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राजस्व जुटाने की रस्साकशी

कोविड और लॉकडाउन के कारण राज्यों को संसाधनों का भीषण अभाव दिख रहा है इसलिए केंद्र से ज्यादा रकम लेने के लिए खींचतान हो रही है

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aajtak.in
कौशिक डेकानई दिल्ली, 23 June 2020
राजस्व जुटाने की रस्साकशी फोटोः इंडिया टुडे

महामारी के मध्य जून तक के आंकड़ों से पता चला कि महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली, गुजरात और उत्तर प्रदेश भारत में कोविड-19 के सबसे ज्यादा मरीजों वाले पांच राज्य थे. यही पांच राज्य मिलकर देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 42 फीसद योगदान देते हैं. अब जब कोरोना वायरस से लगभग सभी आर्थिक गतिविधियां चौपट हो गई हैं, भारतीय स्टेट बैंक की रिसर्च टीम की एक रिपोर्ट का कहना है कि इन पांचों राज्यों को 14.4 लाख करोड़ रुपए का जबरदस्त घाटा होने जा रहा है, जो 2020-21 में राज्यों को होने वाले कुल घाटे का 48 फीसद है.

बाकी देश की हालत भी कोई बेहतर नहीं है. रिपोर्ट राज्यों को 30.3 लाख करोड़ रुपए के कुल घाटे का अंदाजा लगाती है, जो उनके कुल जीएसडीपी का 13.5 फीसद है. ज्यादातर भारतीय राज्यों को कोविड महामारी से जूझते हुए जबरदस्त राजकोषीय परेशानियों से दोचार होना पड़ रहा है. रोजी-रोटी का सवाल ज्यादा तीखा होने के साथ ही राज्यों को नकद सहायता और मुफ्त/सस्ता अनाज देने की खातिर मानवीय खर्च बढ़ाने पड़े. प्रवासी मजदूरों की वापसी से मसला और पेचीदा हो गया, जब परिवहन, क्वारंटीन और पुनर्वास के खर्च अलग से बढ़ गए. अब उन्हें अर्थव्यवस्था के पहियों को फिर से घुमाना है और इसका मतलब है और ज्यादा खर्च करना.

तमाम राज्यों का कुल राजकोषीय घाटा 2021 के वित्तीय साल में जीएसडीपी का 2.6 फीसद रहने का बजट अनुमान लगाया गया था. एसबीआइ रिसर्च का 19 राज्यों पर किया गया एक और अध्ययन कहता है कि अगर पूंजीगत खर्चों में कटौती नहीं की जाती है तो अब इसका बढ़कर जीएसडीपी का 4.5 फीसद होना तय है. 14वें वित्त आयोग के सदस्य और एनआइपीएफपी (राष्ट्रीय लोक वित्त और नीति संस्थान) के पूर्व डायरेक्टर एम. गोविंद राव कहते हैं, ''अगर उपाय नहीं किए जाते हैं तो राजकोषीय घाटा इस आंकड़े तक बढ़ जाएगा.'' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20.9 लाख करोड़ रुपए (जीडीपी के 10 फीसद) के आर्थिक बहाली पैकेज का ऐलान किया है, लेकिन डीबीएस बैंक की एक रिपोर्ट कहती है कि इसके तहत सरकार को असल में जीडीपी की महज 0.8 फीसद रकम ही खर्च करनी पड़ेगी.

यही वजह है कि मुख्यमंत्री केंद्र से और ज्यादा संसाधनों की मांग कर रहे हैं. पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने राजस्व की मुश्किलों से उबरने के लिए अंतरिम राहत के तौर पर केंद्र से 3,000 करोड़ रुपए की मांग की है. उत्तर प्रदेश सरकार ने भी राजस्व में 70 फीसद की गिरावट का दावा किया है. बिहार के उप-मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री सुशील कुमार मोदी ने अप्रैल में राज्य के राजस्व में 84 फीसद की कमी की बात कही है. कर वसूली में 85 फीसद की गिरावट का दावा करते हुए दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को लिखा और दिल्ली के लिए 5,000 करोड़ रुपए के पैकेज की मांग की, ताकि सरकारी कर्मचारियों को तनख्वाह दी जा सके.

पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्रा ने कर्ज अदायगी के लिए तत्काल केंद्र के दखल की मांग की है, क्योंकि लॉकडाउन के दौरान राज्य को राजस्व में 15,000 करोड़ रुपए की कमी होने के आसार हैं. राजस्थान मार्च-अप्रैल में 17,000 करोड़ रुपए के राजस्व की उम्मीद कर रहा था, लेकिन उसे महज 4,000 करोड़ रुपए मिले. राज्य कोरोना संकट पर अब तक 2,000 करोड़ रुपए खर्च कर चुका है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं, ''स्पष्ट है कि राज्यों को खुद अपना क्चयाल रखना होगा. मैंने पहले भी राजस्व बढ़ाने के तरीके खोजे हैं और अभी भी वही करेंगे. यह चुनौती भरा काम है पर केंद्र बेरुखी बरतता है तो करना ही होगा.''

राज्यों को धन मिलता कहां से है?

राज्यों के पास राजस्व के सात मुख्य स्रोत हैं—माल और सेवा कर (जीएसटी), वैट (पेट्रोलियम उत्पादों पर), आबकारी (मुख्यत: शराब पर), स्टांप शुल्क और पंजीयन शुल्क, वाहनों पर कर, बिजली पर कर व शुल्क और गैर-कर राजस्व. राज्यों के राजस्व में जीएसटी का हिस्सा 44 फीसद है और यह केंद्र वसूल कर राज्यों को देता है. पेट्रोलियम पर वैट (23 फीसद) और शराब पर आबकारी शुल्क (13 फीसद) राज्यों के प्रत्यक्ष राजस्व के दो सबसे बड़े स्रोत हैं. पेट्रोलियम उत्पादों पर वैट ने 2018-19 में राज्यों को 2.3 लाख करोड़ रुपए का योगदान दिया था. 2019-20 में राज्यों ने शराब पर आबकारी शुल्क से हर माह औसतन 15,000 करोड़ रुपए कमाए.

पेट्रोलियम और एल्कोहल उत्पादों की खपत पर लॉकडाउन का जबरदस्त असर पड़ा है. लिहाजा इन उत्पादों से मिलने वाले राजस्व में भी भारी गिरावट आई है. इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च का अनुमान है कि जिन राज्यों के राजस्व में उनकी अपनी उगाही रकम की हिस्सेदारी ज्यादा है, मसलन तेलंगाना और महाराष्ट्र, उन पर लॉकडाउन का ज्यादा तीखा असर पडऩे का अंदेशा है. तेलंगाना के वित्त मंत्री टी. हरीश राव कहते हैं, ''हमारे राज्य को जीएसटी, आबकारी, स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन व खनन से महीने में औसतन 10,800 करोड़ रुपए मिलते हैं. अप्रैल में यह आंकड़ा 1,700 करोड़ रुपए था.'' महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री लॉकडाउन से राज्य को 35,000 रुपए का नुक्सान होने की बात कहते हैं.

मई में लॉकडाउन में थोड़ी-बहुत छूट के नतीजतन पेट्रोलियम उत्पादों और शराब से मिलने वाले राजस्व में धीरे-धीरे सुधार होने लगा है. कई राज्यों ने शराब पर आबकारी शुल्क और पेट्रोल-डीजल पर वैट बढ़ा दिया है. फिर भी लोक वित्त विशेषज्ञों को इन उपायों से राज्य की माली हालत में नाटकीय बदलाव आने के आसार नहीं दिखते. गुजरात और बिहार सरीखे राज्यों में शराबबंदी है, लिहाजा उन्हें शराब पर आबकारी शुल्क से वैसे भी कोई राजस्व नहीं मिलता. दूसरे राज्यों के हाथ भी शायद ज्यादा कुछ न लगे; बार और शराब दुकानों के मालिकों का कहना है कि उन्हें इस साल बिक्री में 25 फीसद गिरावट का अंदेशा है. जहां तक ईंधन पर वैट की बात है, गोविंद राव को लगता है कि इसे ही बढ़ाया जा सकता है. वे कहते हैं, ''हालांकि कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें गिरी हैं, तो भी केंद्र ने राजस्व उगाहने के लिए उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया, पेट्रोल तथा डीजल के दाम ऊंचे बनाए रखे. ऐसे में राज्यों के पास और ज्यादा कर लगाने की गुंजाइश ही नहीं है.''

जब राजस्व पर कोविड-19 की मार नहीं पड़ी थी यानी पिछले वित्तीय साल की आखिरी दो तिमाहियों से ही राज्य सरकारें राजस्व में परेशानियों का सामना कर रही थीं. करीब दर्जन भर राज्यों का कर राजस्व पिछले साल के 15 फीसद के मुकाबले फरवरी तक 2 फीसदी से भी कम बढ़ा था. फरवरी में—यानी लॉकडाउन के महीने भर पहले—जीएसटी संग्रह पांच माह में सबसे कम था. यही नहीं, केंद्र से जीएसटी भरपाई की रकम मिलने में देरी की वजह से राज्यों के लिए राजकोषीय प्रबंधन और भी मुश्किल हो गया है.

जुलाई 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों ने राजस्व में गिरावट की शिकायतें की थीं. जीएसटी (राज्यों को क्षतिपूर्ति) अधिनियम 2017 पहले पांच वर्षों (2022) तक राज्यों को राजस्व में कमी की भरपाई और राज्यों के जीएसटी राजस्व में सालाना 14 फीसद बढ़ोतरी का आश्वासन देता है. इस 14 फीसद बढ़ोतरी का पूर्वानुमान अब केंद्र को परेशान करेगा, क्योंकि 2020-21 में इसके मुकाबले राज्य जीएसटी वृद्धि दर कम रहने के आसार हैं.

राज्यों को मुआवजा जीएसटी क्षतिपूर्ति कोष से दिया जाता है और यह कोष केंद्र ने कोयला, तंबाकू, पान मसाला, ऑटोमोबाइल और कोल्ड ड्रिंक पर सेस या उपकर में वसूली रकम से बनाया है. इनमें से कई चीजों की बिक्री में पिछले दो-एक वर्षों से गिरावट आई है, जिसके चलते उपकर का संग्रह भी कम हुआ है. वित्त वर्ष 2020 में केंद्र का उपकर संग्रह 55,945 करोड़ रुपए कम रहा लेकिन उसने 47,271 करोड़ रुपए उपकर सरप्लस (2017-18 से 2018-19 तक) का इस्तेमाल राज्यों को 1,51,496 करोड़ रुपए अप्रैल 2019 से फरवरी 2020 तक के बीच जीएसटी क्षतिपूर्ति अदा करने में किया.

2020-21 में जीएसटी का क्षतिपूर्ति अनुदान राज्यों के राजस्व का औसतन 4.4 फीसद रहा है (लेकिन गुजरात, पंजाब और दिल्ली सरीखे कुछ राज्यों को अपने राजस्व की करीब 14-15 फीसद रकम जीएसटी क्षतिपूर्ति अनुदान की शक्ल में मिलने की उम्मीद है). क्षतिपूर्ति कोष में रकम जुटाने के लिए जीएसटी परिषद किन्हीं और व्यवस्थाओं की सिफारिश कर सकती है पर अभी तक ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है. जुलाई मे प्रस्तावित एक बैठक मंल परिषद राज्यों की क्षतिपूर्ति के लिए बाजार से पैसा उधार लेने पर विचार करेगी. अर्थशास्त्रियों को लगता है कि केंद्र के विकल्प सीमित हैं, क्योंकि उसके राजस्व स्रोतों पर भी महामारी की चोट पड़ी है. ईवाइ इंडिया के चीफ पॉलिसी एडवाइजर डी.के. श्रीवास्तव कहते हैं, ''केंद्र के कर संसाधन सूख गए हैं. 2019 और 2020 के दो वित्तीय वर्षों में कर राजस्व घटे हैं. इसका मतलब है राज्यों को करों का कम हस्तांतरण.''

केंद्र का कहना है कि खुद अपने कर राजस्वों में जबरदस्त कमी के बावजूद वह केंद्रीय करों और शुल्कों में राज्यों का हिस्सा उन्हें बराबर देता रहा है. 2020-21 के लिए राज्यों को 7.84 लाख करोड़ रुपए के कर आवंटन में से केंद्र सरकार ने अप्रैल और मई में 92,076 करोड़ रुपए की दो बराबर किस्तें जारी कर दीं. केंद्रीय व्यय सचिव टी.वी. सोमनाथन कहते हैं, ''अप्रैल में राज्यों को हस्तांतरित रकम केंद्र के उस महीने के शुद्ध राजस्व की 110 फीसद थी.''

पंद्रहवें वित्त आयोग ने केंद्रीय करों का 41 फीसद हिस्सा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को और 1 फीसद हिस्सा दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख को देना तय किया था. वित्त आयोग की सिफारिश के मुताबिक, ये कर हस्तांतरणों की पहली दो किस्तें थीं.

अलबत्ता राज्य 2021 के वित्तीय साल के लिए राजस्व घाटा अनुदान के तहत केंद्र के आवंटन को लेकर नाराज हैं. इन अनुदानों में वह राजस्व घाटा भी शामिल है, जो केंद्र सरकार के हाथों इकट्ठा करों में अपने हिस्से के हस्तांतरण के बाद भी कुछ राज्यों को उठाना पड़ सकता है. 15वें वित्त आयोग का अनुमान था कि 2020-21 में 14 राज्यों को 74,340 करोड़ रुपए के बराबर राजस्व घाटा अनुदान की जरूरत होगी. मगर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के 2020-21 के बजट में इसकी केवल 40 फीसद रकम रखी गई. केंद्र सरकार ने अप्रैल और मई में 6,195 करोड़ रुपए की दो किस्तें जारी कर दीं.

राज्य क्या कर सकते हैं?

अर्थव्यवस्था को चलाए रखने के लिए राज्यों के सामने ऊपरी तौर पर दो विकल्प हैं—बजटीय खर्चों में कटौती और कर्ज में बढ़ोतरी. मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में मानद प्रोफेसर उलगानाथन शंकर कहते हैं, ''राज्य दान और चंदे, सरकारी सेवकों के वेतन और गैर-अनिवार्य सरकारी खर्चों में कटौती और पीपीपी मोड में निजी क्षेत्र की भागीदारी से रकम जुटा सकते हैं.''

चूंकि ब्याज, वेतन और पेंशन भुगतान सरीखे प्रतिबद्ध खर्चों में कमी की गुंजाइश नहीं है, लिहाजा कई राज्यों में पूंजीगत खर्चों में जबरदस्त कमी करनी पड़ सकती है. पिछले कुछ वर्षों में मजबूत निजी सहारे मौजूद नहीं होने के चलते सार्वजनिक पूंजीगत खर्च आर्थिक वृद्धि का मजबूत स्तंभ रहे हैं. कोविड के बाद के दौर में जब निजी खपत और निवेश और भी घटने का अंदेशा है, सरकारी खर्च में कमी जीएसडीपी को और भी गिरावट की तरफ ले जा सकती है.

करीब दर्जन भर राज्यों ने फरवरी तक अपने पूंजीगत खर्चों के लक्ष्य का करीब 40 फीसद भी खर्च नहीं किया था. ये क्रम जारी रह सकता है. मसलन, महाराष्ट्र ने 4 मई को तमाम महकमों को एक संकल्प जारी करके विकास के खर्चों में 67 फीसदी की कटौती करने का निर्देश दिया. मध्य प्रदेश के वित्त महकमे के सूत्रों ने इंडिया टुडे से कहा कि लॉकडाउन से जन योजनाओं और विकास के कामों में करीब 25,000 करोड़ रुपए की कटौती करनी पड़ेगी. बिहार में भी ऐसा ही कुछ होना तय है. कुछ राज्यों ने प्रतिबद्ध खर्चों से भी छेड़छाड़ करने की कोशिश की है. उत्तर प्रदेश सरकार ने कर्मचारियों के महंगाई भत्ते का भुगतान जून के आखिर तक टाल दिया है और मंत्रियों के वेतन और भत्तों में 30 फीसद कटौती का फरमान दिया है, जिससे उसे 13,550 करोड़ रुपए की बचत होगी. तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने राज्यों की तरफ से देय कर्ज की किस्तों को टालने का सुझाव दिया है.

हालांकि लोक वित्त विशेषज्ञ ऐसे उपायों के खिलाफ आगाह करते हैं क्योंकि अर्थव्यवस्था में जान फूंकने पर इनका प्रतिकूल असर पड़ सकता है. एनआइपीएफपी में प्रोफेसर लेखा चक्रबर्ती कहती हैं, ''अगर राजकोषीय मजबूती का रास्ता करों में उछाल की बजाए सार्वजनिक खर्चों में कटौती से होकर जाता है तो आर्थिक वृद्धि पर इसका और भी नकारात्मक असर पड़ेगा. वेतन कटौती और छंटनी सरीखे राजकोषीय मितव्ययता के उपाय आर्थिक बहाली के लिए नुक्सानदेह होंगे.''

राज्यों के सामने दूसरा विकल्प अपनी बाजार उधारियां बढ़ाना है. मार्च 2020 में राज्यों ने मिलकर राज्य विकास ऋण नीलामियों के जरिए 1.16 लाख करोड़ रुपए उधार लिए थे जबकि मार्च 2019 में उनकी उधारियां कुल 62,297 करोड़ रुपए थीं. कुछ राज्यों ने तो ऊंची ब्याज दर की अनदेखी करते हुए पहली तिमाही में उधारी की 90 फीसद से ज्यादा गुंजाइश का इस्तेमाल कर लिया था. कई राज्यों ने ऊंची ब्याज दरों पर राज्य सरकार के अतिरिक्त बॉन्ड जारी किए. श्रीवास्तव कहते हैं, ''ब्याज दरें मार्च अंत और अप्रैल अंत के बीच 100 आधार अंक ऊपर चली गईं. जारी रकम तक पूरी तरह सबस्क्राइब नहीं हुई. राज्यों को भारतीय रिजर्व बैंक के साथ बैठकर आपसी सहमति से बॉन्ड जारी करने का समयबद्ध कार्यक्रम बनाना चाहिए. उन्हें उधारी की सीमा को पूरे साल में बांट लेना चाहिए और साल के दूसरे उत्तरार्ध में उधार लेने की कोशिश करनी चाहिए.''

उधार बढऩे का मतलब है राजकोषीय घाटे की खाई का और चौड़ा होना. राजकोषीय जिम्मेदारी और बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) कानून के तहत राज्य सरकारों को अपना राजकोषीय घाटा जीएसडीपी के तीन फीसद तक सीमित रखना होता है. उधार लेने की अपनी क्षमता में इजाफे की गरज से राज्यों ने राजकोषीय घाटे की अपनी एफआरबीएम सीमा 4-5 फीसद तक बढ़ाने की मांग की थी. वित्त मंत्री सीतारमण ने 17 मई को यह सीमा 5 फीसद तक बढ़ा दी—इसकी बदौलत राज्य 6.41 लाख करोड़ रुपए की मौजूदा ऊपरी सीमा के अलावा 4.28 लाख करोड़ रुपए के और कर्ज ले सकेंगे. मगर वित्त मंत्री ने 3.5 फीसद की सीमा से ऊपर उधार लेने के लिए राज्यों पर चार शर्तें भी आयद की हैं—उन्हें राशन कार्ड सार्वभौम बनाने होंगे, कारोबारी सहूलत बढ़ानी होगी, राज्य के स्वामित्व वाली बिजली वितरण कंपनियों को ज्यादा मुनाफेदार बनाने के लिए सुधार लाने होंगे और शहरी स्थानीय निकायों के राजस्व में बढ़ाने होंगे.

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