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कट की बड़ी कीमत

तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में रिश्वत के प्रचलन पर ममता बनर्जी की स्वीकारोक्ति पार्टी के सितारे गर्दिश में डालेगी या फिर उनकी छवि लोगों में भ्रष्टाचार से लडऩे वाली योद्धा की बनाने में मददगार होगी.

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रोमिता दत्तानई दिल्ली, 09 July 2019
कट की बड़ी कीमत कट की रकम देने वाली सूची को दिखाते वीरभूम जिले के गांव पाइकपाड़ा के लोग

कोलकाता में 18 जून को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के एक खुले मंच से ममता बनर्जी ने एक बड़ी नामुमकिन सरीखी स्वीकारोक्ति कर डाली. उन्होंने इस बात पर निराशा जाहिर की कि तृणमूल नीचे तक भ्रष्टाचार के गर्त में डूबी हुई है और अब समय आ गया है कि इस पर सक्चती से काबू पाया जाए. ममता ने कहा भी, ''मुझे पार्टी में चोर नहीं चाहिए. जिन्होंने लोगों से पैसा लिया है, वे जाकर उन्हें लौटा दें. आप लोग तो मुर्दों को भी नहीं छोड़ रहे हैं और गरीबों को अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए सरकार से मिल रहे 2,000 रुपए में से भी 10 फीसदी कमिशन वसूल ले रहे हैं.''

इस टिप्पणी से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने 'कट वसूली' की संस्कृति पर से परदा हटा दिया जिसके बारे में भाजपा हमेशा से आरोप लगाती रही है कि बंगाल में तृणमूल के शासन में इसको वैधता मिल गई है. आरोप रहा है कि गरीब से गरीब व्यक्ति को भी केंद्र या राज्य सरकार का कोई अनुदान हासिल करने के लिए स्थानीय टीएमसी नेताओं को कमिशन देना पड़ता है.

लेकिन ममता की इस स्वीकारोक्ति का इससे खराब समय और नहीं हो सकता था. इसका मूल मकसद भले ही छवि को बदलने की कवायद करने का रहा हो लेकिन प्रचार में इसका असर उलटा रहा और इसने विपक्षी दलों को तृणमूल के खिलाफ नए हथियार दे दिए हैं. भाजपा राज्य भर में विरोध प्रदर्शन कर रही है और उसका आरोप है कि वसूली करने वालों के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज कराने वाले कैडर पर तृणमूल के लोग हमले कर रहे हैं. कई जगहों पर स्थानीय तृणमूल नेताओं की उन लोगों ने घेराबंदी भी की है जो जड़ तक पहुंचे इस भ्रष्टाचार से पीडि़त रहे हैं. इनमें से एक शंकर बागड़ी जैसे गरीब ग्रामीण भी हैं.

'कीमत' तो चुकानी होगी

बागड़ी बीरभूम जिले के सैंथिया इलाके में पाइकपाड़ा से हैं. उन्होंने एक पक्का मकान बनाने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमएवाइ-जी) के तहत अनुदान के लिए आवेदन किया था. तीन साल पहले जब से उनका नाम लाभार्थियों की सूची में आया था, तब से बागड़ी तृणमूल के स्थानीय दफ्तरों के चक्कर काटे जा रहे हैं और पंचायत के सदस्यों से मिल रहे हैं. उनका आरोप है कि इस साल जब उन्होंने तृणमूल के स्थानीय आकाओं को 7,000 रु. की रिश्वत दी तब जाकर पीएमएवाइ की 40,000 रु. की पहली किस्त उनको मिली. चूंकि वे और 3,000 रु. की रिश्वत देने में नाकाम रहे, इसलिए उन्हें डर लग रहा है कि अनुदान के बाकी बचे 80,000 रुपए शायद उन्हें नहीं मिल पाएंगे. लिहाजा इस मॉनसून में बागड़ी का मकान अधबना ही रह गया है—उसकी न छत है और न ही दीवारें.

सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाला अनुदान दरअसल प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण होता है. लेकिन लाभार्थी आरोप लगाते हैं कि कट-वसूली की मांग करने वाले तृणमूल के नेता उनके बैंक और पोस्ट ऑफिस दस्तावेज जैसे पासबुक और नगद निकासी पर्ची आदि कब्जे में कर लेते हैं. बीरभूम में हटोड़ा पंचायत के एक गांव में रहने वाले सुखदेव दोलुई कहते हैं, ''वे अनुदान राशि का एक-एक पैसा निकाल लेने के बाद ही कागजात लौटाते हैं. हमें पैसा निकासी पर्ची पर दस्तखत कर उन्हें सौंपने के लिए मजबूर किया जाता है.''

