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उत्तर प्रदेश: नए समीकरण की तलाश में जाट

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जाट मतदाता एक बार फिर नए समीकरणों की तलाश में है.

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aajtak.in
आशीष मिश्र लखनऊ, 23 November 2016
उत्तर प्रदेश: नए समीकरण की तलाश में जाट मेरठ के डाबका गांव में जाट रैली में सामने आई नई जाट एकता

अब से तीन वर्ष पहले सांप्रदायिक दंगे की मार झेल चुके जाट लैंड (देखें ग्राफिक्स) में नए मुद्दों और सियासी राजनीति की फसल तैयार होने लगी है. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम विरोधी माहौल के चलते भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पक्ष में एकतरफा लामबंद होने वाले जाट समुदाय में अगले विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर ध्रुवीकरण की जमीन तैयार हो रही है. लेकिन इस बार मुद्दा अलग है. मेरठ जिला मुख्यालय से 8 किलोमीटर दूर दिल्ली बाइपास पर मौजूद डाबका गांव में 6 नवंबर को जाट संकल्प रैली में जुटी भीड़ ने जाट बेल्ट के मुख्य मुद्दों को साफ कर दिया. पिछले लोकसभा चुनाव में सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण दिखाने वाला जाट समुदाय विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण के मुद्दे पर लामबंद हो रहा है.

येपार्टियां आजमा रही हैं जाटलैंड में अपनी किस्मतइसकी वजहें भी हैं. पिछले वर्ष 15 मार्च को सुप्रीम कोर्ट से केंद्रीय सेवाओं में जाटों को मिलने वाला आरक्षण खत्म होने के बाद बने माहौल में केंद्र की बीजेपी सरकार इस मुद्दे पर कोई ठोस कार्ययोजना लेकर सामने नहीं आ पाई है. गुस्साए जाट समुदाय ने अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सभी छह मंडल मुख्यालयों पर जाट संकल्प रैली और दिसंबर के पहले हफ्ते से पश्चिमी यूपी की सभी जाट प्रभाव वाली विधानसभा सीटों पर संकल्प यात्राएं निकालकर आरक्षण के मुद्दे पर लामबंद होने की तैयारी की है.

असल में यूपी में पहली विधानसभा सीट संख्या सहारनपुर से शुरू होकर पीलीभीत-शाहजहांपुर तक फैली जाट बेल्ट की भौगोलिक स्थिति भी अगले विधानसभा चुनाव में राजनैतिक पार्टियों की रणनीति के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हो गई है. अगर कई चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव का पहला और दूसरा चरण जाट बेल्ट में हुआ तो यहां बाजी मारने वाले दल के लिए आगे के चरणों का रास्ता आसान हो जाएगा. इसी को ध्यान में रखते हुए भी सभी राजनैतिक पार्टियों ने इसी जाट बेल्ट में अपनी ताकत झोंक दी है. यूपी में पिछड़ों की कुल आबादी में जाटों का प्रतिशत भले ही 3.60 फीसदी (देखें ग्राफिक्स) है लेकिन पश्चिम के कुछ जिलों में अपनी सघनता के चलते ये राजनैतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हो गए हैं.

पिछला प्रदर्शन दोहराने की चुनौती
पिछले लोकसभा चुनाव में बागपत को छोड़कर जाट लैंड की सभी दो दर्जन लोकसभा सीटों पर जाट समुदाय ने बीजेपी को एकतरफा वोट किया था. बागपत लोकसभा सीट पर राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) अध्यक्ष अजित सिंह ही दो लाख से अधिक जाट मतदाताओं का समर्थन ले पाए थे हालांकि उन्हें भी बीजेपी के उम्मीदवार सतपाल सिंह से हार का सामना करना पड़ा था. पहली बार चार जाट सांसद जिताने वाली बीजेपी के लिए यूपी का विधानसभा चुनाव चुनौतीपूर्ण हो चुका है. अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक बताते हैं, ''जाट आरक्षण के मुद्दे पर केंद्र सरकार के रुख से नाराजगी है. इस बार विधानसभा चुनाव में जाट बीजेपी को हराने के लिए वोट करेंगे." डैमेज कंट्रोल के लिए बीजेपी ने भी अपने शीर्ष नेताओं को पश्चिमी यूपी में उतार दिया है. 5 नवंबर को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सहारनपुर से परिवर्तन यात्रा की शुरुआत की. वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी सरकार के दो वर्ष पूरा होने पर 27 मई को एक रणनीति के तहत सहारनपुर में रैली की. रैली के मंच पर केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान, बागपत के सांसद सतपाल सिंह, बिजनौर के सांसद कुंवर भारतेंद्र सिंह समेत कुल पांच जाट नेताओं को जगह देकर नरेंद्र मोदी ने जाट मतदाताओं में सेंधमारी के इरादे जाहिर कर दिए. बीजेपी बालियान समेत अपने जाट नेताओं को आगे कर रालोद अध्यक्ष अजित सिंह की घेराबंदी करने की कोशिश में है. जाट बेल्ट से गुजरने वाली पार्टी की परिवर्तन यात्राओं में सभी जाट सांसदों और नेताओं को मौजूद रहने का फरमान सुनाया गया है.

जाट स्वाभिमान की बात

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में बेहद निराशाजनक प्रदर्शन से उबरने की कोशिश में राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष अजित सिंह ने जाट स्वाभिमान का सहारा लिया है. दिल्ली में चौधरी चरण सिंह का बंगला खाली करवाने, आरक्षण जैसे मुद्दों को लेकर अजित सिंह के प्रति जाट समुदाय में सहानुभूति है. बड़ौत के जनता वैदिक कॉलेज में 4 अक्तूबर को स्वाभिमान रैली में अजित सिंह ने एक मंच पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राज्यसभा सांसद शरद यादव समेत कई छोटे दलों के नेताओं को जुटाकर अपने जाट समर्थकों के सामने शाक्ति प्रदर्शन किया. इसी रैली में अजित सिंह ने बेटे और रालोद के राष्ट्रीय महासचिव जयंत चौधरी को यूपी के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर जाट समुदाय को अपना मुख्यमंत्री होने का सपना भी दिखाया. मुजफ्फरनगर दंगे के बाद जाट-मुस्लिम समुदाय के बीच बनी दूरियों को पाटने के लिए भी अजित सिंह पूरी कोशिश कर रहे हैं. डॉ. मसूद अहमद को रालोद का प्रदेश अध्यक्ष बनाने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी की हर रैली में मंच पर मुस्लिम नेताओं को भी तवज्जो दी जा रही है. मेरठ विश्वविद्यालय से रिटायर प्रोफेसर डॉ. आर.पी. सिंह कहते हैं, ''राजनैतिक रूप से जाट मतदाता तभी प्रभावशाली होता है जब यह मुसलमानों के साथ मिलकर वोट करता है. मुजफ्फरनगर दंगे में टूट चुके इस तानेबाने को अजित सिंह जितना जोड़ पाएंगे विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी का उतना ही बेहतर प्रदर्शन होगा." सांप्रदायिक दंगे, खराब कानून व्यवस्था, किसानों को फसल मुआवजा न मिलने जैसे आरोपों पर सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी (सपा) पर आक्रामक रवैया अपनाने वाले अजित सिंह का इसी पार्टी के साथ महागठबंधन की पहल पर जाट समुदाय की प्रतिक्रिया नकारात्मक ही है.

जाट लैंड में जोर आजमाइशनेताओं का अभाव
जाट मतदाताओं के बीच बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) को लेकर किसी प्रकार की नाराजगी भले न हो लेकिन चुनौतियां इसके सामने भी हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीएसपी का मुसलमानों पर ज्यादा फोकस और प्रभावशाली जाट नेता का न होना पार्टी की संभावनाओं को चोट कर रहा है. पिछले विधानसभा चुनाव के बाद बीएसपी में रहे बुलंदशहर के गजेंद्र सिंह, कांधला के बलबीर सिंह मलिक जैसे जाट नेता आरएलडी में शामिल हो चुके हैं. हालांकि बीएसपी कांग्रेस के एक जाट नेता पर डोरे डालकर उसे हाथी पर सवार करने की कोशिश में हैं. जाट नेताओं की कमी झेल रही समाजवादी पार्टी ने बुलंदशहर के अगौता विधानसभा सीट से पांच बार के विधायक किरणपाल सिंह को साइकिल पर सवार कर जाट मतदाताओं को बटोरने की कोशिश की. किरणपाल अजित सिंह के विरोधी खेमे के जाट नेता हैं और महागठबंधन की कोशिशें परवान चढऩे के बाद इनके राजनैतिक भविष्य पर संशय पैदा हो गया है. बहरहाल, जाट लैंड में जिस तरह से सियासी सरगर्मियां बढ़ गई हैं उससे इतना तो जरूर है कि अगले विधानसभा चुनाव में यहां मतदाताओं का रुझान लोकसभा चुनाव की तरह एकतरफा तो नहीं होगा.

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