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सोशल मीडिया पर लड़ा जाएगा चुनाव 2014

साइबर वार रूम जंगी तैयारियों में जुटे. भाजपा और कांग्रेस सोशल मीडिया पर फैले वोटरों के एक नए तबके तक पहुंचने को बेताब.

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aajtak.in
कुणाल प्रधाननई दिल्‍ली, 19 February 2013
सोशल मीडिया पर लड़ा जाएगा चुनाव 2014 साइबर वार रूम

यह सोमवार दोपहर बाद यही कोई 3 बजे का समय है. 11, अशोक रोड पर एक बड़े हॉल में नियमित भीड़ जमा हो रही है. बीजेपी यहीं पर रोज मीडिया ब्रीफिंग करती है. कैमरे वाले धक्का-मुक्की कर रहे हैं, पत्रकार अपने परिचित दूसरे खबरची साथियों से दुआ-सलाम कर रहे हैं. हर तरफ हेडफोन और बड़े-बड़े माइक्रोफोनों की भरमार है. एक टीवी कैमरे के तार सांप की तरह आड़ा-तिरछा घूमते हुए काले रंग के एक लैपटॉप की ओर चले गए हैं. इस लैपटॉप को चलाने का जिम्मा 22 वर्षीय हितेंद्र मेहता के पास है. एमसीए का यह छात्र बीजेपी की सूचना तकनीकी इकाई का सदस्य है.

18 के आसपास के दिखते हितेंद्र लैपटॉप के की-बोर्ड पर तेजी से उंगलियां चलाते हुए पार्टी के इंटरनेट टीवी चैनल ‘युवा’ पर प्रेस कॉन्फ्रेंस को प्रसारित कर रहे हैं. बीजेपी के मुख्यालय में ही यहां से करीब 20 मीटर की दूरी पर एक कोने में बने कमरे में हितेंद्र के सहकर्मी 35 वर्षीय नवरंग एस.बी. इस सीधे प्रसारण को देख रहे हैं और पार्टी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद के बयान के मुख्य बिंदुओं को उठाकर उसी समय ट्विटर और फेसबुक पर डाल रहे हैं. ठीक 3 बजकर 43 मिनट पर नवरंग युवाआइटीवी नाम के एकाउंट से ट्वीट करते हैं—“बीजेपी का कोई भी साधारण सदस्य बीजेपी का अध्यक्ष बन सकता हैः श्री रवि शंकर प्रसाद, http://yuva4india.tv/#News#India” पर सीधा प्रसारण देखें.” फिर वे इसे दोबारा ट्वीट करते हैं, एक बार @BJP4u एकाउंट से और एक बार अपने निजी आइडी @Navrang से, जो “आइ टेरेराइज़ कांग्रेस” के नाम से दर्ज है.social media

हितेंद्र और नवरंग बीजेपी की 100 सदस्यों वाली उस इकाई का हिस्सा हैं, जिसे पार्टी की विचारधारा को सोशल मीडिया पर लोकप्रिय बनाने का श्रेय दिया जाता है. कई मुद्दों पर चोट खाने के बाद अब कांग्रेस को भी इस सोशल नेटवर्क का महत्व समझ में आया है. देश की सबसे पुरानी, सबसे बड़ी और शायद सबसे हठधर्मी राजनीतिक पार्टी ने दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में 10 सदस्यों वाली संचार और प्रचार समिति कमेटी बनाई है. उनके अलावा इसमें मनीष तिवारी, अंबिका सोनी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दीपेंदर हड्डा, राजीव शुक्ल, भक्त चरण दास, आनंद अदकोली, संजय झा और विश्वजीत सिंह शामिल हैं. उनकी भी जंगी योजना तैयार हो चुकी है और अब मैदान में उतरने के लिए आला कमान की ओर से हरी झंडी मिलने का इंतजार किया जा रहा है.

