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आराम हराम होने वाला है कोर्ट में

सुप्रीम कोर्ट साल में 193 दिन, हाइकोर्ट 210 दिन और निचली अदालतें 245 दिन काम करती है. लेकिन अब भारत के चीफ जस्टिस आर.एम.लोढ़ा चाहते हैं कि अदालतों में सालभर काम हो. ऐसी स्थिति में जजों और वकीलों की छुट्टियों की योजनाओं का क्या होगा?

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aajtak.in
दमयंती दत्तानई दिल्ली, 08 July 2014
आराम हराम होने वाला है कोर्ट में

यह दोपहर दो बजे का समय है, बाहर का तापमान 45 डिग्री  सेल्सियस है और सूरज आग उगल रहा है. सुप्रीम कोर्ट के पथरीले गलियारों में ऊपर और नीचे तेजी से काम हो रहा है. इनके भीतर आसमान छूती छतें और चमचमाते लकड़ी के काम से बहुत सुकून मिलता है.

वकील जिरह कर रहे हैं जिसे सुनने के लिए कानों पर जोर डालना पड़ता है. जज सुनते हैं, सिर हिलाते हैं और नोट्स लिखते जाते हैं. ये बहुत ही एकरस काम है जो धीरे-धीरे इंद्रियों को सुस्त करता जाता है. समय गुजरता जाता है. एयरकंडिशनर की ठंडक और कैंटीन के चिकने धुएं से उठता कुहासा कोर्ट को अपनी आगोश में ले लेता है. पलकें धीरे-धीरे भारी होती जाती हैं.

गर्मी और कानून के जानलेवा मेल से ज्यादा सुस्ती भला और किस चीज से आएगी? न्याय के इस मंदिर का सबसे गोपनीय रहस्य और कोर्ट की कैंटीन में गपशप का एक मुख्य मुद्दा है: कौन कहां और कब सोया. काम के दौरान झपकी लेने के कारण जजों ने इस्तीफे दिए, उनकी पदोन्नति रुकी, निलंबित हुए और हटाए भी गए.

थोड़ी-बहुत राहत 8-10 हफ्ते की गर्मियों की छुट्टियों में मिलती है. यह परंपरा ब्रिटिश राज के चतुर अंग्रेज जजों ने शुरू की थी जो हर गर्मी के मौसम में मैदानों की झुलसाती गर्मी से बचकर ठंडे माहौल में मौज मनाने चले जाते थे. लेकिन समय के साथ-साथ अधिकतर अच्छी बातों का अंत होने लगता है. अदालत की छुट्टियों के खत्म होने का समय अब सबसे करीब लगता है.

सुप्रीम कोर्ट के जजों के छुट्टी पर जाने से ठीक एक दिन पहले, 11 मई को भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआइ) आर.एम. लोढ़ा ने अदालतों को सालभर खोलने की जरूरत बताई. उन्होंने जयपुर में बार काउंसिल के सदस्यों के सामने कहा, ''आपात सेवाओं की तरह यहां भी ऐसा होना चाहिए.” तुरंत सदस्यों में खलबली मच गई. न्याय का तंत्र हरकत में आ गया.

अन्य जजों ने खुले में न सही, अकेले में इस बात पर असंतोष जताया कि देश के सामने यह विचार रखने से पहले उनसे सलाह नहीं ली गई. सबसे जोरदार विरोध वकीलों ने किया. 4 जून को दिल्ली में बार काउंसिल ऑफ इंडिया की बैठक में सदस्यों ने पूरा जोर लगाकर इस प्रस्ताव को 'अव्यावहारिक’ बता दिया. सुप्रीम कोर्ट की बार एसोसिएशन ने भी बाहें चढ़ा लीं और सीजेआइ लोढ़ा को भेजे गए खुले ज्ञापन में इसे अव्यावहारिक करार दिया.

आखिर सुप्रीम कोर्ट में इन ताकतवर लोगों का क्या होगा? हम उन बेहद अमीर भारतीयों की बात कर रहे हैं जो जून और अगस्त के बीच पुराने साम्राज्य की राजधानी लंदन चले जाते हैं. भारत के वकीलों में नामी हस्तियां उन अमीर लोगों में शामिल हैं जिन्हें हर गर्मियों में लंदन जाने की चाहत होती है.

