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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ-मोर्चे पर परिवार

चुनाव करीब आते ही आरएसएस ने अपने युवा संगठन एबीवीपी और दूसरे आनुषंगिक संगठनों को अपनी बेहद मजबूत चुनावी मशीन को सक्रिय करने में लगाया.

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उदय माहूरकरनई दिल्ली, 20 March 2019
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ-मोर्चे पर परिवार आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और शाह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े कुछ छात्र दिल्ली यूनिवर्सिटी (डीयू) की आट्र्स फैकल्टी के दो काउंटरों पर बैठते हैं. एक काउंटर फैकल्टी के बाहर मुख्य रास्ते पर है और दूसरा कुछ ही मीटर की दूरी पर एबीवीपी के कार्यालय में. उनका काम हैः 2019 के आम चुनाव से ठीक पहले नए मतदाताओं की पहचान करना, उनका नाम लिखना और उन्हें चुनाव के बारे में शिक्षित करना.

नए मतदाता, जिनकी उम्र आम तौर पर 18 से 20 वर्ष होती है, फॉर्म भरने के लिए वहां पहुंचते हैं. दफ्तर की दीवारों पर हाथ से लिखे पोस्टर लगे हुए हैं, उन्हें एबीवीपी का साहित्य थमा दिया जाता है. उनमें से एक कहता है, ''मजबूत नेतृत्व के लिए वोट करो, बेहतर भारत के लिए वोट करो.'' दूसरा सर्जिकल स्ट्राइक पर बनी फिल्म के संवाद का सहारा लेते हुए कहता है, ''हाउ इज द जोश, गो ऐंड वोट सर.'' सभी पोस्टरों में एक बात समान है.

उनमें साफ-साफ नहीं कहा गया है कि 'मोदी को वोट दो' या 'भजपा को वोट दो'. लेकिन उनमें प्रधानमंत्री की कुछ पंच लाइन का उल्लेख होता है. एक पोस्टर में सीधा लिखा हैः ''पुलवामा का बदला चाहते हो, नए भारत के लिए वोट करो.'' जबकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दे रखा है कि चुनाव के लिए सेना का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. लेकिन यहां स्पष्ट रूप से संघ परिवार की शैली में प्रचार किया जा रहा है. एबीवीपी के एक स्थानीय नेता सिद्धार्थ शर्मा कहते हैं, ''हम कभी नाम नहीं लेते, केवल मुद्दों के बारे में बात करते हैं.''

राजनीति शास्त्र की छात्रा और एबीवीपी की कार्यकर्ता प्रिया शर्मा कहती हैं, ''यहां आने वाले ज्यादातर छात्र विभिन्न मुद्दों पर हमारे विचारों से प्रभावित होकर वापस जाते हैं.'' 19 वर्षीया छात्रा सपना सांखला पहली बार वोटर बनी हैं. उनके पिता की किराने की दुकान है. वे एबीवीपी की बातों से काफी प्रभावित हैं. वे कहती हैं, ''मैं भाजपा को वोट दूंगी. प्रधानमंत्री मोदी ईमानदार और समझदार व्यक्ति हैं. उन्होंने सरकार के कामकाज में पारदर्शिता दिखाई है.'' श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में बी.कॉम के तृतीय वर्ष के छात्र शुभम गोयल भी पहली बार वोटर बने हैं. वे कहते हैं, ''ज्यादातर मुद्दों पर विपक्ष बेवजह मोदी की आलोचना करता है. मसलन, वे महिला सशक्तीकरण और महिला सुरक्षा की बात करते हैं, लेकिन वास्तव में एनडीए ने ही इस क्षेत्र में काम किया है. तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाने से लेकर बच्चियों के बलात्कार पर फांसी की सजा देने का प्रावधान किया है.''

