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भारत की बड़ी और बेमिसाल फौज की फजीहत

यूपीए सरकार ने जिस भारतीय सेना को पैसे और जरूरी साजो-सामान के लिए तरसाया, वह आज आधुनिक रूप पाने के लिए जूझ रही है. क्या नई सरकार उसे संकट से उबारेगी?

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aajtak.in
मनु पब्बीनई दिल्ली, 22 September 2014
भारत की बड़ी और बेमिसाल फौज की फजीहत

नई दिल्ली में 16 अप्रैल, 2010 को राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर बैठक में तत्कालीन रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने सेना के प्रमुख कमांडरों को भरोसा दिलाया था कि बजट की अब कोई कमी नहीं रहेगी. रक्षा मंत्री ने बड़े भरोसे से कहा था, ‘‘जहां तक सशस्त्र सेना को आधुनिक बनाने का सवाल है, पैसे की कमी कभी नहीं होने दी जाएगी.’’ अधिकारी यह आश्वासन पाकर धन्य हो गए थे.

अर्थव्यवस्था उछाल पर थी और सेना के लिए खरीद बदस्तूर चल रही थी. इस बैठक से महीने भर पहले भारत ने वायु सेना के लिए 12 वीवीआइपी हेलिकॉप्टर खरीदने के लिए 76 करोड़ डॉलर के करार पर हस्ताक्षर किए थे और भी कई बड़ी खरीद की तैयारियां चल रही थीं. इसमें अमेरिका से 10 स्ट्रेटजिक लिफ्ट एयरक्राफ्ट खरीद के लिए 4.1 अरब डॉलर का सौदा भी था. भारतीय वायु सेना ने तब तक इन विमानों का नाम भी नहीं सुना था. वह तो रूसी लड़ाकू विमानों का पूरा बेड़ा कम दाम पर खरीदती रही थी.

इसलिए कमरे में मौजूद सेना के तीनों अंगों के सैन्य रणनीतिकारों के पास एंटनी पर भरोसा न करने की कोई वजह नहीं थी. कुछ दिन बाद एक सेनाध्यक्ष ने कहा कि अब पैसे की कोई फिक्र नहीं हैः ‘‘यह तो ब्लैंक चेक है, पैसा अब समस्या नहीं है. सवाल यह है कि हमें क्या चाहिए और कब चाहिए.’’ मगर उस चार सितारा अधिकारी के सपनों के वे दिन-जब आधुनिक सेना क्षेत्र में होने वाली किसी भी नापाक हरकत को कुचलने की क्षमता से लैस हो सके-कभी आए ही नहीं.

इसके बाद के महीनों में सुकना भूमि घोटाला खुला और फिर तो जैसे रक्षा घोटालों की बाढ़-सी ही आ गई. अर्थव्यवस्था फिसलने लगी, नीतिगत पक्षाघात हो गया और फैसले नहीं लिए जा रहे थे. एंटनी इतने चौकन्ना थे कि घोटाले का जोखिम उठाने की बजाए फाइल रोकने पर आमादा थे. उनका मंत्रालय कामकाज करना छोड़ चुका था. नतीजतन, भारतीय सेना को आधुनिक बनाने की योजना पस्त हो गई.

हाथ से निकला समय
नीतिगत पक्षाघात की सबसे ज्यादा मार सशस्त्र बलों पर पड़ी. आधुनिकीकरण की उनकी तमाम योजनाओं और इरादों पर पानी पड़ गया और कोई खास तरक्की नहीं हुई. विडंबना यह है कि भारतीय सेना दुनिया में अपने किस्म की अकेली सेना है जो धारा के विपरीत चल रही है. दुनिया भर में अब रवायत है कि सेना चाहे संख्या में ‘‘कम हो पर सयानी’’ हो, लेकिन हमारी सेना तादाद बढ़ाकर ही भरपाई कर रही है.

राइनमेटल, रॉल्स रायस और फिनमेक्केनिका जैसी बड़ी कंपनियों को भारत में कारोबार करने से रोक दिया गया है. भ्रष्टाचार के शक के दायरे में आने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध लागू कर दिया गया है. यूपीए सरकार ने अपने अंतिम वर्षों में एकमात्र बड़ा रक्षा सौदा-वायु सेना को बुनियादी ट्रेनर दिलाने और मिराज 2000 लड़ाकू बेड़े को उन्नत बनाने का किया.

