिश करना है.''

एक चीज जो निएवा करना चाहते हैं, वह है हरेक मुक्केबाज के साथ ज्यादा वक्त बिताना, उनकी खूबियों-खामियों का विश्लेषण करना, एक मुक्केबाज को हरसंभव विश्व विजयी बनाना. यह हुआ तो है, मगर उतना नहीं जितना वे चाहते हैं. वे मुक्केबाजों के पेशेवर बनने को लेकर भी फिक्रमंद हैं—''मैं उन्हें रोक नहीं सकता.'' पेशेवर और आकर्षक डील-डौल के निएवा इस करतब को अंजाम देना चाहते हैं.

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