वे जजों की बोलती बंद कर सकती हैं, मुश्किल में फंसे ऊंचे ओहदेदारों और ताकतवर लोगों को आसमान छूती फीस लेकर संकट से उबार सकती हैं. वे इस दौरान मेफेयर के आलीशान मकानों में बैठे अपने जैसे अमीर भारतीयों के बगलगीर होते हैं, हैरोड्स में लडूरी में ब्रंच करते हैं या द गैरिक में डिंरक्स लेते हैं या सेविल रॉ पर ड्रेक्स में टाई खरीदते हैं या न्यू बॉन्ड स्ट्रीट पर फ्राटेली से जूते खरीदने में वक्त गुजारते हैं. सीजेआइ ने उनके जैसे लोगों के बारे में भला कुछ सोचा है?

नहीं. अपना रुख नरम करने की बजाए सीजेआइ ने भारत की बार काउंसिल के अध्यक्ष से दूसरे राज्यों की बार काउंसिल के विचार जानने को कहा है. उन्होंने सभी हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को पत्र लिखकर उनकी राय मांगी है. सीजेआइ ने बदलाव का अपना खाका जनता के सामने भी रख दिया है. मीडिया के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि अगर सारे जज एक साथ छुट्टी लेने की बजाए साल में अलग-अलग समय पर अवकाश लें तो अदालतें 365 दिन खुली रह सकती है.

उन्होंने कहा, ''साल के शुरू में जजों को अदालत की सुनवाई का निर्धारण करने वाले डेस्क को सूचित करना होगा कि वे अवकाश कब लेना चाहते हैं.” उसके हिसाब से सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्ट की पीठों के लिए कैलेंडर बना लिया जाएगा, जिससे न्यायपालिका बिना किसी बाधा के काम करती रहेगी, ''ऐसा करना संभव है और मुझे उम्मीद है कि यह तरीका कारगर होगा.”

लेकिन सवाल यह है कि सीजेआइ खेल क्यों बिगाड़ रहे हैं? कोलकाता के वकील अहिन चौधरी कहते हैं, ''शायद इसलिए कि न्यायिक चोला पहनकर  वे आम आदमी की ओर से दखल देंगे.” मई और जून में अदालतों में छुट्टी का ऐलान होते ही जज और वकील एक साथ मौके का फायदा उठाने में जुट जाते हैं.

कुछ लोग आराम करते हैं, नई ताकत जुटाते हैं और सोच-विचार करते हैं, कुछ विदेशों में घूमने चले जाते हैं तो कुछ मुकदमों की तैयारी करते हैं. उन्होंने बताया कि 'जरूरी’ मुकदमों की सुनवाई के लिए एक अवकाशपीठ होने से न्याय देने का काम बहुत सुस्त हो जाता है.

चौधरी कहते हैं, ''आम आदमी के लिए जिंदगी थम-सी जाती है. उसे कानूनी राहत पाने के लिए कई हफ्ते इंतजार करना पड़ता है. देरी से न्याय मिलने का अर्थ न्याय से महरूम रहना है. बहुत कम जज उनकी तरह खुलकर बोलते हैं.” सीजेआइ ने मई 2013 में सीबीआइ के कामकाज में सरकारी दखल की पोल अपनी पैनी टिप्पणी से खोल दी थी, ''सीबीआइ पिंजरे में बंद तोते की तरह है.”

वे भारत में बकाया मुकदमों की लंबी फेहरिस्त को छोटा करने को बेताब हैं. 21 हाइकोर्ट में 30 लाख से ज्यादा, अधीनस्थ अदालतों में 2.63 करोड़ और सुप्रीम कोर्ट में 39,780 मुकदमे विचाराधीन हैं. देश की विभिन्न जेलों में 2.5 लाख विचाराधीन कैदी हैं.

एक जज एक दिन में औसतन कितने मुकदमे निबटाता है यह गौर करने लायक है. जस्टिस रवींद्र भट्ट समिति की 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में करीब 19,000 जज हैं और इस हिसाब से एक दीवानी मुकदमा खत्म होने में करीब 15 साल लगते हैं. 2013 में शुरू किए गए नेशनल कोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम (एनसीएमएस) के अनुसार, पिछले तीन दशक में जजों या अदालतों की संख्या छह गुना बढ़ी है, लेकिन मुकदमों की संख्या 12 गुना हो गई है.

साक्षरता और प्रति व्यक्ति आमदनी बढऩे के साथ प्रति 1,000 आबादी पर दायर नए मुकदमों की संख्या अगले तीन दशक में करीब 75 हो जाएगी जबकि वर्तमान दर प्रति 1,000 आबादी पर 15 मुकदमे हैं. इसके विपरीत चीन में आधुनिक तरीकों और टेक्नोलॉजी की मदद से मुकदमे तीन महीने के भीतर निबटा दिए जाते हैं और जजों की संख्या 1.90 लाख है.