रक्षा खरीद परिषद के सदस्यों का कहना है कि निर्णय लिए नहीं जा रहे थे और समस्याओं को एजेंडा से चुपचाप हटाने से पहले उन पर फैसले महीनों रोक कर रखे जाते थे. यह परिषद खरीद के मामले में रक्षा मंत्रालय की प्रमुख संस्था है. अन्य मामलों में टेंडर निकालने, जांचने और सप्लायर्स की सूची बनाने की लंबी और मेहनतभरी प्रक्रिया से ऐसा लगता है कि इसे अंतिम समझौते को टालने या रोकने के लिए ही बनाया गया था.

रक्षा मंत्रालय में जोश की कमी ने अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में अपना कारोबार कम करने के लिए मजबूर कर दिया. बीएई सिस्टम्स जैसी बड़ी कंपनियां भारत में अपना करोबार फैलाने में सावधानी से काम ले रही हैं जबकि टेक्सट्रॉन (बेल) और सिकोर्सकी ने असैन्य बाजार पर ध्यान लगा दिया है. यूरोप की एक बड़ी कंपनी इएडीएस, जिसे अब एयरबस कहा जाता है, ने भी कारोबार सीमित कर दिया है और राईनमेटल ने कारोबार ही समेट लिया है.

नई सरकार के सत्ता में आने के कई महीने बाद भी आधुनिकीकरण की कई योजनाएं ठंडे बस्ते में हैं और आपात खरीद के लिए भी पैसा मुश्किल से मिल रहा है.

सेना में अब नीतिगत अनिर्णयों को मजाक में ‘‘एंटनी देरी’’ कहा जाता है. इसके साथ ही रुपए में गिरावट और बढ़ती महंगाई की वजह से सेना के आधुनिकीकरण की बकाया योजनाओं की कीमत अब 35 अरब डॉलर से भी ज्यादा हो गई है. इनमें से कई प्रोजेक्ट अंतिम चरणों में फंसे हैं. अनेक तो पूरे ही नहीं हो पाएंगे क्योंकि पैसे की इतनी कमी है कि एनडीए सरकार चाहकर भी कोई तोड़ नहीं निकाल सकती.

इनमें चीन की सीमा पर तैनात हो रही पर्वतीय हमलावर टुकडिय़ों के लिए जरूरी तोपों से लेकर पारंपरिक युद्ध में बढ़त रखने के लिए जरूरी विमान और दूसरे उपकरण तथा नौसेना के लिए जरूरी सामान शामिल हैं. अधिकारी और जानकारों का कहना है कि इसके लिए यूपीए सरकार का आधुनिकीकरण से परहेज और राष्ट्रीय संसाधनों में सेना की हिस्सेदारी भी कम करने का रवैया जिम्मेदार है.

पिछले चार साल में भारत का रक्षा खर्च अब तक के सबसे नीचले स्तर पर है. खर्च के सबसे अधिक स्वीकार्य वैश्विक पैमाने से देखें तो भारत अपने जीडीपी का जितना प्रतिशत सेना के लिए देता है वह पिछले चार दशक से भी अधिक समय में सबसे नीचले स्तर पर यानी 1.74 प्रतिशत है. 1980 के दशक में यह 3 प्रतिशत के औसत स्तर से लगातार गिरावट है.

वैश्विक औसत 2.5 प्रतिशत का है. हालांकि इसमें बहुत भिन्नताएं हैं. नाटो ने अपने सदस्य देशों के लिए निर्देश है कि जीडीपी का 2 प्रतिशत रक्षा क्षेत्र के लिए रखा जाए. फिर भी चीन ने अपने ऊंचे जीडीपी का 2 प्रतिशत से कम कभी सुरक्षा पर खर्च नहीं किया.

