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भूमि अधिग्रहण विधेयक: अब टेढ़ी उंगली से चलेगा काम

मोदी सरकार राज्यों के लिए अपना कानून बनाने का दरवाजा खोलकर राज्यसभा में भूमि अधिग्रहण बिल की मुसीबत से बचना चाहती है.

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aajtak.in
कौशिक डेका 27 July 2015
भूमि अधिग्रहण विधेयक: अब टेढ़ी उंगली से चलेगा काम संसद के मानसून सत्र की पूर्व संध्या पर सभी पार्टियों के साथ बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

जब आगे बढऩा मुश्किल हुआ तो केंद्र ने राज्यों का रुख कर लिया. नरेंद्र मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण बिल पर टकराव के हल के लिए बांटो और कानून बनाओ चाल अपनाई हैः राज्यों को जमीन के मामले में अपना कानून बनाने का विकल्प देकर राज्यसभा में विपक्ष के अडिय़लपन को भोथरा कर दो.
संसद के मानसून सत्र में राज्यसभा में यह बिल पास नहीं हुआ तो बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार चौथी बार भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा एवं पारदर्शिता, पुनर्वास (दूसरा संशोधन) अध्यादेश&जो 2013 के कानून में संशोधन की मांग करता है&ला सकती है. इससे भी ज्यादा अहम तथ्य यह है कि वह राज्यों की ओर रुख करने की कोशिश कर रही है. प्रधानमंत्री मोदी इसे संसद में पारित कराने में इसलिए नहीं हिचक रहे हैं कि वे राज्यसभा में जरूरी संख्या नहीं जुटा पाएंगे, बल्कि इसकी वजह यह है कि उन्हें लग रहा है कि सरकार विपक्ष के साथ धारणा की लड़ाई में मात खा रही है. बिहार के चुनाव में सिर्फ तीन महीने बाकी रह गए हैं और असम, केरल और पश्चिम बंगाल में एक साल के भीतर चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में बीजेपी बिल्कुल नहीं चाहती है कि वह किसी भी तरीके से किसान विरोधी नजर आए. 20 जुलाई को एनडीए की बैठक में मोदी ने इस बात को स्वीकार किया. उन्होंने कहा कि यूपीए-2 के 2013 के कानून में किए गए संशोधनों को लोगों ने पसंद नहीं किया है और अब उस धारणा को सुधारने का समय आ गया है.
प्रधानमंत्री का यह बदला हुआ रुख बीजेपी के उन नेताओं को निराश कर सकता है जो परदे के पीछे से भूमि अधिग्रहण बिल को पास कराने के लिए जी-जान से जुटे थे. 235 सदस्यों के सदन में बीजेपी के 46 सदस्यों के मुकाबले 68 सदस्यों वाली कांग्रेस ने राज्यसभा में दूसरी विपक्षी पार्टियों के समर्थन से बजट सत्र में इस बिल को रास्ता दिया था. इस बिल को एक संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया था, जो अगस्त के पहले हफ्ते में अपनी रिपोर्ट सौंपेगी.
कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां चाहती हैं कि यह बिल राज्यसभा में लंबित रहे क्योंकि अगर इसे वोटिंग के लिए पेश किया गया और विधेयक गिर गया तो सरकार को संसद का संयुक्त सत्र बुलाने का मौका मिल जाएगा, जिसमें सरकार को जीत हासिल करने की पूरी उम्मीद है, क्योंकि लोकसभा में उसके पास अच्छा बहुमत है. सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी आधिकारिक रूप से कह चुके हैं कि उनकी पार्टी का पहला लक्ष्य यही होगा कि सरकार को संयुक्त सत्र न बुलाना पड़े.
संसद के बजट और मानसून सत्र के बीच की अवधि में बीजेपी कांग्रेस को छोड़कर बाकी सभी विपक्षी पार्टियों से संपर्क कर चुकी थी और उनके साथ एक सौदा कर लिया था, जिसे दोनों पक्षों की जीत माना जा रहा था. इसमें ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी (सपा), मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी), नवीन पटनायक की बीजू जनता दल (बीजेडी) और जे. जयललिता की एआइएडीएमके जैसी विपक्षी पार्टियों के लिए सुनिश्चित कर दिया गया था कि वे राज्यसभा में भूमि अधिग्रहण बिल का विरोध करने के अपने रुख पर कायम रहें, जिससे सदन में बिल गिर जाए. राज्यसभा में कांग्रेस के एक सदस्य सावधान करते हुए कहते हैं, “मुलायम, मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता और नवीन पटनायक बिल के खिलाफ वोटिंग करके परोक्ष रूप से मोदी की मदद ही करेंगे.”
