एडवांस्ड सर्च

बैंक का भट्ठा ऐसे बैठाया

जोखिम उठाने को हर वक्त तैयार रहने वाले तेजतर्रार अगुआ कैसे अपनी मगरूर महत्वाकांक्षा से एक बैंक को जमींदोज कर बैठे, बेआबरू यस बैंक के संस्थापक-चेयरमैन राणा कपूर की अनकही दास्तान.

Advertisement
aajtak.in
आनंद अधिकारीनई दिल्ली, 19 March 2020
बैंक का भट्ठा ऐसे बैठाया यस मैन राणा कपूर, यस बैंक के पूर्व एमडी तथा सीईओ असली

आनंद अधिकारी

अशोक कपूर और हरकीरत सिंह ने जब नई पीढ़ी के यस बैंक का ब्लूप्रिंट तैयार किया, तब राणा कपूर बैंकिंग लाइसेंस की इस योजना का हिस्सा नहीं थे. दोनों कपूर ग्रिंडलेज बैंक में साथ काम करते थे और एक दूसरे को निजी, पेशेवर और सामाजिक तौर पर जानते थे. कहा जा सकता है कि कपूर अपने साढ़ू (उनकी पत्नियां बहनें हैं) और अपेक्षाकृत युवा राणा को चुपचाप सह-संस्थापक के तौर पर ले आए. हरकीरत राणा को निजी तौर पर या किसी दूसरे तरीके से नहीं जानते थे, जबकि कपूर ने चालाकी से यह तथ्य छिपा लिया कि उनमें रिश्तेदारी थी. इस तरह सार्वजनिक भरोसे की एक संस्था की बुनियाद ही एक सोचे-समझे छल पर रखी गई थी.

इसके बावजूद 2003 में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की तरफ से 'सैद्धांतिक' लाइसेंस मिलने के बाद इस तिकड़ी ने 2004 में एक निजी बैंक की स्थापना बिल्कुल शून्य से की. एक साल के भीतर हरकीरत ने राणा और कपूर की मिलीभगत का आरोप लगाकर साथ छोड़ दिया. 2005 में यस बैंक आइपीओ के जरिए 355 करोड़ रुपए उगाहने में कामयाब रहा और उसके शेयर का मूल्य 45 रुपए पर आकर टिका. अगला कदम टिकाऊ बिजनेस मॉडल तैयार करना था. कपूर और राणा दोनों जानते थे कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अपनी बाजार हिस्सेदारी गंवाने के रास्ते पर हैं. खुदरा बैंकिंग का बोलबाला था और शीर्ष बैंक—आइसीआइसीआइ, एचडीएफसी और एसबीआइ—होम लोन, कार लोन और क्रेडिट कार्ड के क्षेत्र में होड़ कर रहे थे. राणा ने एक बार कहा था, ''खुदरा बैंकिंग के लिए बड़ी पूंजी न आने से कॉर्पोरेट बैंकिंग हमारे लिए स्वाभाविक पसंद थी.'' बैंक ऑफ अमेरिका और एएनजेड ग्रिंडलेज इन्वेस्टमेंट बैंकिंग में 15 साल के उनके तजुर्बे के मद्देनजर कॉर्पोरेट बैंकिंग में उन्हें विशेषज्ञता भी हासिल थी.

2008-09 तक छोटे आकार के इस बैंक की बैलेंस शीट 22,900 करोड़ रुपए और कर्ज खाता 12,403 करोड़ रुपए का हो चुका था. तभी 26/11 के मुंबई आतंकी हमले में अशोक कपूर की अचानक और दुर्भाग्यपूर्ण मौत हो गई और यस बैंक पूरी तरह कम तजुर्बेकार राणा की झोली में आ गया. उनके मातहत 2009-19 के दस साल में यस बैंक के कर्ज खाते में चौंकाने वाला 10 गुना इजाफा हुआ और यह 22,193 करोड़ रुपए से बढ़कर 2.41 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया.