अब चाहे वह मनरेगा का वेतन हो, शौचालय बनाने के लिए अनुदान हो, पीएमएवाइ-जी का पैसा हो या स्कूल शिक्षकों की भर्ती, बिना 'कीमत' चुकाए कोई काम आगे नहीं बढ़ता. हटोड़ा पंचायत के निवासी श्यामल बागड़ी कहते हैं, ''मुझे मनरेगा जॉब कार्ड के लिए 7,000 रु. की घूस देनी पड़ी. जब मैं बकाया लेने के लिए गया तो पाया कि पंचायत रिकॉर्ड में मेरे जॉब कार्ड के आगे दो अन्य नाम लिखे हुए थे.'' उनका आरोप है कि तृणमूल नेता और पंचायत अध्यक्ष ने उन्हें ठगा है.

बीरभूम जिला परिषद के सभाधिपति बिकाश रायचौधरी का कहना है कि पाइकपाड़ा और बेलिया में मनरेगा के तहत 22 लाख रु. की गड़बड़ी की जांच चल रही है. उन्होंने भरोसा दिलाया कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

आलोचक कहते हैं कि इस तरह का भ्रष्टाचार वाम मोर्चे के शासन में भी मौजूद था लेकिन दूरदराज के स्थानों पर. वहां भी वह काम पूरी तरह से चोरी-छिपे होता था. विधानसभा में कांग्रेस के मुख्य व्हिप मनोज चक्रवर्ती कहते हैं, ''व्यक्ति को कीमत चुकानी पड़ती है, चाहे वह किसी सरकारी फंड को पाने के लिए हो, या स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में नौकरी पाने के लिए या कॉलेज में एडमिशन या अस्पताल में बिस्तर पाने के लिए. आठ साल (तृणमूल के शासनकाल) में यह सामान्य प्रक्रिया हो गई है.''

स्वीकारोक्ति का समय

कट-वसूली के बारे में ममता की स्वीकारोक्ति ने तृणमूल में संकट में इजाफा ही किया है. ममता इस बात से भी वाकिफ हैं कि भाजपा की चुनौती से जूझने के लिए पार्टी का पुनर्गठन करने और इसकी नई ब्रांडिंग करने का मतलब होगा एकदम नए सिरे से शुरुआत करना. तृणमूल को लोकसभा चुनावों में अपनी अब तक की सबसे बड़ी पराजय झेलनी पड़ी जब उसकी सीटों की संख्या 2014 में 34 से गिरकर 2019 में 22 रह गई. भाजपा का वोट प्रतिशत 40 फीसदी हो गया और सीटों की संख्या पिछले चुनावों में दो से बढ़कर 18 हो गई. यह बंगाल में उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. वह अब 2021 के विधानसभा चुनावों में राज्य में सत्ता पर कब्जा करने की फिराक में है. इन नतीजों से सदमा खाई ममता की हताशा हाल की कई घटनाओं में साफ नजर आती है. जैसे कि जय श्री राम का नारा लगाने वाले भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर बवाल, बांग्ला न बोलने के लिए 'बाहरी' लोगों के खिलाफ गुस्सा और पिछले महीने डॉक्टरों की हड़ताल से निबटने में कोताही. इसके अलावा उन्हें बड़ी संख्या में पार्टी नेताओं के पाला बदलकर भाजपा में शामिल होने का भी सामना करना पड़ रहा है.

कोलकाता की प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी मंक प्रोफेसर एमेरिटस और समाज विज्ञानी प्रशांत रे का कहना है, ''ममता बनर्जी को अपनी पार्टी पर भाजपा के निरंतर आक्रमण से लोगों का ध्यान हटाने के लिए कोई तो क्रांतिकारी कदम उठाना ही था. आम लोगों में 'कट-मनी' एक बड़ी शिकायत रही है. लोगों की शिकायत पर ध्यान देने और उनसे फिर से नाता जोडऩे का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता था कि अपनी गलती मान लें और माफी मांगें.''

कलकत्ता यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के पूर्व प्रोफेसर सोवोन लाल दत्ता गुप्ता इसे छवि बदलने की कोशिश के तौर पर देखते हैं. वे कहते हैं, ''ममता न केवल खुद को लोगों का पैसा लूटने वाले तृणमूल के नेताओं से अलग करने की कोशिश कर रही हैं बल्कि खुद को भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा के तौर पर भी पेश कर रही हैं जो अपनी पार्टी के लोगों पर भी कड़ी कार्रवाई करने से नहीं हिचकेंगी.''