यह रणनीति कागज पर तो कामयाब दिखती है&दोनों सदनों की कुल सदस्य संक्चया 788 है, जिसमें एनडीए के पास 395 सदस्य हैं. इनमें बीजेपी के पास अपने ही 327 सांसद हैं. लेकिन बीजेपी की सहयोगी पार्टियों ने इस प्रक्रिया में अड़ंगा डाल दिया है. शिरोमणि अकाली दल और शिवसेना खुलेआम इस बिल का विरोध कर रही हैं. बीजेडी और एआइएडीएमके लोकसभा में इसके पक्ष में वोट देने के बाद जिस तरह से इस बिल पर फिर से विचार कर रही हैं, उससे बीजेपी को उस समय मुंह की खानी पड़ सकती है, जब अकाली दल और शिवसेना भी संयुक्त सत्र के दौरान विरोध का रास्ता अख्तियार कर लें. बीजेपी के पास बहुमत के लिए 68 सदस्य कम पड़ रहे हैं. यही वजह है कि प्रधानमंत्री अब अपना लक्ष्य संसद के जरिए नहीं, बल्कि विधानसभाओं के जरिए हासिल करना चाहते हैं.
संसद का रास्ता छोडऩे का विचार सबसे पहले दिल्ली में 15 जुलाई को आयोजित नीति आयोग की दूसरी गवर्निंग काउंसिल में बनाया गया था. हालांकि कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने इस बैठक का बहिष्कार किया था, लेकिन 16 में से 10 मुख्यमंत्रियों ने, जिनमें बीजेपी के 8 मुख्यमंत्री शामिल थे, प्रधानमंत्री को बताया कि केंद्रीय कानून में देरी होने से विकास के काम में रुकावट आ रही है. 21 जुलाई को मानसून सत्र के पहले दिन हुई कैबिनेट की बैठक में मोदी ने संकेत दिया कि सरकार अब ऐसा प्रावधान ला सकती है जो राज्यों को अपना अलग कानून बनाने का विकल्प दे सकता है.
इस प्रकार जहां भूमि अधिग्रहण बिल संसद में अब भी फंसा हुआ है, वहीं कई राज्य, जिनमें बीजेपी शासित आठ राज्य भी शामिल हैं, जल्दी ही अपना भूमि अधिग्रहण कानून बना सकते हैं. गैर-कांग्रेस शासित अन्य राज्य जैसे उत्तर प्रदेश&जिसने आगरा और लखनऊ के बीच 302 किमी के एक्सप्रेस वे के लिए खरीदारों और विक्रेताओं के बीच सीधी बातचीत की छूट दे रखी है&और आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना&दोनों ही तेजी से विकास के लिए भूमि बैंक बनाना चाहते हैं&भी इस तरह के प्रावधान के प्रति दिलचस्पी जाहिर कर सकते हैं. संविधान के अनुच्छेद 254 (2) के तहत राज्यों को केंद्र एवं राष्ट्रपति की सहमति से कई मामलों में अलग कानून बनाने का अधिकार हासिल है. इस प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए आठ राज्यों&पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, गुजरात, केरल, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के पास 2013 का कानून पारित होने से पहले अपने कानून थे.
21 जुलाई को मोदी की ओर से राज्यों को हरी झंडी दिया जाना इस बात का भी संकेत है कि वे चाहें तो अपने कानून में जमीन के मालिक की सहमति और सोशल इंपैक्ट असेसमेंट (एसआइए) वाली विवादास्पद शर्त बनाए रख सकते हैं. केंद्र सरकार लंबे समय से दावा करती रही है कि इन्हीं दो प्रावधानों&जिन्हें यूपीए-2 सरकार ने “सुरक्षा” के तौर पर शामिल किया था&के कारण कई मुख्य प्रोजेक्ट्स में देरी हो रही थी. 2013 के कानून में निजी प्रोजेक्ट्स के मामले में भूमि के अधिग्रहण के लिए 80 फीसदी और निजी-सरकारी प्रोजेक्ट्स (पीपीपी) के मामले में 70 फीसदी जमीन मालिकों की सहमति लेना जरूरी था. लोकसभा में पारित हो चुके एनडीए के संशोधित बिल में इस प्रावधान से पांच वर्गों को अलग रखा गया है. ये पांच वर्ग हैं&सुरक्षा, ग्रामीण बुनियादी ढांचा, सस्ता आवास, औद्योगिक गलियारा और पीपीपी समेत ढांचागत प्रोजेक्ट. 2013 के कानून में भूमि अधिग्रहण के कारण प्रभावित होने वाले परिवारों के लिए एसआइए का प्रावधान रखा गया था, लेकिन संशोधित बिल में उसे हटा दिया गया है.
लेकिन सरकारी आंकड़े नरेंद्र मोदी सरकार के इस दावे की तस्दीक नहीं करते हैं कि यूपीए के बनाए कानून की वजह से प्रोजेक्ट्स के काम में बाधा आ रही है. एक आरटीआइ के जवाब में वित्त मंत्रालय ने बताया है कि फरवरी, 2015 तक 804 परियोजनाएं रुकी हुई थीं लेकिन सिर्फ 66 प्रोजेक्ट्स&यानी महज 8 फीसदी&का काम ही भूमि अधिग्रहण की समस्याओं के कारण बाधित हो रहा था.
बहरहाल, देश के अन्नदाता किसानों और जमीन के मालिकों का दिल जीतने की लड़ाई में इस तरह के तथ्य ज्यादा महत्व नहीं रखते. संसद में विपक्ष के हंगामे की वजह से सरकार अब संघीय ढांचे के नाम पर राज्य विधानसभाओं का सहारा लेने की फिराक में है. क्या सरकार की यह चाल कामयाब हो पाएगी?ठ्ठ