फिर शुरू हुई गिरावट. खतरे की घंटियां पिछले कुछ समय से बज रही थीं. बैंक की लेखाबही तीन साल से डूबत कर्ज खाते (एनपीए) में बढ़ोतरी दिखा रही थी, संकटग्रस्त कंपनियों को दिए गए कर्ज बहुत ज्यादा थे, साथ ही कॉर्पोरेट राजकाज और अनुपालन में नाकामी से जुड़े मुद्दे भी थे. सितंबर 2018 में आरबीआइ ने राणा के कार्यकाल को जनवरी 2019 तक सीमित कर दिया. दो महीने बाद ग्लोबल रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विसेज ने बैंक की कई मामले में रेटिंग घटा दी. अंत में इस साल मार्च में आरबीआइ ने दखल दिया और इस निजी बैंक को बचाने के लिए बैंक के बोर्ड को हटाकर भारतीय स्टेट बैंक को मुक्तिदाता के तौर पर नियुक्त कर दिया.

चीजें इस मुकाम तक कैसे आईं? बैंक की 3 लाख करोड़ रुपए की परिसंपत्तियों के मुकाबले इसकी बैलेंस शीट में घाटा बहुत ज्यादा है. डूबत कर्ज 50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा होने का अनुमान है. बैंक का बाजार पूंजीकरण घटकर 5,000 करोड़ रुपए से भी नीचे आ गया है और 2 लाख करोड़ रुपए की जमाराशियों के निकाले जाने का खतरा मंडरा रहा है. इस रिपोर्टर से राणा की गिरफ्तारी से कुछ घंटे पहले जब फोन पर उनसे अचानक बातचीत हुई, तो उनका सधा-सा जवाब था, ''मैं पिछले साल जनवरी में बैंक से हट गया था, इसलिए मुझे कुछ नहीं पता.'' मगर उन्हें बेशक पता था कि क्या होने जा रहा है. आखिर वे 2008 में अशोक कपूर की मौत के बाद अकेले संस्थापक रह गए थे और स्थापना के वक्त से ही बैंक के एमडी और सीईओ रहे थे. उनसे आखिर गलती कहां हुई?

राणा कपूर का उत्थान और पतन

राणा के दादा गहने-जेवरात के कारोबार में और पिता पायलट थे. लिहाजा, मेधावी राणा के लिए सब कुछ हमेशा आसान रहा. दिल्ली के फ्रैंक एंथनी पब्लिक स्कूल के पूर्व छात्र, जिन्हें एक्सफैप्सियन कहा जाता है, राणा ने कॉलेज की पढ़ाई के लिए प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) में दाखिला लिया और फिर एमबीए के लिए रटगर्स यूनिवर्सिटी गए. लौटने पर उन्हें नौकरियों के कई ऑफर मिले पर वे विदेशी बैंक में काम करने को उत्सुक थे.

करीब डेढ़ दशक उन्होंने बैंक ऑफ अमेरिका में काम किया और फिर '90 के दशक के मध्य में एएनजेड ग्रिंडलेज बैंक में आ गए. ग्रिंडलेज बैंक में उन्होंने कुछ साल काम किया और इस बीच संपर्कों के धनी राणा ने नीदरलैंड के राबो बैंक को भारत में कारोबार स्थापित करने के लिए राजी कर लिया. उसके भारतीय कारोबार के प्रमुख के तौर पर राणा की सबसे बड़ी उपलब्धि टाटा टी को ब्रिटेन स्थित बड़ी वैश्विक चाय कंपनी टेटले का अधिग्रहण करने की सलाह देना थी. 1,870 करोड़ रुपए का यह सौदा उस वक्त सबसे बड़े सीमा पार सौदों में से एक था. इससे राणा रसूखदारों की जमात में पहुंच गए.

महत्वाकांक्षा उनमें कूट-कूटकर भरी थी. उसे पाने की दिशा में राणा ने कदम बढ़ाए—उस बैंक में भी जिसकी स्थापना की थी और उसके बाहर भी. यस बैंक की 2005-06 का सालाना रिपोर्ट में शेयरधारकों को सीईओ के संबोधन में उन्होंने कहा था, ''हम पेशेगत ईमानदारी, नैतिक मानदंडों और कॉर्पोरेट राजकाज के कठोर नियम-कायदों के अनुपालन के उच्चतम स्तरों को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.''

अशोक कपूर की मौत के बाद राणा को खुली छूट मिली. एक अनुभवी डायरेक्टर कहते हैं, ''बोर्ड पर सीईओ का पूरा कब्जा था.'' वहीं शेयरधारकों के डायरेक्टर उत्तम अग्रवाल कहते हैं, ''मैनेजमेंट की सनक पर स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति की जाती थी.'' अग्रवाल ने राजकाज के मुद्दों को लेकर जनवरी में यस बैंक छोड़ा था. देबयानी घोष, सुभाष चंद्र कालिया और अशोक चावला सहित कई अन्य निजी या दूसरे कारण बताकर पहले ही बैंक को छोड़ चुके थे. कपूर की मौत के बाद बैंक का कोई स्थिर चेयरमैन नहीं रहा.

कपूर के जाने के बाद छह साल में राणा ने सालाना लक्ष्य तय करके पागलपन से भरे जोश का सूत्रपात किया. हरेक नए कर्मचारी से निश्चित संख्या में चालू खाते लाने के लिए कहा गया. एक पूर्व कर्मचारी कहते हैं, ''वे सख्त टास्क-मास्टर थे और अपने कर्मचारियों से बेरहमी से काम करवाते थे.'' नतीजे सामने थे. राणा 2014-15 तक बैलेंस शीट का आकार भारी-भरकम 1,36,170 करोड़ रुपए और लोन बुक 75,550 करोड़ रुपए तक बढ़ाने में कामयाब रहे. बैंक का सकल एनपीए भी बढऩे लगा, पर फिर भी यह अभी महज 0.41 फीसद ही था. 2003 में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी से बैंक में बदले कोटक बैंक की बैलेंस शीट 2014-15 तक 1,06,012 करोड़ रुपए और लोन बुक 66,161 करोड़ रुपए थी.

इस बीच राणा ने नेताओं के साथ मेलजोल और दोस्ती गांठकर खुद को इंडस्ट्री के अगुआ के तौर पर ढालना शुरू कर दिया. इसी का एक उदाहरण 2010 में उनका प्रियंका गांधी-वाड्रा से एम.एफ. हुसैन का बनाया राजीव गांधी का पोट्रेट 2 करोड़ रुपए में खरीदना था. जुलाई 2013 में वे भारतीय वाणिज्य और उद्योग मंडल (एसोचैम) के प्रेसिडेंट बने. मई 2014 में जब केंद्र में सरकार बदली, तब राणा ने भी फुर्ती से पाला बदल लिया. एसोचैम के प्रेसिडेंट की हैसियत से नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि वोटरों ने तथाकथित किंगमेकरों को किनारे कर दिया है और ''सख्त संदेश दिया है कि देश को तंग नजरिए की राजनीति से कमजोर नहीं किया जा सकता, जो अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय छवि को पहले ही बहुत नुक्सान पहुंचा चुकी है.''

एसोचैम की अध्यक्षता राणा को उद्योगजगत और सरकार के तौर-तरीकों के ज्यादा नजदीक ले आई. कई अंदरूनी लोग उन्हें जोखिम उठाने के लिए तैयार शख्स के तौर पर देखते थे और राणा को भी दबावग्रस्त कंपनियों पर दांव खेलने से कोई गुरेज नहीं था, बशर्ते उन्हें थोड़ा ज्यादा ब्याज मिले और जमानतें अच्छी हों. गोल्फ के उत्साही खिलाड़ी राणा ज्यादातर प्रमोटरों से सीधे सौदे करते. जानने वाले बताते हैं, ''सौदा तय होने के बाद बैंक के अफसर उसके उचित या अनुचित होने पर विचार करना शुरू करते. मगर जोखिम की वजह से कोई भी कर्ज नामंजूर नहीं किया गया.'' बहुत ज्यादा कर्जों से दबी और ब्याज तक नहीं चुका पा रही कई कंपनियां— जिनमें रिलायंस एडीएजी ग्रुप, डीएचएफएल, एचडीआइएल, एस्सेल ग्रुप, कैफे कॉफी डे और जेट एयरवेज भी थीं—धन के लिए उनके दरवाजे पर आईं (देखें बड़े खोटे सौदे).