दिग्विजय सिंह कहते हैं, “सोशल मीडिया के महत्व को अब नकारा नहीं जा सकता.” इस ग्रुप की मुख्य योजना यह है कि देश भर में युवा कांग्रेस और नेशनल स्टुडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआइ) जैसे अपने संगठनों से कार्यकर्ताओं को गोलबंद किया जाए और उसका नियंत्रण पार्टी के नेताओं की एक मुख्य टीम के हाथ में दिया जाए.

साफ पता चलता है कि कांग्रेस को सोशल मीडिया पर अपनी छवि सुधारने की खास जरूरत है. इसका सबूत हाल ही में कई मौकों पर देखा गया. मसलन अकबरुद्दीन ओवैसी के नफरत फैलाने वाले भाषण के यूट्यूब पर तेजी से फैलने के बाद 8 जनवरी को ओवैसी की गिरफ्तारी, अण्णा हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, जो 2011 में कई दिनों तक दुनिया में सबसे ऊपर रहने वाला ट्विटर ट्रेंड था, और दिसंबर 2012 में दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ आंदोलन, जिसने सोशल मीडिया के मंचों पर लोगों की टिप्पणियों से हवा मिलने के कारण व्यापक रूप ले लिया था.

केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी कहते हैं, “अब नए बदलाव के महत्व को समझ लिया गया है. हमने स्वीकार किया है कि फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब एक राजनीतिक माध्यम बन सकते हैं. यह पार्टी के हित में है कि हम इस नई तकनीकी के महत्व को समझें.” कांग्रेस कहती है कि यह सिर्फ अगले साल आम चुनावों को ध्यान में रखकर लिया जाने वाला कोई रणनीतिक फैसला नहीं है, बल्कि उससे आगे के लिए भी एक बड़ा फैसला है.twitter number

इस तरह के बयान कांग्रेस की शुरुआती प्रतिक्रिया से एकदम उलट हैं. सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव का जवाब वह सेंसरशिप, एकाउंट को बाधित करने और वेबसाइटों को प्रतिबंधित करने जैसे उपायों से करती रही है. मार्च, 2011 में नई दिल्ली में एक मौके पर संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया का उपयोग करने वालों से अपील की थी कि वे इसके खतरों को समझें—“अभिव्यक्ति की आजादी की कुछ सीमाएं हैं.

आप यह कैसे सुनिश्चित करेंगे कि ये साइट उन सावधानियों को बरकरार रख पाएंगी?” लेकिन ऑनलाइन के गलत इस्तेमाल के कारण पहले दो बार अपना ट्विटर एकाउंट हटा चुके तिवारी अब थोड़ा अलग नजरिया अपना रहे हैं. वे इसके सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान देते हुए कहते हैं, “शुरुआती दौर में चल रहे इस माध्यम के इस्तेमाल के कुछ नियम बन जाएंगे.”

सोशल मीडिया की एजेंडा सेटिंग इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया से मिले ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत में इस समय 13.7 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, 6.8 करोड़ फेसबुक एकाउंट हैं और 1.8 करोड़ ट्विटर आइडी हैं. कई लोगों के लिए यह सूचना का पहला स्रोत बन चुका है. एक बात तय है कि सोशल मीडिया का सीधा असर मुख्य धारा के मीडिया पर पड़ रहा है. कई बार इसका प्रभाव इतना अधिक हो जाता है कि यह सामाजिक परिवर्तन का वाहक बन जाता है.

