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रोकना था रेप, पुलिस तो प्रेम ही रोकने लगी

‘बलात्कार’ प्रदेश नाम से बदनाम मध्य प्रदेश में स्त्री सुरक्षा के नाम पर पुलिस ने शहरों के पार्कों-उद्यानों में मिलने वाले युवक-युवतियों की धरपकड़ शुरू की.

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aajtak.in
सरोज कुमार 28 January 2014
रोकना था रेप, पुलिस तो प्रेम ही  रोकने लगी

इटालियन गार्डेन, ग्वालियर का पिछले पखवाड़े का वाकया. दुनिया से बेखबर कुछ युवक-युवतियां साथ बैठ बतिया रहे थे. अचानक एक जिप्सी में वहां पहुंची कुछ महिला पुलिस अफसर और कुछ जवान उन पर जैसे टूट पड़े. अफरातफरी मच गई. कुछ जोड़े तेजी से निकल भागे लेकिन हत्थे चढ़े युगलों पर शुरू किया जाता है पुलिसिया अत्याचार. सार्वजनिक तौर पर उठक-बैठक. थोड़ी-सी आनाकानी की नहीं कि दे थप्पड़.

छह जनवरी को उज्जैन में कलेक्टर कार्यालय के पास विक्रम वाटिका में भी ऐसी ही कार्रवाई हुई तो वहां सैकड़ों तमाशाई जुट गए. दिल्ली में युवती निर्भया के साथ चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार कांड की बरसी के मौके पर मध्य प्रदेश सरकार ने पिछले 16 दिसंबर से भोपाल में जो निर्भया पेट्रोलिंग अभियान शुरू किया है, उसके भी कुछ ऐसे ही नतीजे सामने आ रहे हैं. मकसद था शहर में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों पर रोक लगाना. लेकिन मोटे तौर पर देखने में यह आ रहा है कि पुलिस शहरों में कहीं थोड़ा-सा एकांत तलाशते प्रेमी जोड़ों पर जैसे टूट पड़ी है. बलात्कार और स्त्रियों से जुड़े ऐसे ही गंभीर अपराधों को रोकने की बजाय उसने आसान शिकार दिखते इन बेकसूर जोड़ों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है.

ग्वालिय में युवाओं की सार्वजनित परेड कराती पुलिस
(ग्वालियर में साथ मिले युवक-युवतियों की पुलिस ने सार्वजिनक परेड कराई)

तथ्य यह है कि मध्य प्रदेश एक तरह से बलात्कार का प्रदेश बन गया है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि 2012 में देश भर में बलात्कार की करीब 25,000 घटनाओं में से 3,425 अकेले मध्य प्रदेश में हुईं. बात यहीं नहीं रुकती. महिलाओं का शीलभंग करने के इरादे से होने वाले वाकए भी सबसे ज्यादा इसी प्रदेश में देखे गए हैं. लेकिन पुलिस बलात्कार रोकने की बजाय प्रेम पर ही पहरा लगाती नजर आ रही है.

बलात्कार और स्त्री हिंसा पर लगाम के लिए चलाए गए अभियान ने प्रदेश के प्रेमाकांक्षी युगलों/युवाओं में जैसे भगदड़ ही मचा दी है. वे घबराए हुए हैं और छिपते फिर रहे हैं. ग्वालियर के ऐसे ही एक युवा के शब्दों में, ‘‘पहले शहर का गांधी प्राणी उद्यान युगल जोड़ों का सुरक्षित ठिकाना था. 20 रु. का टिकट लो और किसी भी कोने में बैठ जाओ. लेकिन पुलिस ने यहां पर भी छापा मारना शुरू कर दिया.’’ इसके अलावा कमला राजा गर्ल्स कॉलेज के पास बने नेहरू पार्क, फूलबाग, ऐतिहासिक दुर्ग सब चपेट में आ गए हैं. ग्वालियर के किले पर तो एक युवक को पुलिस ने मुर्गा ही बना दिया. शर्म के मारे अब उसने कॉलेज ही आना बंद कर दिया है.


(भोपाल में एक युवती का आइ-कार्ड देखती निर्भया पुलिस पेट्रोलिंग टीम)

किले पर ही एक दूसरी जगह पर पुलिस ने छापा मारकर वहां कुछ युवतियों को कतार में खड़ा कर दिया. तमाशाइयों की भारी भीड़ वहां जुट गई. ग्वालियर उत्तर भारत में शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है. यहां पड़ोसी राज्यों के अलावा बिहार, झारखंड और उत्तर-पूर्व तक से छात्र पढऩे आ रहे हैं. एक कॉस्मोपॉलिटिन शहर का रूप लेते जा रहे ग्वालियर में यह सब देखना चौंकाने वाला था.

भोपाल के चिनार पार्क में बैठे एक जोड़े के पास जब निर्भया पेट्रोलिंग पहुंची तो उसने युवती से उसके परिजनों से बात कराने का दबाव डाला. युवती के मुताबिक, ‘‘मैं अपने एक मित्र के साथ कुछ समय के लिए आई थी लेकिन निर्भया टीम ने तो ऐसा जताया जैसे हम वहां कोई अपराध कर रहे हों. यह बेहद आपत्तिजनक है.’’

 उज्जैन में तो पुलिस ने कार्रवाई पर अपनी पीठ खुद ही थपथपाते हुए कहा कि ज्यादातर युवक-युवतियां घर से निकले कॉलेज या कोचिंग के नाम पर लेकिन पहुंच गए प्रेमालाप करने. शहर के पुलिस अधीक्षक अनुराग का मानना है कि अभिभावकों को तो अपने बच्चों का ध्यान रखना चाहिए और ऐसी सामाजिक बुराइयों की रोकथाम के पुलिस के प्रयास की सराहना करनी चाहिए, जिसके तहत महिला पीसीआर चलाई गई है.

लेकिन एक पीड़ित छात्रा की व्यथा थी, ‘‘विक्रम वाटिका (कार्रवाई स्थल) के पास ही विक्रम विश्वविद्यालय का प्रशासनिक मुख्यालय है, जहां संभाग के दूरवर्ती जिलों से छात्र-छात्राएं आते हैं और साथ लाया खाना खाने के लिए पार्क वगैरह ढूंढ़ते हैं. पुलिस ने इस बात का भी ध्यान नहीं रखा. अब वे कहां जाएंगे?’’

एक छात्र अजहर शाह के शब्दों में, विक्रम वाटिका के पास ही महिला हॉस्टल है जहां किसी भी पुरुष को प्रवेश की मनाही है, भले वह परिजन ही क्यों न हो. ऐसे में परिजनों से मिलने छात्राएं सामने विक्रम वाटिका को ही चुनती हैं. अब पुलिस की नजर में यह गुनाह है.’’

इस तरह की ‘‘मोरल पुलिसिंग’’ का मामला इंदौर स्थित देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ  मैनेजमेंट स्टडीज में भी सामने आया था जब वहां सत्र की शुरुआत के वक्त छात्राओं को जींस-टीशर्ट और लेगीज जैसे कपड़े न पहनने के निर्देश दिए गए थे. कुछ छात्राओं ने आधुनिक परिधान पहने तो उन्हें भारतीय संस्कृति और मूल्यों पर निबंध लिखने की सजा दी गई.

संस्कृति के कथित पहरुए इस पूरी कार्रवाई से गद्गद हैं. उन्हें इसमें भी कुछ बुरा नजर नहीं आ रहा. अब तक वेलेंटाइन डे और ऐसे ही कई मौकों पर विरोध प्रदर्शन करते आए संस्कृति बचाओ मंच के प्रमुख चंद्रशेखर तिवारी का तर्क सुनिए, ‘‘युवाओं ने भोपाल में सार्वजनिक जगहों पर माहौल खराब कर रखा है. शहर के पार्कों में उनके खुल्लमखुल्ला आलिंगन की वजह से बुजुर्गों का वहां जाना दुश्वार होता जा रहा है. इसलिये निर्भया पेट्रोलिंग बहुत जरूरी है. इससे युवाओं को अच्छी तरह से समझ में आएगा कि अपनी हदों में कैसे रहा जाता है.’’

पिछले ही माह सत्ता में वापसी करने वाली शिवराज सिंह चौहान सरकार का रवैया भी इस संवेदनशील मसले पर ऊहापोह भरा नजर आता है. हाल ही तमिलनाडु की यात्रा पर गए प्रदेश के गृह मंत्री बाबूलाल गौर ने लौटकर बयान दे डाला कि ‘‘तमिलनाडु में महिलाएं पूरे कपड़े पहनती हैं, इसलिए सुरक्षित हैं.’’
भोपाल में रेप के खिलाफ एक प्रदर्शन
(भोपाल में बलात्कार के खिलाफ एक प्रदर्शन-फाइल फोटो)

महिला और बाल विकास मंत्री माया सिंह का बयान बेहद नपा-तुला हैः ‘‘कम उम्र की लड़कियों के साथ बढ़ रहे अपराधों के मद्देनजर पुलिस असामाजिक तत्वों के खिलाफ कोई कदम उठाती है तो वह गलत नहीं पर इस बहाने से युवाओं को प्रताड़ित करना गलत है. शिकायत मिली तो मैं जरूर कदम उठाऊंगी.’’ लेकिन प्रशासन का ही अंग राज्य महिला आयोग इस पुलिसिया कार्रवाई से खुश नहीं है. इसकी अध्यक्ष उपमा राय कहती हैं, ‘‘निर्भया पेट्रोलिंग मोबाइल का यह तो अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाना है, इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. शिकायत मिली तो जरूर कार्रवाई होगी.’’

मध्य प्रदेश में प्रेम पर पहरे की इस पुलिसिया कार्रवाई ने अच्छी-खासी बहस छेड़ दी है. शिक्षा और समाज क्षेत्र की शख्सियतें साफ तौर पर इसकी मुखालफत कर रही हैं. निर्भया कांड के दौरान दिल्ली की सड़कों पर आंदोलन की अगुआ सामाजिक कार्यकर्ता कविता कृष्णन कहती हैं, ‘‘यह शर्मनाक है कि जिस निर्भया की शहादत से स्त्री की आजादी का सवाल मुखर हुआ, उसी के नाम पर यह सब हो रहा है. लड़कियों को पुरुषों के बराबर हक और पूरी आजादी दिए जाने की जरूरत है, न कि आजादी से वंचित करने की.’’ दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में महिलाओं के खिलाफ अपराध विषय पर रिसर्च कर रहे ताराशंकर की राय में ‘‘ऐसा कर के पुरुषों की सोच बदलने की बजाए महिलाओं पर ही बंदिशें लगाकर उनमें  डर बैठाया जा रहा है कि वे कमजोर हैं. यह तो पहले से बने लिंगभेद को बढ़ाना हो गया.’’ विशेषज्ञ भी इसे वही सामंती नजरिया मान रहे हैं, जिसके तहत बलात्कार और स्त्री हिंसा को कम कपड़े पहनने से जोड़ दिया जाता है.


(ग्वालियर में एक युवक की उठक-बैठक कराती एक पुलिस अधिकारी)

हालांकि,अलग-अलग तबकों में भी कार्रवाई के समर्थक भी कम नहीं हैं. देश की पहली महिला आइपीएस किरण बेदी कहती हैं, ‘‘पुलिस का काम सिर्फ अपराध का पता लगाना ही नहीं, उसे रोकना भी होता है. ह्यूमन राइट के साथ-साथ ह्यूमन रेस्पांसिबिलिटी भी होती है उसकी.’’ उज्जैन की एमएड छात्रा अंजना वैष्णव तो युवा वर्ग को जैसे सावधान करती हैं,  ‘‘यह उम्र बहकने की है. इस दौरान प्यार में पडऩे की बजाय पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए.’’ जहां तक कॉलेजों और अभिभावकों की भूमिका का सवाल है, तो वे भी युवाओं के अधिकारों की बजाए अनुशासन के पक्ष में खड़े दिखते हैं. भोपाल के चित्रांश कॉलेज के संस्थापक अश्विनी श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘हमारे कॉलेज के छात्र-छात्रा के इस तरह पकड़े जाने पर अभिभावकों से उन्हें भविष्य के लिए समझाने को कहेंगे. दोबारा पकड़े जाने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी.’’

निर्भया पेट्रोलिंग ने विवादास्पद प्रेम-पहरेदारी के अलावा कुछ अच्छे काम भी किए हैं. भोपाल के बीचोंबीच स्थित न्यू मार्केट पर एक रेस्तरां के पास कुछ लड़के पिछले पखवाड़े एक लड़की को छेड़ रहे थे. खबर मिलते ही निर्भया पेट्रोलिंग टीम ने मौके पर पहुंचकर सहमी लड़की को सुरक्षित घर पहुंचाया और छेडख़ानी करने वालों को चले जाने देने के लिए वहां मौजूद दुकान वालों को निर्भया की प्रभारी नमिता साहू ने तगड़ी डांट लगाई.

लेकिन एक छात्रा नाम न छापने की शर्त पर कहती हैं, ‘‘नैतिकता के कथित पहरुए फिर से सक्रिय होने वाले हैं. अमीर घरों के युगल महंगे होटलों में बैठकर अश्लील हरकतें करें तो भी कुछ नहीं और हमारा किसी पार्क में बैठकर शालीनता से भी प्यार का इजहार करना गुनाह है? ’’
 (-साथ में शुरैह नियाज़ी, महेश शर्मा और समीर गर्ग)

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