रक्षा विशेषज्ञ ब्रिगेडियर गुरमीत कंवल (सेवानिवृत्त) का कहना है, ‘‘साफ  जाहिर है कि मौजूदा आवंटन सेना के आधुनिकीकरण के लिए पर्याप्त नहीं है जबकि उभरते खतरों और चुनौतियों का सामना करने के लिए आधुनिकीकरण आवश्यक है. रक्षा खर्च तो वर्षों से एक जैसा है.’’
वे साजोसामान जिनका वादा तो किया गया पर भारतीय सेना को मुहैया नहीं कराया गया
बिना निशाने के हथियार
न सिर्फ भारत का रक्षा खर्च घटा है बल्कि सेना के आधुनिकीकरण में बाधक एक और गलत प्रवृत्ति उभरती दिखाई दे रही है. वेतन के भुगतान, बुनियादी सुविधाओं की देखभाल और डीजल टैंक भरने जैसे राजस्व खर्चे लगातार बढ़ते जा रहे हैं. इस मद में 2014-15 के रक्षा बजट का 60 प्रतिशत से अधिक खर्च हो जाएगा. वैसे तो पिछले कुछ वर्षों में रक्षा बजट औसतन 12 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ा है लेकिन बढ़ी हुई रकम का बहुत बड़ा हिस्सा बढ़ते वेतन बिल, ईंधन की चढ़ती कीमतों और रुपए की विनिमय दरों में फेरबदल की भेंट चढ़ जाता है.

पिछले साल सरकार को आधुनिकीकरण के लिए रखी गई 7,800 करोड़ रु. की रकम ईंधन की बढ़ती लागत की भरपाई में खर्च करनी पड़ी. एक तीन सितारा अधिकारी का कहना था, ‘‘कमी से तो कोई इनकार नहीं कर सकता. इस साल नए सौदों के लिए हमारे पास सिर्फ  2,500 करोड़ रु. हैं. बाकी पूंजीगत बजट पिछले लंबी अवधि के खरीद सौदों की किस्त के भुगतान में चला जाएगा.’’

इन पिछले सौदों में सुखोई एसयू-30 एमकेआइ लड़ाकू विमान, बोइंग सी-17विमान और सी-130 ट्रांसपोर्टर शामिल है. एक ब्रिगेडियर ने इंडिया टुडे को बताया कि नए सौदे के लिए इस साल सेना का बजट सिर्फ 500 करोड़ रु. के आसपास है. सेना के लिए यह ऊंट के मुंह में जीरा है.

इस साल फरवरी में रक्षा प्रदर्शनी में अपना साजो-सामान दिखाने दिल्ली आए दुनिया के बड़े रक्षा आपूर्तिकर्ताओं के सामने एंटनी ने ऐसा धमाका किया जिसकी बहुतों को उम्मीद थी. वायु सेना के लिए 126 लड़ाकू विमान खरीदने के लिए दुनिया के अब तक के सबसे बड़े सौदे के बारे में एंटनी ने कहा, ‘‘अब इसके लिए एक पैसा नहीं बचा है. पाई-पाई खर्च हो चुकी है.’’ एंटनी ने रक्षा एक्सपो को पहले ही दिन ऐसा करारा झटका दिया कि दुनिया की बड़ी रक्षा सामग्री कंपनियों के प्रमुख अधिकारी सोच में पड़ गए कि अब इसमें हिस्सा लेने का क्या लाभ है.

सवाल यह है कि चार साल पहले धन की कोई कमी नहीं थी तो खजाना खाली होने की नौबत कैसे आ गई जबकि सेना की लड़ाकू क्षमताओं में इजाफा करने की कोई विशेष कोशिश तक नहीं हुई? इसका कुछ जवाब तो आर्मिंग विदाउट एमिंगः इंडियाज मिलिट्री मॉडर्नाइजेशन नामक किताब के प्रमुख तर्क में छिपा है. ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के रक्षा विशेषज्ञों स्टीफन पी. कोहेन और सुनील दासगुप्ता की इस किताब में तर्क दिया गया है कि भारत की कोई सुरक्षा रणनीति नहीं है इसलिए सेना के आधुनिकीकरण की कोई योजना भी नहीं है.

सच तो यह है कि देश का रक्षा आधुनिकीकरण कार्यक्रम यूपीए के शासनकाल में एकदम ठप्प हो गया. हालांकि एकदम साफ दिख रहा था कि इसकी तत्काल आवश्यकता है. मंत्रालय के भीतर अनिर्णय की स्थिति, वित्त मंत्रालय के साथ खुली जंग और राजनैतिक मजबूरियों ने सुविधा की खरीद को बढ़ावा दिया जिसमें वे प्रोजेक्ट मंजूर हो गए जिन्हें प्रोसेस करना आसान लगा जबकि अधिक महत्वपूर्ण जरूरतों को नजरअंदाज कर दिया गया.

