एडवांस्ड सर्च

Advertisement

लंदन का सबक-रियो की तैयारी

एक निडर मां और एक बैडमिंटन चैंपियन ने भारत को हॉकी और टेनिस से मिले दुःख की भरपाई की.
लंदन का सबक-रियो की तैयारी
शारदा उगरानई दिल्‍ली, 12 August 2012

भारत की बॉक्सिंग क्रांति का जीवंत लेखा-जोखा पेश करने वाली पुस्तक भिवानी जंक्शन  में विजेंद्र सिंह ने बताया है कि जब 17 साल की उम्र में उन्होंने एथेंस में ओलंपिक खेल देखा तो उनकी पहली प्रतिक्रिया क्या थीः ''यह होता है वर्ल्ड का स्पोर्ट्स...मैं दंग रह गया.''

इस एथलेटिक पैनोरमा पर पैमाने और महत्व-दोनों के लिहाज से किसी मुकाबले से परे, चकित और हतोत्साहित करने वाला भारत कहां खड़ा होता है? लंदन ओलंपिक 2012 में हमारा प्रदर्शन कैसा रहा?

भारत के पदकों की संख्या की अपने से ऊपर रहने वाले देशों से तुलना करने से न तो कोई नतीजा निकलेगा और न ही इससे कोई दिलासा मिलने वाली है. खेलों में भारत के प्रदर्शन की तुलना से तभी कुछ निकल सकव्गा जब हम इसका निष्पक्ष तौर पर आकलन कर अध्ययन करें.

लंदन ओलंपिक से मिलने वाला सबसे बड़ा बोनस यह है कि पहली बार भारत की चुनौती कई खेलों तक फैली है. हॉकी और टेनिस के पीड़ाजनक नतीजों के बीच हमारे एथलीट आशावाद के साथ वापस लौटेंगे. लंदन में पहली बार भारतीयों ने सही वक्त पर और बड़ी संख्या में क्वालीफाइ किया है-11 शूटर, आठ बॉक्सर, पांच वेटलिफ्टर, प्रतिस्पर्धियों की खेप में सिर्फ  कुछ प्रमुख आंकड़े हैं. उन्हें वाजिब वित्तीय सहयोग और विशेषज्ञता का लाभ मिला है. भारत को बीजिंग 2008 के मुकाबले ज्‍यादा मेडल जीतने थे. इस बार दुर्भाग्य, शाकाहार और दुर्भाग्यपूर्ण नस्ल का विलाप करने की जगह भारत ने गणित को अपने पाले में किया है. रियो 2016 में जितने ज्‍यादा प्रतियोगी होंगे, मेडल उतने ही ज्‍यादा होंगे.

यदि हर खेल को यह समझने के लिए एक स्तंभ की तरह देखा जाए कि हमारा खेल कहां खड़ा होता है तो लंदन इस बात का प्रमाण है कि भारत के ओलंपिक खेल में धीमा लेकिन संरचनात्मक बदलाव आया है.

सिडनी 2000 में मेडल जीतने की संभावना हॉकी, टेनिस और महिला वेटलिफ्टिंग के आसपास तक ही केंद्रित थी. पुलेला गोपीचंद (हां, वही, सायना नेहवाल के समझ्दार गुरु) बैंडमिंटन में मिले मौके का फायदा नहीं उठा पाए थे. अचरज की बात थीः बॉक्सर गुरुचरण सिंह सेमीफाइनल में 14 सेकेंड के भीतर ही काउंटबैक पर पिटे और रोते हुए रिंग से बाहर हो गए.

एथेंस 2004 में भारत की उम्मीद हॉकी, टेनिस (फिर से), लांग जंपर अंजू बॉबी जॉर्ज की बदौलत एथलेटिक्स और शूटिंग के इर्दगिर्द ही घूम रही थी. तीन भारतीय शूटर फाइनल में पहुंचे, राज्‍यवर्धन राठौर ने देश के लिए पहला सिल्वर जीता. महिला वेटलिफ्टिंग में पहली बार मिले फायदे का राजनीतिकरण्ा हो गया और डोपिंग की वजह से खिलाड़ी प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गईं. अचरजः क्वार्टर फाइनल में दुनिया के नंबर एक से कांटे का मुकाबले कर रहे तीरंदाज सत्यदेव प्रसाद सिर्फ  एक तीर से हार गए. 