राजनीतिक हथियार के रूप में सोशल नेटवर्क का महत्व दो मुख्य बिंदुओं पर निर्भर करता है. पहला, देश का मध्यम वर्ग, जिसने महसूस किया कि वह चुनाव नतीजों को नहीं बदल सकता (2009 में दक्षिण मुंबई से बैंकर मीरा सान्याल की हार ने इसे साबित कर दिया था), और उसने इंटरनेट को जंग के वैकल्पिक मैदान के रूप में अपना लिया. फेसबुक और ट्विटर अब उसके लिए नए मंच बन गए हैं, और समाचार टीवी स्टुडियो उसके लिए संसद का रूप ले चुके हैं. द न्यूयॉर्क टाइम्स में हाल ही में स्तंभकार थॉमस फ्रेडमैन ने लिखा कि उन्होंने भारत के अपने ताजा दौरे पर जो देखा, वह उनके लिए एक अनोखा अनुभव था—एक बिल्कुल नई राजनीतिक बिरादरी, भारत का वर्चुअल मिड्ल क्लास. फ्रेडमैन ने पाया कि यह वर्ग हालांकि अब भी कमजोर है, लेकिन वह मध्य वर्ग से जुड़े अधिकारों की मांग कर रहा है.

दूसरा है सोशल मीडिया के जरिए सूचनाएं देकर. इससे उसे अपनी राय किसी संपादक या टीवी एंकर के जरिए देने की जरूरत नहीं होती, और इस तरह वह संपादक की कांट-छांट के बिना ही बेरोकटोक अपनी बात दूसरों तक पहुंचा सकता है. तिवारी कहते हैं, “आप लोगों से सीधा संवाद करते हैं. जाहिर है, इसके अपने फायदे हैं.”

लेकिन तीसरी एक और बड़ी बात निकलकर आ रही है. वह यह कि राजनीतिक पार्टियां भी मुख्यधारा के मीडिया में अपना एजेंडा बनाने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकती हैं. मिसाल के तौर पर अप्रैल 2012 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मुलाकात के दिन सुबह के समय @PMOIndia ने लंच टेबल का एक फोटो पोस्ट किया. बस क्या था, मीडिया ने उसे आधार बनाकर समाचार बनाना शुरू कर दिया और सरकार के प्रवक्ता से सवाल पर सवाल पूछे जाने लगे कि कश्मीरी व्यंजन परोसा जा रहा है या नहीं?internet

यूपीए के एक सूत्र के अनुसार, “वास्तविक मुद्दा पीछे रह गया, जब तक कि दोनों मुल्कों के प्रमुख बयान देने के लिए तैयार नहीं हो गए.” हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के व्हाइट हाउस की साइट की तमाम गतिविधियों के विपरीत @PMOIndia के एकाउंट का काम सूचना देने तक ही सीमित है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि चुनाव नजदीक आने के साथ यह साइट राजनीतिक मोड़ भी ले सकती है.

सोशल मीडिया का चतुराई से इस्तेमाल करना एक कला है. 2010 में बीजेपी की आइटी इकाई के प्रमुख बनने वाले 42 वर्षीय अरविंद गुप्ता भी इस बात से सहमत हैं. इलिनोएस से पीएचडी कर चुके गुप्ता इससे पहले एक एनालिटिक्स फर्म चलाते थे. उनकी 100 सदस्यों की टीम में से 30 लोग दिल्ली से और बाकी के 70 लोग 25 राज्यों की उप-इकाइयों से काम करते हैं. वे पार्टी का ट्विटर, फेसबुक पेज, यूट्यूब चैनल, इंटरनेट टीवी फीड, मोबाइल एप्लीकेशन चलाने का काम करते हैं. इसके अलावा वे निजी तौर पर ब्लॉग और ट्वीट करते हैं. दूसरी पार्टियों के नेताओं और समर्थकों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए उनके पास वाच-लिस्ट होती है और वे एक-दूसरे के साथ ट्वीट करते हैं और ट्वीट का जवाब देते हैं.