मिसाल के तौर पर भारतीय वायु सेना के लिए अमेरिका से 10 परिवहन विमानों की खरीद का 4.1 अरब डॉलर का सौदा दो सरकारों के बीच था जिसे आसानी से आगे बढ़ाया जा सकता था. अमेरिका ने खूब जोर लगाया और भारत तैयार हो गया क्योंकि इसमें कोई विवाद नहीं दिखा और इसे पाक-साफ  माना गया. मसला सिर्फ इतना था कि वायु सेना ने बड़ी मुश्किल से जो धन जुटाया था, उसे लड़ाकू बेड़े की ताकत बढ़ाने और मारक हथियार प्राप्त करने की बजाए इंतजाम की क्षमता पर खर्च कर दिया गया.

पश्चिमी वायु कमान के पूर्व प्रमुख एयर मार्शल पी.एस. अहलूवालिया (सेवानिवृत्त) का कहना था, ‘‘वायु सेना असल में हमलावर सेना होती है. हमें सिर्फ इंतजाम के साधनों पर ध्यान देने की बजाए मारक क्षमता बढ़ाने में निवेश करना चाहिए. मसला यह है कि सेना के तीनों अंगों में से हरेक खरीद के बारे में अपने आप फैसला कर रहा है. कोई राष्ट्रीय रक्षा नीति नहीं है. इसलिए सेना को हथियारबंद करने के हमारे इरादे के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है. चीन से लगी सीमा पर 80 हजार नए सैनिकों की तैनाती का फैसला भी अजीब है. खर्च आसमान छूने लगेगा. क्या चीन की सेना यहां का इलाका हड़पना चाहती है? मुझे ऐसा नहीं लगता.’’

कोई आसान उपाय नहीं
मई में वित्त और रक्षा मंत्रालय का कार्यभार संभालने के बाद मीडिया के साथ गिनी-चुनी मुलाकातों में से एक में हैरान-परेशान अरुण जेटली ने कहा था, ‘‘कोई भी कदम उठाने से पहले अभी देखना है कि कितने बिल बकाया हैं और हम कितना कर सकते हैं.’’ उन्होंने बजट समर्थन बढ़ाने के जरिए कोई झ्टपट समाधान देने से इनकार कर दिया था, ‘‘अर्थव्यवस्था का आधार बढ़ रहा है इसलिए जीडीपी का कम प्रतिशत भी बड़ी रकम हो सकता है. सेना के लिए जो भी रकम जरूरी होगी, हमारी कोशिश धीरे-धीरे उसे उपलब्ध कराने की होगी.’’

बेशक, नई सरकार सारी गड़बड़ी का पता लगाकर आगे बढऩे की कोशिश में सावधानी से काम कर रही है. पिछले तीन महीनों में निर्माण, निर्यात और खरीद के बारे में नए नीतिगत निर्णय अधिसूचित किए गए हैं ताकि रक्षा सेनाओं के आधुनिकीकरण को कुछ तो दिशा मिले. अधिकारियों का कहना है कि इस नीति में मुख्य दिशा, रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने, भारत में विदेशी सहयोग से संयुक्त उद्यम लगाने, सभी बड़े खरीद सौदों में भारतीय कंपनियों को आगे रखने के लिए प्रोत्साहन देने तथा विदेशी मुद्रा का खर्च कम करने की है और इस दिशा में जमीन पर काम होने भी लगा है.

अगस्त के अंत में वायु सेना के एक तीन सितारा अधिकारी ने वायु भवन में अपने कार्यालय में भारत की चार बड़ी रक्षा उत्पादन कंपनियों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों से मुलाकात की. इसका मकसद निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए वायु सेना द्वारा निर्धारित तीन अति आधुनिक प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाना था. ज्यादा ताकतवर लड़ाकू विमान का नया रूप तैयार करने का एलसीए एमके-2 प्रोजेक्ट; देश में नए लड़ाकू विमान विकसित करने के लिए एडवांस्ड मीडियम कॉबैट विमान प्रोजेक्ट; और भविष्य में काम आने लायक मानव रहित लड़ाकू वैमानिक वाहन इनमें शामिल हैं.