सबसे ज्यादा कर्ज लेने वाले रिलायंस एडीएजी ग्रुप ने कहा कि वह अपने बहुत-से संपत्ति मौद्रीकरण के जरिए अपनी सारी उधारियां चुकाने के लिए वचनबद्ध है. इस बीच डीएचएफएल के मामले में—जिसमें उन्होंने अपने परिवार की मिल्कियत वाली कंपनियों को 600 करोड़ रुपए के बदले 3,700 करोड़ रुपए के कर्ज दिए—प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) राणा से पूछताछ कर रहा है. ईडी का दावा है कि राणा की पत्नी बिंदु कपूर और उनकी तीन बेटियों राधा कपूर खन्ना, राखी कपूर टंडन और रोशनी कपूर की मिल्कियत वाली फर्जी कंपनियों को रिश्वत के रूप में कुल 5,000 करोड़ रुपए की रकम मिली.

यस बैंक के बाहर साम्राज्य

आरबीआइ के दिशानिर्देशों के मुताबिक, निजी क्षेत्र के बैंक मालिकों के लिए यह जरूरी है कि वे अपनी शेयर हिस्सेदारी घटाकर 15 साल में 15 फीसद पर लाएं. शायद इसी के चलते वे उद्यमशीलता की अपनी पुरजोर ललक दूसरी जगहों पर पूरी करने या ऐसी कंपनियां बनाने को बाध्य हो जाते हैं जिनके वे मालिक हों और जिन्हें अपने बच्चों को सौंप सकें. राणा अपनी बेटियों को उद्यमी बनने के लिए तैयार कर रहे थे. उनकी सबसे बड़ी बेटी राधा को डूइट क्रिएशंस नाम की कंपनी की जिम्मेदारी सौंप दी गई, जो डिजाइनर कपड़ों की ड्राइ क्लीनिंग और लॉन्ड्री से लेकर अमेरिका के पार्संस डिजाइन स्कूल से संबद्ध डिजाइन स्कूल, स्पोर्ट मैनेजमेंट, मीडिया, शिक्षा और मनोरंजन से जुड़े कारोबार करती थी. उनकी मझली बेटी राखी ने कुछ वक्त रणनीतिक पहल के बिजनेस मैनेजर के तौर पर प्रशिक्षण लिया. पारिवारिक कारोबारों में धन लगाने वाली प्रमुख कंपनियां थीं मॉर्गन क्रेडिट और यस कैपिटल, जिनमें उनकी तीनों बेटियों (सबसे छोटी रोशनी सहित, जिसे पिछले हक्रते लंदन की उड़ान पकड़ते वक्त हिरासत में ले लिया गया) में से हरेक की 33.35 फीसद हिस्सेदारी है. राणा की निजी हिस्सेदारी के अलावा इन दोनों कंपनियों की यस बैंक में 12 फीसद हिस्सेदारी थी.

ईडी के मुताबिक, कपूर परिवार ने कथित तौर पर रिश्वत में हासिल सारी रकम मुंबई और दिल्ली की महंगी संपत्ति में लगा रखी है (देखें राणा कपूर की संपत्ति). यहां तक कि राणा ने मुंबई में अल्टामाउंट रोड पर अरबपति मुकेश अंबानी के एंटीलिया की बगल में एक जायदाद महज 18 महीने पहले खरीदी. इन संपत्तियों की मिल्कियत नियंत्रक कंपनी आरएबी एंटरप्राइज के मातहत है.