राष्ट्र-विरोधी बहस

आरएसएस का मानना है कि कुछ घटनाओं जैसे 2016 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का विवाद, जिसके बाद छात्र संघ के कुछ नेताओं के खिलाफ देशद्रोह के आरोप लगाए गए थे, 2017 में देश के उत्तरी हिस्से में दलितों की नाराजगी और भीमा कोरेगांव (महाराष्ट्र) की घटना, ने देश में गहरी खाई पैदा कर दी है. उसे लगता है कि ''मुसलमान मतदाताओं पर निर्भर रहने वाली कई राजनैतिक पार्टियों के अस्पष्ट या ढुलमुल रवैए'' ने 2019 के लोकसभा चुनाव को संघ और संघ विरोधी ताकतों के बीच की लड़ाई में तब्दील कर दिया है.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ग्वालियर में 8, 9 और 10 मार्च को आरएसएस की तीन दिवसीय वार्षिक प्रतिनिधि सभा में हिस्सा लिया था, जहां उन्होंने संघ के नेताओं के साथ दो दिन गुप्त बैठक की. भाजपा को चुनाव जिताने के लिए आरएसएस अपने सभी संगठनों को मदद के लिए मैदान में उतारने की योजना बना रहा है. संघ परिवार की इन शाखाओं में वनवासी कल्याण आश्रम (आरएसएस का आदिवासी संगठन), भारतीय किसान संघ (बीकेएस), भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस), विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी), राष्ट्रीय सेवा भारती (समाजसेवी संगठन) और 30 अन्य छोटे-छोटे समूह शामिल हैं. इन सभी को मिला दें तो इनके सदस्यों की कुल संख्या करीब 3 से 4 करोड़ है जो भाजपा की चुनावी मशीन को बेहद ताकतवर बना देती है.

आरएसएस की राष्ट्रीय स्तर की एक बेहद अहम उसकी प्रचार शाखा के प्रमुख अरुण कुमार कहते हैं, ''यह पार्टियों के बीच की लड़ाई नहीं है, बल्कि दो विचारधाराओं के बीच की लड़ाई है. एक तरफ राष्ट्रवादी विचारधारा रखने वाली ताकतें हैं तो दूसरी तरफ विदेशी सोच से संचालित होने वाली ताकतें.'' संघ परिवार के नेताओं को भी लगता है कि अपना अधूरा एजेंडा पूरा करने के लिए यह जरूरी है कि भाजपा सत्ता में वापस आए. भाजपा के लिए अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी और शाह के संबंध आरएसएस और उसके अन्य आनुषंगिक संगठनों के साथ बहुत अच्छे बने हुए हैं.

एनडीए-1 के समय अटल बिहारी वाजपेयी और संघ के आला नेताओं के बीच इतने अच्छे संबंध कभी नहीं रह पाए थे. जिस कदम ने मोदी को संघ का प्रिय बना दिया है, वह है मुस्लिम और ईसाई गैर-सरकारी संगठनों को विदेशों से मिलने वाली आर्थिक मदद को रोकने के लिए फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन ऐक्ट (एफसीआरए) को सख्ती से लागू करना (ऐसे करीब 11,000 संगठनों के लाइसेंसों का नवीनीकरण नहीं हो सका है). इस कदम को बड़ी चालाकी से धर्मनिरपेक्ष रंग देने के लिए कुछ हिंदू संगठनों पर भी इस तरह का प्रतिबंध लगा दिया गया है.

चुनाव अभियान

संघ परिवार ने अब तक चुनाव प्रचार की एक अलग रणनीति अपनाई है. वह मोदी या शाह का नाम खुले तौर पर नहीं लेता, इसकी बजाय उसके कार्यकर्ता वोटरों के पास चार सवाल लेकर गए—कांग्रेस के 60 साल के शासन में हमने क्या पाया है? अल्पसंख्यकों का वोट पाने के लिए विपक्ष धर्म के आधार पर भेदभाव क्यों करता है? वे अयोध्या में राम मंदिर क्यों नहीं बनने दे रहे?

हमारी सीमाओं को सुरक्षित बनाने के लिए कौन-सी पार्टी ज्यादा सक्षम है? जाहिर है, ये सवाल निरपेक्ष वोटरों को लक्ष्य करके बनाए गए हैं. इस बीच संघ का अपना अनौपचारिक नेटवर्क जनता के बीच जाकर अपना काम जारी रखता है.

यह देश में 11 मंडल प्रचारकों और 42 प्रांत प्रचारकों (संघ ने भारत के सभी राज्यों को 42 प्रांतों में विभाजित कर रखा है) के जरिए सरसंघचालक से शुरू होता है और जमीनी स्तर तक जाता है.