कार्रवाई हुई भी है. मालदा जिले में रातुआ में महानंदातला के ग्राम प्रमुख सुकेश जादव को शौचालयों के लिए स्वीकृत फंड में धांधली करके एक करोड़ रुपए बटोरने के आरोप में गिरक्रतार किया गया है. तृणमूल के एक नेता का कहना था, ''हमने 18 लोगों को सीखचों के पीछे डाल दिया है. अब तक मिली सभी 1,200 शिकायतों में पुलिस और आर्थिक अपराध शाखा की ओर से कार्रवाई की गई है.''

आग फैल रही है

मौके का फायदा उठाते हुए भाजपा ने बीरभूम, बर्धमान, नादिया, पश्चिम मिदनापुर, कूच बिहार, बांकुड़ा और कोलकाता जिलों में तृणमूल पदाधिकारियों के घरों और कार्यालयों में कथित तौर पर तोड़-फोड़ और विरोध प्रदर्शन आयोजित किए हैं और कट मनी के पैसे वापस करने की मांग की गई है. सैकड़ों तृणमूल पदाधिकारी अपने इलाके से भाग गए हैं, अनेक ने लिखित में वचन दिया है कि वे कट मनी वापस करेंगे. कई क्षेत्रों में विरोध और हिंसा के कारण स्थिति हाथ से निकल रही है. तृणमूल के एक बूथ एजेंट पूर्णेंदु चट्टोपाध्याय पूर्वी बर्धमान में एक पेड़ से लटके हुए पाए गए. राज्य सरकार की 100 दिनों की कार्य योजना के पर्यवेक्षक शेख हबीबुल को बर्धमान में पेड़ से बांध दिया गया और भीड़ ने उनकी पिटाई की. कलना के एक पर्यवेक्षक दुलाल प्रमाणिक ने आत्महत्या कर ली.

मिदनापुर की एक तृणमूल पार्षद मौ रे हाजरा पर निर्माण योजनाओं को मंजूरी देने के लिए 3.5 लाख रु. की रिश्वत लेने के आरोप लगे हैं. उन्होंने दावा किया है कि कट-मनी का हिस्सा पार्टी के शीर्ष नेताओं तक पहुंचता है. वे कहती हैं, ''दीदी ने दुनिया के सामने खुद को सबसे ईमानदार और बाकी सबको बेईमान साबित करने की कोशिश करके हमारी जान खतरे में डाल दी है.''

राज्य सरकार ने अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून और व्यवस्था) ज्ञानवंत सिंह को निर्देश दिया है कि वे रिश्वत लेने वालों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 409 के तहत केस दर्ज कराएं. पुलिस को यह भी निर्देश दिया गया है कि वह इस मुद्दे पर कानून और व्यवस्था को तोडऩे की कोशिश कर रहे लोगों पर सक्चती से कार्रवाई करे. हटोरा पंचायत के देरपुर गांव में प्रदर्शनकरियों पर पुलिस कार्रवाई में कथित तौर पर महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया.

पार्टी की छवि खराब होती दिखी तो तृणमूल के वरिष्ठ मंत्री पार्थ चटर्जी ने घोषणा की कि ऐसी गड़बडिय़ों में ज्यादातर वे नेता लिप्त पाए गए हैं जो तृणमूल छोड़कर दूसरी पार्टियों में चले गए हैं. उन्होंने कहा, ''एक या दो मामले ही सही हैं. ज्यादातर मामलों में भाजपा कार्यकर्ता तृणमूल कार्यकर्ताओं और नेताओं से अपना राजनैतिक हिसाब चुकता करने के लिए उन पर झूठे आरोप लगा रहे हैं.''

तृणमूल को उम्मीद है कि कट मनी लौटाने का ममता का जुमला मास्टरस्ट्रोक साबित होगा क्योंकि उससे उनकी छवि एक ऐसे नेता की बनेगी जो आम जनता को प्रभावित करने वाले सूक्ष्म स्तर तक के भ्रष्टाचार से लडऩे को प्रतिबद्ध है लेकिन फिलहाल तो पार्टी की छवि को नुक्सान पहुंचा है. भाजपा ने तृणमूल पर हमले के इस मौके को भुनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है लेकिन इसका फायदा दरअसल किसे हुआ, यह बाद में पता चलेगा. ठ्ठ

''अगर मैं अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को कड़ी मेहनत करने और सरकारी पैसे का दुरुपयोग न करने के लिए अनुशासन में लाने की कोशिश कर रही हूं तो इसमें भला गलत क्या है?''

ममता बनर्जी

मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल

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