संदेश साफ था-विदेशी टेक्नोलॉजी के साझीदार चुनो, गठजोड़ करो और एक व्यवहारिक योजना दो तो प्रोजेक्ट आपका हो सकता है. सेना के किसी भी वैमानिक कार्यक्रम में सरकारी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को शामिल करने की परंपरा समाप्त हो गई. सेना भी नई तोपों की खरीद के मामले में नौ सेना की राह पर चलने की तैयारी में है. यानी अगर जरूरत पड़े तो विदेशी सहायता से पूरी तरह देश में उत्पादन किया जाए. अगले दशक में करीब चार हजार तोपें खरीदे जाने का अनुमान है. अब योजना यह है कि भविष्य में सभी खरीद सिर्फ  भारतीय कंपनियों से होगी जिनमें अनेक ने पेटेंट और पूरा उत्पादन कारखाना खरीद कर दुनियाभर से टेक्नोलॉजी हासिल की है.

नीतिगत निर्णय के अलावा नई सरकार रास्ते में फंसे प्रोजेक्ट पर भी कठिन फैसले ले रही है. पिछले महीने उसने सेना के लिए 197 हल्के हेलिकाप्टर खरीदने का सौदा रद्द कर दिया. यह सौदा करीब चार साल से लटक रहा था क्योंकि यूपीए सरकार ने अनियमितता के आरोप लगने के बाद इसे रोक दिया था. इस रोक से आर्मी एविएशन कोर के आधुनिकीकरण में देर हुई है. फिर भी सेना में कुछ लोगों को इस बात से राहत मिली है कि कोई फैसला तो हुआ और अब हेलिकॉप्टर खरीदने की प्रक्रिया नए सिरे से शुरू की जा सकती है.

रक्षा मंत्रालय ने 15 चिनूक हेवी लिफ्ट हेलिकॉप्टर खरीदने के सौदे और 22 अपाचे लड़ाकू हेलिकाप्टर सौदे को भी मंजूरी दे दी. भारत में उत्पादन और विकास से जुड़ी आधुनिकीकरण परियोजनाओं को बढ़ावा देने का ध्यान रखते हुए सरकार ने भारत में बने 118 अर्जुन टैंक 6,700 करोड़ रु. में खरीदने को मंजूरी दे दी है. सेना को तीन दशक में पहली बार आर्टिलरी सिस्टम्स मिलने वाले हैं. जेटली ने 40 अर्जुन 130 मिलीमीटर कैटापुल्ट सिस्टम्स की खरीद के लिए 900 करोड़ रु. मंजूर किए हैं. इन सचल तोपों की सेना को बहुत जरूरत थी.

मंत्रालय ने 6 पनडुब्बियों को करीब 5,000 करोड़ रु. की लागत से उन्नत करने और दोबारा फिट करने की भी मंजूरी दे दी है. इस फैसले से समुद्र के भीतर के बेड़े की सेहत को लेकर उठी चिंताएं कुछ कम हुई हैं. एक और बड़ा फैसला एवरो परिवहन विमान बेड़े के लिए वायु सेना के प्रोजेक्ट से एचएएल को पूरी तरह हटाने का है. करीब 30,000 करोड़ रु. की लागत का यह सौदा भारतीय निजी कंपनियां विदेशी भागीदार के सहयोग से संभालेंगी.

कुछ रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि नई सरकार की नीति बहुत हद तक भारत की निजी कंपनियों के एक समूह से संचालित हैं लेकिन सेना तब तक शिकायत नहीं करेगी जब तक उसकी मांग पूरी होती रहेगी. निजी क्षेत्र उत्साहित है. उत्पादन सुविधाओं को भारत में लाने की प्रक्रिया धीमी रहने की संभावनाओं के बावजूद ऊंची टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में हजारों नौकरियां पैदा हो सकती हैं.

भारत के रक्षा क्षेत्र में मची गड़बड़ी को ठीक करना आसान नहीं है और नई सरकार को आने वाले महीनों और वर्षों में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. अलग रक्षा मंत्री नियुक्त होने तक यह भारी बोझ जेटली के कंधों पर रहेगा जो पहले से ही भारतीय अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने की भारी जिम्मेदारी उठा रहे हैं.

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