बीजिंग 2008 में हॉकी टीम क्वालिफाइ नहीं कर पाई और टेनिस भी केंद्र से दूर हो गया. इस बार प्रतियोगी शूटिंग, बॉक्सिंग और बैडमिंटन से आए. अभिनव बिंद्रा का गोल्ड जीतना एक बड़ी उपलब्धि थी, विजेंद्र सिंह ने ब्रोंज मेडल जीतकर तो जैसे बॉक्सिंग की दुनिया के सारे अवरोध दूर कर दिए. बीजिंग का अचरज रहा सुशील कुमार का कुश्ती में ब्रोंज जीतना. नेहवाल अपने क्वार्टर फाइनल मुकाबले में हार के बाद इतनी दुखी हुईं कि उन्होंने आगे ओलंपिक में एक बेहतर, मजबूत और कड़ा प्रतिस्पर्धी बनकर लौटने का संकल्प लिया. जब वे लंदन में टिने बाउन के खिलाफ क्वार्टरफाइनल में जीतीं तो कोई अचरज नहीं हुआ कि उन्होंने अपना रैकव्ट उछाल दिया और खाली हाथों कोर्ट का चक्कर लगाया. 

2012 की बात करें तो नेहवाल के अलावा शूटरों, बॉक्सरों और पहलवानों ने अपनी तरफ से बेहतरीन प्रदर्शन करने का प्रयास किया. एक बार फिर तीन शूटरों ने फाइनल में जगह बनाई-बहुत हो सकता था तो यह संख्या पांच होती-लेकिन दो ही मेडल जीत पाए. आठ बॉक्सर में से मेडल तक पहुंचने वाली एकमात्र प्रतियोगी एम.सी. मैरी कॉम रहीं. सात पुरुष बॉक्सर में से छह के प्रदर्शन को बेहतर करना ही होगा, नहीं तो बॉक्सिंग की दशा में गिरावट आएगी.

लंदन में इस बार कई अचरज रहे, रेस वॉकर के.टी. इरफान का प्रदर्शन जिन्होंने 20 किमी वॉक में नेशनल रिकॉर्ड तोड़ा, शूटर जॉयदीप कर्मकार जिन्होंने चौथा स्थान हासिल किया, बैडमिंटन के दिलेर परुपल्ली कश्यप और डिस्कस थ्रोअर विकास गौडा. विकास गौडा साल 1976 में श्रीराम सिंह के बाद किसी ओलंपिक एथलेटिक्स के फाइनल में पहुंचने वाले पहले भारतीय पुरुष थे और 1948 में हेनेरी रेबेलो के ट्रिप जंप में उतरने के बाद मेन्स फील्ड इवेंट में आने वाले पहले एथलीट.

जिन खेलों में शोर खबरों से भी ज्‍यादा तेज होता है वे हैं हॉकी, टेनिस और तीरंदाजी. तीरंदाजों का कहना है कि उन्हें एक मेंटल ट्रेनर की जरूरत है, हॉकी आगे जा सकती है यदि उसके युवा खिलाड़ी वर्ल्ड सिरीज हॉकी में लड़ाई के लिए कुछ कर पाते हैं और टेनिस को सबसे पहले पेस-भूपति गाथा से बाहर निकलना होगा जो कि अब टॉम और जेरी के कार्टून जैसा लगने लगा है.

इन खेलों के संचालकों को अब कुछ करना होगा वरना भारत में उनके खेल का ओलंपिक महत्व खत्म हो जाएगा. तीनों में से तीरंदाजी को खराब उपलब्धि के लिए सबसे फौरी प्रतिक्रिया मिली है, क्योंकि इसको सबसे ज्‍यादा नुकसान हो सकता है. हॉकी तो अपने स्वर्णिम इतिहास के सहारे टिकी है और टेनिस भारत में हमेशा ही विशिष्ट वर्ग का खेल रहा है.

अब तक भारत के वास्तविक एथलेटिक प्रदर्शकों (खासकर वे जिनके पास संसाधन नहीं हैं) को कोई भी सुरक्षा आधार हासिल नहीं है. गुरुशरण ने अमेरिका में एक प्रोफेशनल करियर के लिए सेना की नौकरी छोड़ दी, प्रसाद को जल्दी ही भुला दिया गया. लंदन ने भारतीय ओलंपिक खेल को यह दिखाया है कि सफलता पाने का एकमात्र तरीका यह है कि अपने पुराने स्टाइल के खेल को बदला जाए.

पिस्टल शूटर विजय कुमार सिर्फ  नौ साल से ही शूटिंग कर रहे हैं और उन्होंने अपने खेल के सबसे बड़े आयोजन में सिल्वर मेडल हासिल किया. यह अनुशासन और तरीके से जीता गया मेडल है. वास्तविक एथलीट उपलब्धियों को शीर्ष से हटाने से भारत में ओलंपिक की महत्ता कम ही होगी. वास्तव में कहें तो यदि भारतीय तीरंदाजी के मुखिया रियो में मेडल नहीं दिला पाते जो कि उनकी एकमात्र प्राथमिकता है तो हर कोई यही कहेगा कि अपने तीर और धनुष फेंक दो. जैसा कि विजेंद्र सिंह ने कहा, यह होता है दुनिया का खेल.

लेखिका ईएसपीएन क्रिकइन्फो में सीनियर एडिटर हैं.

Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay