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जानें किस तरह जम्मू-कश्मीर की जनता ने हर पार्टी को दी सजा

खंडित जनादेश बता रहा है कि जनता ने हर दल को उसके रवैए के लिए कोई न कोई सजा दी. जनता ने जाहिर कर दिया कि लुभावन चेहरे उन्हें जाल में फंसा नहीं सकते.

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ज्योति मल्होत्रानई दिल्ली, 29 December 2014
जानें किस तरह जम्मू-कश्मीर की जनता ने हर पार्टी को दी सजा

जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के नतीजे 23 दिसंबर को आते ही ऐसा लगा कि जनाकांक्षाओं के बैरोमीटर ने पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) को पटखनी दे दी है. बीजेपी को 25 सीटें मिलने से उसके बेलगाम जोश को सांप सूंघ गया. सिर्फ 28 सीटों पर जीत ने पीडीपी को इस कदर सदमे में डाल दिया कि वह राज्य में सबसे बड़े दल के रूप में उभरने का जश्न मनाने से भी संकोच करती दिखी.

नतीजों से 24 घंटे पहले पीडीपी को पूरा भरोसा था कि राज्य में अगली सरकार उसकी बनेगी. अब राहत की बात बस यही है कि मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी ने बीजेपी के विजय रथ को जवाहर सुरंग पर ही रोक दिया. बीजेपी ने घाटी में 46 में से 34 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें से 33 की जमानत जब्त हो गई.

जम्मू क्षेत्र में अप्रत्याशित 25 सीटें जीतकर बीजेपी बच्चों की तरह ताली पीटती दिखी. राज्य में पार्टी के चुनाव प्रचार संचालक महासचिव राम माधव यह बताते हुए अपनी खुशी छिपा नहीं पा रहे थे कि राज्य में पहली बार कोई मुस्लिम उम्मीदवार बीजेपी के टिकट पर जीता है. कालाकोट में बीजेपी के अब्दुल गनी कोहली ने नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के हिंदू उम्मीदवार रछपाल सिंह को हराकर राज्य में नया राजनैतिक इतिहास रचा.

राम माधव ने बीजेपी की इस जीत को जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी को समर्पित किया जिन्होंने राज्य में अनुच्छेद 370 लागू किए जाने के विरोध में 1953 में कश्मीर जाते हुए एक कश्मीरी जेल में प्राण त्यागे थे.

पीडीपी के लिए इससे भी बड़ा झटका यह है कि बीजेपी ने राज्य में सबसे अधिक 23 प्रतिशत वोट झटक लिए, जबकि उसके हिस्से 22.6 प्रतिशत वोट आए. नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सिर्फ 15 सीटें जीती पर 20.7 प्रतिशत वोट ले गई. कांग्रेस ने सीटें तो 12 जीतीं पर उसे वोट 6.8 प्रतिशत ही मिले. बेशक, बीजेपी को अधिकतर वोट जम्मू क्षेत्र से मिले हैं, जबकि अन्य दलों की तीनों क्षेत्रों में पैठ है.

पर हुआ क्या? कश्मीर की राजनीति में 1958 से सक्रिय सबसे चतुर खिलाड़ी मुफ्ती मोहम्मद सईद और खानदान की सीट अनंतनाग से सांसद बेटी महबूबा से चूक कहां हो गई?

चुनाव नतीजों पर गौर करें तो राज्य में 87 में से 17 सीटों पर हार-जीत का अंतर 1,500 वोट से भी कम का रहा. बीरवाह में निवर्तमान मुख्यमंत्री, नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस के नजीर अहमद खान को सिर्फ 910 वोट से शिकस्त दी.
जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव 2014 परिणाम
इन 17 सीटों में से 11 पर पीडीपी की हार हुई. 18वीं सीट शंगस पर पीडीपी 2,189 वोट से हारी. मंगलवार की रात पार्टी कार्यालय में जश्न की रात होनी चाहिए थी लेकिन वहां फैली निराशा की चादर पर कुछ ऐसे नाम लिखे थेः

सोनावरी (406 वोट से हार), पहलगाम (904 वोट से हार), कुपवाड़ा (151 वोट से हार), देवसर (1,511 वोट से हार), ईदगाह (608 वोट से हार), गांदरबल (597 वोट से हार), होम शाली बाग (1,269 वोट से हार), कंगन (1,432 वोट से हार), खानसाहिब (1,109 वोट से हार), खनियार (1,167 वोट से हार) और कुलगाम (334 वोट से हार).

इस खंडित जनादेश का मुख्य संदेश यही है कि लोगों ने हर पार्टी को कुछ न कुछ सजा दी है. घाटी और लद्दाख में बीजेपी की हार का कारण धार्मिक गोलबंदी और अनुच्छेद 370 पर भ्रमित संदेश रहे. ऊधमपुर से सांसद, प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने जब संविधान में राज्य को विशेष दर्जा देने वाली धारा हटाने का ऐलान किया तो श्रीनगर में अमीराकदल से पार्टी उम्मीदवार हिना भट ने एके-47 राइफल उठाने की धमकी दे डाली.

पीडीपी खुद को उस गद्दी का सही दावेदार पेश करने में नाकाम रही, जो उमर अब्दुल्ला ने 2013 में अफजल गुरु की फांसी और 2014 में आई बाढ़ में अपनी गलतियों की वजह से उसे तश्तरी में परोसी थी.

श्रीनगर में जानकारों का मानना है कि पीडीपी असल में खुद को बीजेपी से अलग नहीं दिखा पाई. 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी ने जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी नेताओं के साथ इनसानियत के दायरे में बात करने का जो ऐलान किया था, उसे पीडीपी ने बड़ी शिद्दत से याद किया और मोदी की बीजेपी से रिश्तों को लेकर अपने कार्यकर्ताओं को उलझन में डाल दिया.

श्रीनगर में इन अफवाहों को दबाने की भी कोई कोशिश नहीं हुई कि मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के फौरन बाद मुफ्ती साहब को फोन पर हलो कहा था. महबूबा भी बाढ़ के बाद सहायता की मांग के लिए अपने सांसदों के साथ मोदी से मिली थीं.

एक जानकार का कहना था, ‘‘लोगों ने पीडीपी को इसलिए सजा दी कि उसे लगा कि यह पार्टी बीजेपी को गले लगा लेगी, जबकि उमर अब्दुल्ला बार-बार कह रहे थे कि वे ऐसा कभी नहीं करेंगे. महबूबा और मुफ्ती सईद या तो उतनी मजबूती से खुद को मोदी से अलग नहीं कर पाए या किया भी तो देर से.’’

इसमें शक नहीं कि कश्मीरी गुत्थी का हल जल्दी निकल आएगा. राज्य के विवादित दर्जे के के बारे में अक्सर जनाकांक्षाओं की दुहाई दी जाती है. इस बार कश्मीरियों ने रिकॉर्ड 66 प्रतिशत मतदान किया है, जो 1987 के तथाकथित धांधली वाले चुनाव से भी ज्यादा है. उन्होंने फिर जाहिर कर दिया है कि उनकी अपनी निश्चित सोच है और देश के अन्य हिस्सों की पार्टियों के लुभावन चेहरे उन्हें जाल में नहीं फंसा सकते.

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