प्रचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह होता है कि नोटा (अमान्य वोट) वोटों की संख्या को कम किया जाए क्योंकि एक अंदरूनी विश्लेषण में पाया गया कि मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में हार का एक बड़ा कारण नोटा के वोट थे.

ऐसा लगता है कि भाजपा के सवर्ण वोटरों ने नोटा का प्रयोग किया था, क्योंकि दलित दंगों के बाद भाजपा की 'अस्पष्ट प्रतिक्रिया' के कारण वे अपना विरोध जाहिर करना चाहते थे, खासकर जिस तरह से पिछड़ों को लुभाने के लिए दलित-उत्पीडऩ विरोधी कानून को सख्त बनाया गया था, उससे सवर्णों में नाराजगी थी.

संघ परिवार नोटा के मुद्दे को काफी गंभीरता से ले रहा है. उसे डर है कि वामपंथी रुझान वाले एनजीओ ने मोदी विरोधी प्रचार शुरू कर दिया है जिसमें वे लोगों से विपक्ष को वोट देने के लिए नहीं बल्कि नोटा को वोट देने के लिए कहते हैं, क्योंकि मोदी सरकार ने अपने वादों को पूरा नहीं किया है.

दिल्ली एबीवीपी के महासचिव सिद्धार्थ यादव 'शहरी नक्सलियों' को जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं कि वाममोर्चा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अपने गढ़ में वर्षों से इसी रणनीति का इस्तेमाल कर रहा है.

सबूत के तौर पर वे बताते हैं कि किस तरह नोटा के वोटों की संख्या कांग्रेस के छात्र संगठन नेशनल स्टुडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआइ) को मिले वोटों से ज्यादा थी. वे कहते हैं कि एबीवीपी 'मजबूत भारत के निर्माण' का संदेश लोगों तक पहुंचाने के लिए नुक्कड़ नाटक आयोजित कर रहा है.

इस चुनाव में भाजपा को जिताने के लिए आरएसएस की चुनावी रणनीति में एबीवीपी की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहने वाली है. माना जाता है कि यह छात्र संगठन देश भर के 10,000 कॉलेजों में सक्रिय है और इसके करीब 4,00,000 सक्रिय सदस्य हैं. एबीवीपी के राष्ट्रीय संगठन सचिव सुनील अंबेकर गर्व के साथ कहते हैं, ''जब भारत की युवा राजनीति में लोगों की सोच को बदलने की बात आती है तो हम एक बड़ी ताकत के रूप में सामने आते हैं.''

भाजपा किसी भी तरह आरएसएस की मदद को हल्के में नहीं ले सकती. अरुण कुमार कहते हैं, ''काडर अनुयायियों की फौज नहीं है बल्कि समर्पित नागरिकों का मिश्रण है. हमारा प्रयास है कि लोग राष्ट्रहित में 100 प्रतिशत वोट करें.'' संघ के सूत्र लालकृष्ण आडवाणी का उदाहरण देते हैं जो 2009 के लोकसभा चुनाव प्रचार का मुख्य चेहरा थे, पर मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ करने के बाद काडरों से दूर हो गए थे.

आरएसएस के समाजसेवी संगठन सेवा भारती, देश भर में जिसकी 1,60,000 परियोजनाएं चल रही हैं, के सूत्रों का कहना है कि यह संगठन भी भाजपा को जिताने के लिए जुट गया है. संघ से जुड़े अन्य संगठनों जैसे बीकेएस और बीएमएस भी किसान और मजदूर नीतियों पर मोदी से मतभेदों के बावजूद पार्टी की सहायता करने के लिए तैयार हैं.

इनमें से एक संगठन का नेतृत्व करने वाले एक नेता जो आरएसएस के आदमी हैं, कहते हैं, ''मोदी के लिए सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी छवि बेदाग है. इसलिए राम मंदिर जैसे मुद्दे गौण हो जाते हैं. उन्होंने हमें समझा दिया है कि इस समय कानून बनाकर मंदिर निर्माण करने से नतीजा उलटा पड़ सकता है.'' यह अलग मामला है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को मध्यस्थों पर छोड़ दिया है. साफ है कि भगवा सेना मोदी और भाजपा को दोबारा केंद्र की सत्ता में लाने के लिए कमर कस चुकी है.

—उदय माहूरकर

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