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एक्सप्रेसवे-सियासी ताकत बढ़ाने का एक्सप्रेसवे

राज्य में विभिन्न एक्सप्रेसवे के जरिए योगी आदित्यनाथ की सरकार वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले अपनी झोली विकास परियोजनाओं से भरना चाहती है

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aajtak.in
आशीष मिश्र लखनऊ, 09 September 2019
एक्सप्रेसवे-सियासी ताकत बढ़ाने का एक्सप्रेसवे मनीष अग्निहोत्री

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से करीब 10 महीने पहले 14 जुलाई, 2018 को पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के शिलान्यास समारोह के लिए आजमगढ़ के चयन के पीछे एक बड़ी राजनैतिक रणनीति थी. यह एक्सप्रेसवे पूर्वांचल की लाइफलाइन कहे जाने वाले उन जिलों को राजधानी लखनऊ से जोड़ेगा जहां पिछड़े और दलित समुदाय की खासी तादाद है. आजमगढ़ की मंदुरी हवाई पट्टी पर आयोजित शिलान्यास समारोह में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ मौजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में कहा, ''सूरज पूरब से उगता है और जब तक पूर्वांचल का विकास नहीं होगा, तब तक न्यू इंडिया का सपना अधूरा ही रहेगा.'' करीब 35 मिनट के भाषण में मोदी पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के बहाने समाज के सभी तबकों में विकास का वादा कर गए. इस साल जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आए तो पिछड़ेपन के लिए पहचाने जाने वाले पूर्वांचल ने भगवा दल को सीटें देने में कोई कंजूसी नहीं की. पूर्वांचल की 25 लोकसभा सीटों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 20 सीटों पर जीत हासिल की जबकि अपेक्षाकृत विकसित पश्चिमी यूपी की 27 लोकसभा सीटों में पार्टी 19 सीटें ही जीत सकी.

लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के निर्माण ने गति पकड़ी. लखनऊ से सुल्तानपुर हाइवे पर 12 किलोमीटर दूर गोसाईगंज के चांदसराय से शुरू होने वाले पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का निर्माण शुरू हुआ.

यहीं हाइवे के किनारे पूर्वांचल एक्सप्रेसवे निर्माण की जानकारी देता हुआ बोर्ड लगते ही सड़क के दूसरे किनारे पर स्थित सरोज इंस्टीट्यूट और टेक्नोलॉजी ऐंड मैनेजमेंट में बीटेक दूसरे वर्ष की छात्रा 20 वर्षीया मनीषा राय की खुशी का ठिकाना न रहा.

उन्होंने मोबाइल फोन से इस बोर्ड के साथ सेल्फी ली और गाजीपुर में रहने वाले परिजनों को भेजी. मनीषा कहती हैं, ''लखनऊ से ट्रेन और उसके बाद बस से गाजीपुर के जमानिया में अपने घर जाने में मुझे 12 घंटे लगते हैं.

पूर्वांचल एक्सप्रेसवे बनने के बाद पांच से छह घंटे में मैं अपने घर पहुंच जाऊंगी.'' लोकसभा चुनाव खत्म होते ही मुख्यमंत्री ने अपनी सरकार की महत्वाकांक्षी पूर्वांचल एक्सप्रेसवे परियोजना की गति तेज करने के लिए नियमित समीक्षा शुरू कर दी.

पूर्वांचल एक्सप्रेसवे को 36 महीने में पूरा किया जाना था. मुक्चयमंत्री ने आठ हिस्सों (पैकेज) में बन रहे पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का निर्माण तय समय से एक साल पहले यानी सिर्फ 24 महीनों में पूरा करने का निर्देश दिया है.

इस एक्सप्रेसवे का निर्माण कर रहे उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीडा) को अब इस प्रोजेक्ट को अगले वर्ष अगस्त तक हर हाल में पूरा करने का लक्ष्य मिला है.

आजमगढ़ के नेशनल शिबली कॉलेज के प्रधानाचार्य और राजनीति शास्त्र के विभागाध्यक्ष प्रो. ग्यास असद खान कहते हैं, ''योगी आदित्यनाथ सरकार पिछली समाजवादी पार्टी की सरकार में बने लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे के जवाब में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे को मिसाल के तौर पर पेश करना चाहती है, ताकि विकास के मुद्दे पर सपा को घेरा जा सके.''

इतना ही नहीं, प्रदेश में गंगा एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के निर्माण की तैयारी शुरू कर (देखें ग्राफिक्स) योगी सरकार 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले अपनी झोली विकास परियोजनाओं से भरना चाहती है. आज यूपी देश का पहला राज्य है जहां बड़े पैमाने पर एक्सप्रेसवे से जुड़ी परियोजनाएं या तो शुरू हो चुकी हैं या फिर आने वाले दिनों में शुरू होने वाली हैं.

आगरा एक्सप्रेसवे बनाम पूर्वांचल एक्सप्रेसवे

यूपीडा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अवनीश कुमार अवस्थी बताते हैं, ''2016 में 14,162 करोड़ रुपए में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे बनाने का अनुमान लगाया गया था पर 15,157 करोड़ रुपए पर बिड फाइनल की गई थी. इस तरह अनुमान से ज्यादाकरीब 995 करोड़ रुपए अधिक पर विकासकर्ताओं को निर्माण का काम देने की तैयारी थी.

इस बार सरकार ने बिना टैक्स 11,836 करोड़ रुपए में एक्सप्रेसवे बनाने के लिए खर्च का अनुमान लगाया था. फाइनेंशियल बिड के बाद इसे 11,215 करोड़ रुपए में बनाने का रास्ता साफ हो गया है. यह अनुमान से 621 करोड़ रुपए कम है. इस तरह सरकारी खजाने का करीब 1,616 करोड़ रुपए बचाने में सफलता मिली है.'' पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के निर्माण में नई तकनीकों के प्रयोग से भी खर्च में कमी आई है. आगरा एक्सप्रेसवे की तरह पूर्वांचल एक्सप्रेसवे में सड़क के दोनों ओर ढाल पर नदी के किनारे या पानी वाले इलाकों को छोड़कर पत्थर नहीं लगाए जाएंगे. इनकी जगह मधुमक्खी के छत्ते जैसी आकृति वाले प्लास्टिक के बने 'जियो सेल्स' का प्रयोग होगा. यूपीडा के चीफ जनरल मैनेजर ए.के. पांडेय बताते हैं, ''पत्थर के प्रयोग से एक्सप्रेसवे निर्माण की कीमत बढ़ती है और इनके खनन से पर्यावरण को भी नुक्सान पहुंचता है.'' इसके अलावा पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के आसपास खेती की जमीन होने से यहां मिट्टी की उपलब्धता आसान है, इसने भी लागत घटाई है.

पूर्वांचल एक्सप्रेसवे में बनने वाली सड़क की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए इसमें सामान्य बिटुमेन की जगह रबर के टुकड़े मिले 'क्रंब रबर मोडिफाइड बिटुमेन' का प्रयोग किया जा रहा है. पांडेय बताते हैं, ''रबर के अलावा कुछ जगहों पर पॉलिमर मिले हुए बिटुमेन का भी उपयोग किया जा रहा है. रबर और पॉलिमर पानी नहीं टिकने देते हैं जिससे सड़क जल्दी खराब नहीं होती और इस पर गाडिय़ां भी नहीं फिसलतीं.'' आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर बढ़ती दुर्घटनाओं के मद्देनजर पूर्वांचल एक्सप्रेसवे में कुछ अलग बंदोबस्त किए गए हैं. आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे में सड़क के किनारे ही 'क्रश बैरियर' लगाए गए हैं, मीडियन (आने और जाने वाली सड़क के बीच की जगह) में डिवाइडर बने हैं.

पूर्वांचल एक्सप्रेसवे में मीडियन के दोनों किनारों पर भी 'क्रश बैरियर' लगाए जाएंगे. इससे गाड़ी टकराने के बाद उछलते हुए सड़क के दूसरी ओर नहीं जा पाएगी. आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे में जहां मीडियन की चौड़ाई साढ़े चार मीटर है, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे में इसे साढ़े पांच मीटर रखा गया है. पांडेय बताते हैं, ''दो सड़कों के बीच ज्यादा जगह मिलने पर पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर आधुनिक साइन बोर्ड लगाने में आसानी होगी.'' पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर सुल्तानपुर में एक 3.2 किलोमीटर लंबी हवाई पट्टी भी बन रही है. खास बात यह है कि इस हवाई पट्टी के नीचे से चार नाले निकलेंगे. यह देश की पहली हवाई पट्टी होगी जो किसी पुल पर मौजूद होगी.