न्यायविद के.टी.एस. तुलसी की राय में, ''हम सुपरसोनिक युग में न्यायपालिका को बैलगाड़ी की तकनीक से चलाने की कोशिश कर रहे हैं.” उन्होंने बताया कि हमारी न्यायप्रणाली में समन की तामील से लेकर जमानत तक हर काम हाथ से होता है. अदालती कामकाज में 50 फीसदी देरी समन तामील न होने, समन की वैधता, सही पहचान और ऐसी मामूली बातों पर बहस की वजह से होती है.

वे कहते हैं, ''2जी स्पेक्ट्रम आवंटन जैसे बहुचर्चित मुकदमे में भी आरोपियों से अदालत तक और अदालत से आरोपियों तक बोरे भर-भरकर कागजात लाए ले जाए गए.” अदालतों में मुकदमों की भीड़ की वजह छुट्टियां नहीं, कामकाज का पुराना ढर्रा है.

लेकिन जाने-माने वकील राम जेठमलानी का तर्क है, ''जजों को भी आराम चाहिए.” भारत में सुप्रीम कोर्ट साल में 193 दिन, हाइकोर्ट 210 दिन और निचली अदालतें 245 दिन काम करती है. अमेरिका में भी फ्रांस की तरह अदालतें गर्मी की छुट्टी में कभी बंद नहीं होतीं.

कनाडा की सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ 11 दिन की छुट्टी होती है जबकि ब्रिटेन में अदालत साल में 24 दिन बंद रहती है. जेठमलानी कहते हैं, ''लेकिन हमारे ऊंची अदालतों के जजों पर काम का दबाव बहुत ज्यादा है. दो से तीन जजों की पीठ हर दिन 50 से 70 मुकदमे सुनती है. हर शाम उन्हें अगले दिन के लिए मोटी-मोटी फाइलें पढऩी होती हैं और फैसले लिखने होते हैं. यह काम खुली अदालतों में नहीं हो सकता.”

जेठमलानी का कहना है कि भारत में छुट्टी कम करने से ज्यादा जरूरत बड़ी तादाद में जज भर्ती करने और राज्यों में सभी खाली पद भरने की है. अदालतों में सबसे ज्यादा लंबित मुकदमे उत्तर प्रदेश में हैं और वहां जजों के पद भी सबसे ज्यादा संख्या में खाली हैं. सबसे बड़े इलाहाबाद हाइकोर्ट में सर्वाधिक 10 लाख मुकदमे विचाराधीन हैं. फिर भी वहां सिर्फ 90 जज हैं और 70 पद खाली हैं.

देश के 21 हाइकोर्ट में जजों के 906 स्वीकृत पदों में से 300 खाली हैं. जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में 3,300 से अधिक पद खाली हैं. वे कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट ने अगले पांच साल में जजों की कुल संख्या 30,000 करने का लक्ष्य बनाया है. जजों को 365 दिन अदालत में बैठाने की बजाए यह कहीं ज्यादा तर्कपूर्ण और उचित सोच है.”

सवाल वही है कि क्या सभी अदालतें 365 दिन जागती रहें या जजों या वकीलों को गर्मी की लंबी छुट्टियों में अपने हिसाब से जीने की छूट दी जाए? जाहिर है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कानूनी तंत्र के काम करने के तरीके से जुड़ी दुखती रग पर उंगली रख दी है. लेकिन इसका अर्थ न्यायिक तंत्र की बारीकियों पर गौर करना भी है:

बेहद जटिल और उलझे हुए मुकदमों और दलीलों में लंबी गर्म दोपहरों को खर्च करना. मुनाफा न कमाने वाले संगठन प्रकाश इंडिया के अध्यक्ष एस.पी. मनचंदा ने जुलाई, 2013 में जनहित याचिका के जरिए दिल्ली हाइकोर्ट से सवाल किया था कि अदालत की छुट्टियां अब भी क्यों जारी है, ''अब हमारे पास एयरकंडिशंड और ऐसी आधुनिक टेक्नोलॉजी मौजूद है जिससे असहनीय गर्मी में काम करना आसान हो गया है?” इस पर न्यायालय की पीठ ने सामूहिक रूप से पलटवार किया,''आप हमारी छुट्टियों के पीछे क्यों पड़े हैं?”

एक जाने-माने जज ने कभी कहा था कि न्याय करना, ''सौभाग्य, सुख और कर्तव्य है.” अगर इस अनमोल त्रिमूर्ति में से पहली दो को निकाल दिया जाए तो क्या फिर भी न्याय का पहिया घूम सकता है.

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