बीजेपी का मानना है कि इंटरनेट पर उसे जो लोकप्रियता हासिल है, उससे 2014 के आम चुनाव के समय शहरी वोटबैंक को विस्तृत करने में काफी मदद मिलेगी. पार्टी के सूत्रों का कहना है कि इसका सबूत दिल्ली और मुंबई में दिखाई देगा, जहां कांग्रेस को 2009 में सभी 13 सीटों पर जीत मिली थी. गुप्ता इस बात से इनकार करते हैं कि उनकी इकाई दक्षिणपंथी प्रचार से इंटरनेट भर देती है, लेकिन वे यह स्वीकार करते हैं कि लोगों में प्रचार के लिए इसका इस्तेमाल किसी हथियार के रूप में किया जा सकता है. उनकी इकाई का महत्वपूर्ण अंग है चार सदस्यों की विश्लेषक टीम, जिसका नेतृत्व तकनीकी में विशेषज्ञ इंदुशेखर के हाथ में है. वे सोशल मीडिया की गतिविधियों को चुनाव आंकड़ों से मिलाकर देखते हैं.

गुप्ता कहते हैं कि आंकड़े बहुत उत्साहजनक रहे हैं. “आंकड़ों की छानबीन करने से पता चलता है कि ऑनलाइन पर होने वाली गतिविधियों और मतदान बूथ पर दिखाई देने वाली हलचल के बीच सीधा संबंध है.” पार्टी के नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह को 15 से 30 जनवरी के बीच सोशल मीडिया पर सकारात्मक टिप्पणियां मिलीं. ट्विटर पर सबसे ज्यादा 1,845 लोगों ने अपना समर्थन जाहिर किया, इसके बाद फेसबुक पर 546 टिप्पणियां मिलीं. उन्हें कुल 61 प्रतिशत लोगों का समर्थन हासिल हुआ. बीजेपी के अनुसार, यह दिखाता है कि लोगों ने पार्टी अध्यक्ष पद पर उनकी नियुक्ति का स्वागत किया है.

दिल्ली में बीजेपी की इकाई के 30 सदस्य जहां बैठते हैं, वह किसी दूसरे दफ्तर जैसा ही मालूम होता है. वहां सीटें लगी हैं, कंप्यूटर लगाए गए हैं, 20 एमबीपीएस का इंटरनेट कनेक्शन है और बोर्डों पर चार्ट लगे हुए हैं. गुप्ता कहते हैं कि वे स्वयंसेवक हैं, कोई कर्मचारी नहीं. लेकिन कुरेदने पर वे स्वीकार करते हैं कि उन्हें वेतन मिलता है. “यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि वे अपना परिवार चला सकें.” तो क्या वे अनुबंध पर रखे गए हैं और उनका कोई पद होता है? “हां, उन्हें समुचित ढंग से पैसा दिया जाता है. लेकिन एक नियमित नौकरी के तौर पर उन्हें जो पैसा मिलता, उसके मुकाबले उन्हें बहुत कम पैसा दिया जाता है.”

पहले-बाद का चक्कर नहीं

कोलकाता में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पहली क्षेत्रीय पार्टी थी, जिसने सोशल मीडिया को अपना हथियार बनाया. इसके पास तीन स्तरों वाली एक समर्पित टीम है. इन तीन स्तरों में पेशेवर, स्वयंसेवक, जिन्हें उनकी सेवाओं के लिए मानदेय राशि दी जाती है और पार्टी के कार्यकर्ता हैं. इस इकाई को डेरेक ओ ब्रायन ने गठित किया था, जिसे तृणमूल युवा के नेता और ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी चलाते हैं. यह इकाई पार्टी की वेबसाइट, ट्विटर और फेसबुक को संभालने का काम करती है. इस साल पार्टी की ओर से एक डिजिटल चैनल शुरू करने की भी योजना है.

ब्रायन कहते हैं, “हम 360 डिग्री के यानी चहुंमुखी वातावरण में राजनीति कर रहे हैं. चाहे नुक्कड़ पर होने वाली सभा हो, रैली हो, दीवारों पर लगाया जाने वाला पोस्टर हो या ऑनलाइन पोस्ट हो, सबकी अपनी-अपनी अहमियत है.”

कांग्रेस का कहना है कि उसका मॉडल बीजेपी के मॉडल से बिल्कुल अलग होगा. उसका प्रचार ज्यादा सकारात्मक होगा और इसके लिए ‘प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं’ को शामिल किया जाएगा. सूत्र बताते हैं कि कमेटी की बैठक में उन्होंने इस विषय पर बात की कि सोशल मीडिया को एक ऐसा मंच बनाने की जरूरत है, जहां पूरी निष्ठा और लगन से काम करने वाले लोग हों. कमेटी के सदस्य संजय झा कहते हैं, “हमें सरकार की उपलब्धियों को सामने रखने की जरूरत है. हमारा मकसद लोगों को निशाना बनाना नहीं है.”

कांग्रेस के नेता इस बात से इनकार करते हैं कि बीजेपी को मैदान में पहले उतरने का कोई फायदा मिलेगा. तिवारी कहते हैं, “सोशल मीडिया की खूबसूरती यही है कि इसकी क्षमता असीमित है. आपको सीढ़ी दर सीढ़ी नहीं चढऩा पड़ता, आप सीधे 2,000 तक पहुंच सकते हैं.” भारतीय राजनीतिकों में सोशल मीडिया के उपयोग की शुरुआत शशि थरूर ने की थी, जिनकी ट्विटर पर गतिविधियों को उनके साथी बेकार की चीज और विवाद पैदा करने वाला माध्यम बताकर खारिज कर दिया करते थे.

29 जनवरी को रात के 11 बजकर 43 मिनट पर कीर्तिक शशिधरन के नाम से दर्ज ट्विटर आइडी @KS1729 से ट्वीट किया गया “@ShashiTharoor मदुरै के मीनाक्षी अस्पताल में 10 वर्षीया लड़की को ओ-वी रक्त की तुरंत जरूरत है. अगर आप मदद कर सकते हैं तो कृपया कर 09994938490 पर मुरुगन से संपर्क करें.” शशि थरूर ने ट्विटर पर जवाब दिया, जिसके बदले में 90 बार से भी ज्यादा बार तब तक जवाब आते रहे, जब तक यह छात्रों के समूह तक नहीं पहुंच गया. 30 जनवरी, 2013 को रात 10 बजकर 49 मिनट पर @DrSureshKumar ने ट्वीट किया, “@ShashiTharoor मदुरै के एक कॉलेज के छात्रों ने आपके ट्वीट का जवाब दिया. लड़की अब खतरे से बाहर है. बहुत बढिय़ा.”

लेकिन थरूर कहते हैं कि सोशल मीडिया के पास इतनी संख्या नहीं है कि वह भारत जैसे बड़े देश में चुनावों को प्रभावित कर सके. “एक सांसद के तौर पर मैं बीस लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता हूं. मेरे ट्विटर पर देखने वालों की संख्या 16 लाख है, जो मेरे निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या से भी कम है. मेरे वोटरों की 10 फीसदी या शायद उससे भी कम जनसंख्या ट्विटर पर होती है. राजनीति पर इसका प्रभाव तभी हो सकता है जब इंटरनेट इतना सस्ता हो कि दूरदराज की जगहों के लोग अपने सेलफोन से ट्वीट कर सकें.”

बहरहाल, वे इस बात को स्वीकार करते हैं कि युवा शहरी वोटरों पर सोशल मीडिया का असर होता है. “यहां तक कि मेरा ट्वीट देखने वाले लोगों में भी ऐसे युवाओं की संख्या ज्यादा है, जिनकी उम्र अभी वोट देने की नहीं है. निश्चित रूप से इस बात में दम है कि सोशल मीडिया का उन पर प्रभाव पड़ता है और वह आगे चलकर बड़ी भूमिका निभाने वाली है.”

लैपटॉप-टेबलेट की बाढ़ आ रही है और स्मार्टफोन अपने पांव तेजी से पसार रहा है, ऐसे में सोशल मीडिया जल्दी ही अपने जादू का असर दिखाने जा रहा है. क्या 2014 में हम इसका असर देखेंगे?

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