जमीन के बदले जमीन

पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होते ही इसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा था. लखनऊ की मोहनलालगंज तहसील के गोसाइगंज इलाके में चांदसराय से शुरू होकर नगराम से गुजरने वाले पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के लिए 14 गांवों की जमीन को अधिग्रहण के लिए चुना गया था. अलग-अलग गांव के सर्किल रेट में भिन्नता होने के कारण मुआवजे को कम बताते हुए डेढ़ सौ किसानों ने एक्सप्रेसवे के विरोध में प्रदर्शन शुरू कर दिया था. राजस्व विभाग के एक अधिकारी बताते हैं, ''पिछले तीन-चार वर्षों से लखनऊ में सरकारी योजनाओं के बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य के चलते सर्किल रेट में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई, क्योंकि ऐसा करने से योजनाओं की लागत बढऩे का खतरा था. इस कारण लखनऊ में भूमि अधिग्रहण में किसानों को दूसरे जिलों की तुलना में काफी कम मुआवजा मिल रहा था.'' इसके बाद प्रशासन ने किसानों को उनकी जमीन के अधिग्रहण के एवज में दूसरी जगह मनपसंद जमीन देने का फॉर्मूला पेश किया जिस पर सहमति बन पाई. सेवानिवृत्ति आइएसएस अधिकारी और यूपीडा में सलाहकार (भू-अधिग्रहण) जे.पी. सिंह बताते हैं, ''पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के लिए कुल 4,377 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है, जिसमें 96.78 फीसद जमीन अधिग्रहित हो चुकी है.

इसमें सबसे ज्यादा 3,770 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण आपसी समझौते से हुआ है.'' अधिग्रहीत भूमि के बदले किसानों को सर्किल रेट का चार गुना मुआवजा दिया गया है. हर तहसील में तहसीलदार को नोडल अधिकारी नामित कर यूपीडा ने किसानों से उनकी जमीन खरीदकर रजिस्ट्री कराई है. रजिस्ट्री के 15 दिन बाद किसान के खाते में पैसा भेज दिया गया है. पर कुछ जगहों पर कुल 139 हेक्टेयर जमीन के अधिग्रहण पर गतिरोध कायम है. आजमगढ़, गाजीपुर और बाराबंकी में सबसे ज्यादा जमीन अधिग्रहीत करने को रह गई है. भारतीय किसान यूनियन के क्षेत्रीय अध्यक्ष हरनाम सिंह वर्मा बताते हैं, ''प्रशासन अधिग्रहीत जमीन का मूल्य हेक्टेयर में आंक रहा है जबकि कई लोग वर्ग मीटर में जमीन खरीद कर उन पर कोई व्यवसाय कर रहे हैं. हेक्टेयर में इन व्यवसाय योग्य जमीन का मूल्य काफी कम आ रहा है. ऐसे में कई लोगों की जीवनभर की कमाई के चले जाने का खतरा है.'' परियोजना को पूरा करने का वक्त करीब आता देख प्रशासन इन जमीन का अधिग्रहण कर मुआवजा घोषित करने की कार्रवाई शुरू करने जा रहा है. जे.पी. सिंह कहते हैं, ''जिनको मुआवजा कम लगता है, वे ट्रिब्यूनल में शिकायत कर सकते हैं.''

गुणवत्ता का खास ख्याल

पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर पडऩे वाले सुल्तानपुर जिले के बड़ा डांट इलाके में निर्माण कंपनी की एक हाइटेक लैब के बाहर लगे बोर्ड में लिखा है, ''गुणवत्ता: सबसे पहले, हर दिन, हर पल, सर्वोत्तम है करना हर बार.'' पिछली सरकार से करीब 1,600 करोड़ रुपए कम में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का निर्माण कर रही प्रदेश सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्ता को लेकर भी है. इसके लिए आठ सेक्टर में बन रहे एक्सप्रेसवे के हर सेक्टर में एक आधुनिक कंक्रीट लैब भी तैयार की गई है. इसमें सभी निर्माण सामग्रियों की गुणवत्ता जांच कर ही उन्हें प्रयोग में लाया जाता है. एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता जांचने के लिए यूपीडा ने चार स्तरीय व्यवस्था की है.

निर्माण एजेंसी की लैब, इसके बाद अथॉरिटी इंजीनियर कंसल्टेंट लैब और फिर यूपीडा की प्रोजेक्ट इंप्लीमेंटेशन लैब में निर्माण कार्य में प्रयुक्त सामान की गुणवत्ता जांची जा रही है. अंत में अंतरराष्ट्रीय एजेंसी राइट्ïस से पूरे निर्माण कार्य का 'थर्ड पार्टी चेकअप' कराया जा रहा है. जाहिर है, मुख्यमंत्री योगी की यह महत्वाकांक्षी परियोजना दूसरी परियोजनाओं से तभी अलग साबित होगी जब यह पूर्वी यूपी में विकास का द्वार खोल पाए.

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