1 भूमि अधिग्रहण क्या है?
भूमि अधिग्रहण निजी मिल्कियत वाली जमीन को समाज के व्यापक हित में सरकार या निजी कंपनियों का जबरन अपने नियंत्रण में लेना है. यह जमीन खरीदने की तरह का मामला नहीं है, जिसमें जमीन मालिक के सामने अपनी जमीन को बेचने की कोई अनिवार्यता या बाध्यता नहीं होती.

2 इतनाशोरशराबा क्यों है?
2013 तक भूमि अधिग्रहण के मामलों में भूमि अधिग्रहण कानून 1894 लागू होता था. यूपीए ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्श्थापन और पुनर्वास में उचित मुआवजे तथा पारदर्शिता का अधिकार कानून पारित किया, जिसने नया ढांचा और नियम बनाए. एनडीए ने यूपीए के भूमि कानून में कुछ अहम बदलाव किए और मार्च में लोकसभा में संशोधन पारित करवाए. विरोधी दलों ने आरोप लगाया कि ये बदलाव कॉर्पोरेट समूहों को फायदा पहुंचाने के लिए किए गए हैं.

3 इन संशोधनों की जरूरत क्यों थी?
नए विधेयक के हिमायतियों के मुताबिक इन संशोधनों की जरूरत इसलिए थी क्योंकि यूपीए के कानून के कुछ निश्चित प्रावधानों&मसलन, 80 फीसदी जमीन मालिकों की मंजूरी&की वजह से निजी कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण तकरीबन नामुमकिन हो गया. नतीजतन निवेश और विकास के काम ठप हो गए.

4 अधिग्रहण के मसलों की वजह से कितनी परियोजनाएं ठप हैं?
वित्त मंत्रालय ने एक आरटीआइ के जवाब में बताया था कि फरवरी, 2015 तक 804 परियोजनाएं ठप पड़ी थीं. हालांकि इन 804 में से सिर्फ 66 या 8 फीसदी परियोजनाएं भूमि अधिग्रहण से जुड़ी दिक्कतों की वजह से ठप हैं.

5 अब क्या
स्थिति है?
बीजेपी सरकार भूमि अधिग्रहण, पुनर्स्थापन और पुनर्वास में उचित मुआवजे और पारदर्शिता का अधिकार (दूसरा संशोधन) विधेयक 2015 को कानून में नहीं बदल पा रही है. वह इस विधेयक को तीन बार अध्यादेश के जरिए लागू कर चुकी है. विधेयक मार्च में लोकसभा में पारित हो गया था, लेकिन राज्यसभा ने इसे संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया, जो अपनी रिपोर्ट अगस्त के पहले हफ्ते में देगी.

यूपीए बनाम एनडीए
यूपीए के भूमि अधिग्रहण कानून में एनडीए सरकार ने क्या-क्या बदलाव किए हैं

एलएआरआर ऐक्ट, 2013
निजी प्रोजेक्ट्स के लिए 80 फीसदी भूमि मालिकों की सहमति जरूरी, पीपीपी प्रोजेक्ट्स के लिए 70 फीसदी, सरकारी प्रोजेक्ट्स के लिए किसी की नहीं.