कपूर बनाम कपूर

राणा की हैसियत और बैंक पर उनका नियंत्रण जैसे-जैसे बढ़ता गया, उनके दिवंगत सह-संस्थापक का परिवार, जिसके पास बैंक की 12 फीसद हिस्सेदारी थी, लगातार दरकिनार होता गया. राणा को बोर्ड के निदेशकों की नियुक्ति में खुली छूट हासिल थी, पर अशोक कपूर के परिवार को यही छूट देने से इनकार कर दिया गया, जबकि आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के मुताबिक 'इंडियन पार्टनर्स' होने के नाते उन्हें बैंक के बोर्ड में तीन निदेशकों की नियुक्ति के संयुक्त अधिकार हासिल थे. राणा ने मधु कपूर के साथ कुछ हड़बड़ मुलाकातें और चिट्ठियों की अदला-बदली जरूर की, जो चाहती थीं कि उनकी बेटी शगुन गोगिया को बैंक के बोर्ड में लिया जाए, पर आखिरकार यह कहकर इनकार कर दिया कि उसके पास उस बैंक में, जिसके उन्होंने पेशेवर ढंग से संचालित होने का दावा किया, योगदान के लिए 'अनुभव और विशेषज्ञता' नहीं है. मां-बेटी ने दोस्तों और रिश्तेदारों के दरवाजे भी खटखटाए, पर कोई फायदा नहीं हुआ.

आखिरकार 2013 में मधु ने अदालतों के दरवाजे पर दस्तक दी. शगुन ने आरोप लगाया, ''राणा अंकल ने इसे आधुनिक जमाने का महाभारत बना दिया है.'' इस अप्रिय लड़ाई में उद्योगजगत के कई लोगों ने मां-बेटी के साथ सहानुभूति जताई. मामले की सुनवाई कर रहे जज न्यायमूर्ति एस.जे. कथावाला तब हतप्रभ रह गए जब उनका घर एसोचैम के न्यूजलेटरों से पट गया. जज ने राणा के वकील से कहा, ''अपने मुवक्किल से कहिए कि मुझे ये न्यूजलेटर न भेजें. उनमें प्रधानमंत्री और दूसरे मंत्रियों के साथ उनकी तस्वीरें ही ज्यादा होती हैं, पढऩे लायक तो कुछ होता नहीं.''

अदालती लड़ाई से बाजार को राणा के दबंग तौर-तरीकों की पहली झलक मिली. उनकी साली ने जब कॉर्पोरेट राजकाज से जुड़े मुद्दे उठाने शुरू किए, तब यस बैंक के गड़बड़झाले बाहर आने लगे. आरोपों में यह भी था कि बैंक ने परिवार की कंपनियों के लिए राणा के घर का पता कैसे दिया. अदालत का फैसला मधु और शगुन के हक में गया.

गर्त की ओर

कड़वाहट भरी कानूनी लड़ाई से राणा की छवि को बट्टा लगा पर बैंक पर कोई आंच नहीं आई. उसकी मुश्किलें दूसरे कोनों और हलकों से दाखिल हुईं. एक तो, यस बैंक की फंडिंग प्रोफाइल बहुत मजबूत नहीं थी. बचत खाते और चालू खाते की जमाराशियां, जो किसी भी बैंक की बुनियादी जरूरत और आधार होती हैं, महज 20 फीसद थीं, जबकि आम तौर पर उनका मानक स्तर 40-45 फीसदी होता है. खुदरा बैंकिंग के विस्तार की योजनाएं कागजों पर ही रहीं.

धनशोधन अक्षमता और दिवालिया संहिता, नोटबंदी और जल्दबाजी में जैसे-तैसे लागू किए गए माल तथा सेवा कर जैसे नीतिगत हस्तक्षेपों के कारण समस्याग्रत आर्थिक माहौल में बैंक ने कॉर्पोरेट इंडिया पर बड़ा जुआ खेलना शुरू किया और रियल एस्टेट, निर्माण, बिजली और एनबीएफसी सेक्टर की कई दबावग्रस्त कंपनियों की सहायता के लिए आगे आया. मसलन, रियल एस्टेट क्षेत्र में ही बैंक के कर्ज 24,000 करोड़ रुपए के बराबर हैं.

लेकिन 2015-16 में जब आरबीआइ के गवर्नर रघुराम राजन ने बैंकों की संपत्ति गुणवत्ता समीक्षा का फरमान दिया तो मामला गड़बड़ा गया. इससे यस बैंक की लेखाबहियों में कई सारे बढ़ते एनपीए का खुलासा हुआ. वित्त वर्ष 2016 में वे बढ़कर 2,299 करोड़ रुपए, 2018 में 6,355 करोड़ रुपए और वित्त वर्ष 2019 में 3,177 करोड़ रुपए हो गए.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay