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सवाल लोकतंत्र का है कि इसे कौन बचाएगा?

आज देशभर की विभिन्न अदालतों में सैकड़ों प्रतिभाशाली युवा वकील प्रैक्टिस कर रहे हैं, लेकिन उनके पास ज्यादा काम है नहीं जबकि जजों की जान-पहचान वाले वकीलों के पास काम का अंबार लगा है.

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मंजीत ठाकुर/ मंजीत ठाकुर/ संध्या द्विवेदी नई दिल्ली, 24 January 2018
सवाल लोकतंत्र का है कि इसे कौन बचाएगा? दुष्यंत दवे

मैं सुप्रीम कोर्ट के उन चार प्रतिष्ठित और सम्मानित न्यायाधीशों के साहसिक कदम पर सवाल खड़े करने वाले शंकालुओं, सेवानिवृत्ति न्यायाधीशों और वरिष्ठ वकीलों से पूछता हूं कि आपनी संस्था के लिए क्या किया है? क्या आप कभी खड़े हुए थे और न्यायपालिका में फैले भ्रष्टाचार तथा भाई-भतीजावाद के खिलाफ कोई आवाज उठाई थी?

 सरकार सबसे बड़ी याचिकाकर्ता है और यह नियमित रूप से विभिन्न पैनलों पर न्यायाधीशों के रिश्तेदारों को ही नियुक्त करती है.

यहां तक कि वरिष्ठ कानून अधिकारियों की बहाली भी पूरी तरह से राजनीतिक आधार पर होती है. हाल ही में यह बात सामने आई कि सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने अपने पैतृक राज्य में कानून अधिकारी के पद पर भाई की नियुक्ति कराने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया.

यह तब हुआ जब उसी जज की बेंच के सामने उस राज्य से जुड़ा एक संवेदनशील मामला सुनवाई के लिए लंबित था. इससे अधीनस्थ अदालतों में एक खराब संकेत जाता है.

वर्तमान प्रधान न्यायाधीश की बनाई 'आधार बेंच' दोषपूर्ण है, क्योंकि इसमें जस्टिस चेलमेश्वर और जस्टिस बॉबडे को शामिल नहीं किया गया, जो 2013 से इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं और कुछ अन्य न्यायाधीश भी नहीं हैं जो नौ न्यायाधीशों की प्राइवेसी बेंच (गोपनीयता पीठ) के सदस्य रहे हैं.

कोई भी न्यायाधीश, योग्यता में किसी दूसरे न्यायाधीश से कम नहीं है. सभी न्यायाधीश बराबर हैं और सबका सम्मान होना ही चाहिए, पर साथ ही साथ, न्याय होता हुआ भी दिखना चाहिए.  

मैंने बिड़ला-सहारा मामले के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी जिसमें तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश जस्टिस खेहर ने जस्टिस अरुण मिश्र और जस्टिस रॉय की एक पीठ का गठन किया था, बावजूद इसके कि खुद उन्होंने जस्टिस मिश्र के आवास पर आयोजित उनके भतीजे की रिसेप्शन पार्टी में नेताओं का एक बड़ा जमघट देखा था, जिसमें भाजपा के बड़े नेता भी शामिल थे.

उन्होंने इस तरह से बेंच का गठन क्यों किया? कलिखो पुल के सुसाइड नोट की जांच की मांग वाली रिट याचिका को जस्टिस गोयल और जस्टिस ललित के पास भेजकर जांच बंद कराने की जस्टिस खेहर की कोशिश भी अनुचित थी.

प्रधान न्यायाधीशगण मनमाने तरीके से बेंच क्यों बनाते हैं? बिड़ला-सहारा मामले में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम गलत तरीके से उपकृत किए जाने को लेकर आया था और जैसा कि अखबारों में छपा था, शिवराज भी जस्टिस मिश्र के भतीजे की रिसेप्शन पार्टी में शरीक हुए थे. सवाल लोकतंत्र का है कि इसे कौन बचाएगा? साफ है कोर्ट और जज इसलिए हैं कि संविधान की अंतिम व्याख्या इन्हीं के हाथ में है.

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