सभी प्रोजेक्ट के लिए सामाजिक प्रभाव आकलन अनिवार्य, सिर्फ धारा 40 में बताए गए अहम मामलों को या सिंचाई प्रोजेक्ट (जिनमें पर्यावरण प्रभाव आकलन जरूरी है) को छोड़कर.

सिंचित बहुफसली जमीन एक निश्चित सीमा के आगे अधिग्रहीत नहीं की जा सकती. सभी प्रोजेक्ट्स के लिए कृषि भूमि का अधिग्रहण कुल बोए गए खेतों से ज्यादा नहीं होना चाहिए.

इस कानून के तहत अधिग्रहीत जमीन पर कब्जे के बाद पांच साल तक इस्तेमाल न होने पर उसे मूल जमीन मालिकों या भूमि बैंक को लौटाना ही होगा.

एलएआरआर कानून 2013 उन मामलों पर भी लागू होगा, जिनमें जमीन इसके के लागू होने से पांच साल या पहले दी गई है, पर जमीन का भौतिक कब्जा नहीं लिया गया है या मुआवजा अदा नहीं हुआ है.

कानून के प्रावधान तब भी लागू होंगे, जब जमीन सार्वजनिक उद्देश्य से प्राइवेट कंपनियों के लिए अधिग्रहीत की जा रही हो.

जो अध्यादेश लागू किया
रक्षा, ग्रामीण बुनियादी ढांचा, औद्योगिक गलियारों, बुनियादी ढांचा और सामाजिक बुनियादी ढांचा के लिए सहमति की जरूरत नहीं.

यह सरकार को ऊपर बताई गई पांच श्रेणियों के तहत आने वाली परियोजनाओं के लिए सामाजिक प्रभाव आकलन से छूट देता है.

यह सरकार को पांच श्रेणियों के तहत आने वाले प्रोजेक्ट को छूट देने की इजाजत देता है.

जमीन या तो प्रोजेक्ट की शुरुआत में बताई गई मियाद के बाद या पांच साल के बाद, जो भी बाद में आता हो, लौटानी होगी.

जमीन देने और भौतिक कब्जा लेने के बीच के साल गिनते समय वे दो साल नहीं गिने जाएंगे जो अदालती मुकदमेबाजी में बेकार चले गए.

“प्राइवेट कंपनी” शब्द को “प्राइवेट एंटिटी” से बदल दिया गया. “प्राइवेट एंटिटी” सरकारी संस्था से इतर संस्था है.

लोकसभा में पारित विधयेक
छूट प्राप्त प्रोजेक्ट में सामाजिक बुनियादी
ढांचा नहीं. औद्योगिक गलियारे की पहचान स्पष्ट कीरू ऐसे गलियारे जो सरकार@
सरकारी उपक्रम स्थापित करेंगे. ये सड़क@रेलवे के दोनों ओर एक किमी तक होंगे.

ऐसी छूट से पहले सरकार को यह पक्का करना होगा कि जो जमीन अधिग्रहीत हो रही है, वह प्रोजेक्ट के लिए न्यूनतम जरूरी जमीन है.

ऐसी छूट से पहले सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि अधिग्रहीत की जा रही जमीन प्रोजेक्ट के लिए न्यूनतम जरूरी जमीन है.

अध्यादेश में कोई बदलाव नहीं.

अध्यादेश में कोई बदलाव नहीं.

अध्यादेश में कोई बदलाव नहीं.

जो आपत्तियां की गईं
ज्यादातर अधिग्रहण इन्हीं पांच श्रेणियों में आते हैं, इसलिए इससे 2013 के कानून में बनाए गए सभी सुरक्षाकवच ध्वस्त हो जाएंगे.

कांग्रेस के मुताबिक सामाजिक प्रभाव का आकलन करने की सरकार की जिम्मेदारी को लेकर कोई समझौता नहीं हो सकता.

यह बात 2013 के कानून में निर्धारित सामाजिक प्रभाव आकलन प्रक्रिया से ली गई है. सरकार ने इसकी बजाए प्रभावित परिवारों की तसल्ली के लिए मामूली बात जोड़ दी है.

इससे कानून कमजोर हो गया है और यह सरकार को जमीन का इस्तेमाल करने में देरी के लिए जवाबदेह ठहराने से बचाकर फायदा पहुंचाता है.

इससे सुप्रीम कोर्ट की निर्धारित “मुआवजा अदा किया गया” की परिभाषा को निष्प्रभावी कर दिया गया है.

प्राइवेट कंपनी की जगह प्राइवेट
एंटिटी शब्द से यह बात पक्की की गई कि कोई भी सरकार से अधिग्रहण के लिए गुजारिश कर सकता है.



मुख्यमंत्री फरमाते हैं
जहां कुछ मुख्यमंत्रियों ने समर्थन दिया, वहीं कई दूसरे मुख्यमंत्री सरकार की तरह नहीं सोचते

समर्थन में
एन. चंद्रबाबू नायडू
आंध्र प्रदेश
अपने राज्य की नई राजधानी बनाने की खातिर जमीन के लिए बेताब. वे चाहते हैं कि भूमि अधिग्रहण कानून जल्दी से जल्दी आए, फिर चाहे जिस रूप में आए.


सख्तजान सौदेबाज
नवीन पटनायक
ओडिसा
उन्होंने अपने सांसदों से
विधेयक का तब तक विरोध करने को कहा है, जब तक केंद्र “संपत्तियों का व्यावसायिक प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल किया जा रहा हो तो भूमि गंवाने वाले लोगों को हितधारक बनाने” वाली धारा जोडऩे की उनकी मांग नहीं मान लेता.

अखिलेश यादव
यूपी
वे एनडीए के विधेयक के विरोध में हैं, पर 2013 के कानून से भी खुश नहीं हैं. मार्च, 2015
में नई नीति को मंजूरी दी. इससे आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे प्रोजेक्ट के लिए विक्रेताओं और खरीदारों के बीच सीधी बातचीत हो सकी.

कांग्रेसी मुख्यमंत्री
पार्टी लाइन पर चलते हुए वे भूमि अधिग्रहण विधेयक का विरोध कर रहे हैं. 15 जुलाई को नीति आयोग की बैठक का भी बहिष्कार किया. असम के सीएम राज्य में अलग कानून की बात भी कह चुके हैं.

नीतीश कुमार
बिहार
“राज्य सरकार 2013 के कानून के मूल रूप को, उसकी आत्मा और शब्दों को, हल्का करने, रद्द करने या छेड़छाड़ करने की किसी भी कोशिश के विरोध में है.

जे. जयललिता तमिलनाडु
मार्च में निचले सदन में विधेयक के मौजूदा स्वरूप का समर्थन किया, लेकिन बाद में सरकार से उन संशोधनों पर आगे नहीं बढऩे की अपील की जो राज्य सरकारों को निश्चित प्रोजेक्ट को इस कानून के दायरे से छूट देने की शक्ति देते हैं.

ममता बनर्जी
पश्चिम बंगाल
अपने सांसदों को निर्देश दिया है कि जबरन अधिग्रहण की धारा के बदलने तक विधेयक का विरोध करें. राज्य पहले से ही एक वैकल्पिक भूमि नीति पर चल रहा है.

के. चंद्रशेखर राव
तेलंगाना
पहले उनकी पार्टी टीआरएस ने धमकी दी थी
कि अगर एसआइए और सहमति की धारा
कानून में वापस नहीं लाई गई तो वह संसद में कानून का विरोध करेगी, पर अब साथ आ सकती है.

बीजेपी
मुख्यमंत्री
सभी बीजेपी मुख्यमंत्री भूमि अधिग्रहण विधेयक के समर्थन में हैं.



बदलावों का समर्थन नहीं करने वाले सहयोगी
मुफ्ती मुहम्मद सईद
जम्मू और कश्मीर
बदलावों के किसान विरोधी होने की धारणा का जिक्र करते हुए सईद ने पीएम मोदी से सभी सियासी दलों को साथ लाने के लिए कहा. उन्होंने कहा, “प्रस्तावित बदलावों में सहमति और सामाजिक प्रभाव आकलन को लेकर थोड़ी चिंताएं हैं.”

प्रकाश सिंह बादल
पंजाब
नीति आयोग की संचालन परिषद की बैठक में उन्होंने दलील दी कि किसानों के दिमाग में आम धारणा यही है कि यह विधेयक “किसान विरोधी” है.

जो यूपीए का कानून वापस चाहते हैं
माणिक सरकार त्रिपुरा
“कुछ खामियों के बावजूद एलएआरआर कानून 2013 में कुछ सिद्धांतों को अपनाया गया था जो किसानों और जमीन के आश्रितों को कुछ सुरक्षा देते थे और खाद्य सुरक्षा चिंताओं से देश की हिफाजत करते थे.”

अरविंद केजरीवाल दिल्ली
“यह धारणा गलत है कि 2013 के कानून के नतीजतन इस देश का विकास ठहर जाएगा. यह दलील भी गलत है कि इसकी वजह से समय की बर्बादी होगी.”

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