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जगन्नाथ मंदिरः जनता जनार्दन ने सुलझा दिया विवाद

भक्तों को भगवान के स्पर्श की अनुमति नहीं तो फिर शंकराचार्य को क्यों? यात्रा शुरू होने से पहले सारी बहस धरी की धरी रह गई.

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aajtak.in
महेश शर्मा कटक, 12 July 2016
जगन्नाथ मंदिरः जनता जनार्दन ने सुलझा दिया विवाद

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा शुरू होने से पहले ही इस बार इस धार्मिक अनुष्ठान पर विवादों के छींटे पडऩे लगे हैं. ताजा विवाद भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलभद्र के विग्रहों के स्पर्श को लेकर है. सनातन परंपरा के मुताबिक, पुरी की गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जगन्नाथ भगवान, देवी सुभद्रा और भाई बलभद्र के रथों की व्यवस्था रथ पर जाकर देखते हैं. उनकी पूजा-अर्चना के बाद रथ यात्रा शुरू होती है. पुरी के राजा गजपति महाराज दिव्य सिंहदेव भगवान के प्रथम सेवक होने के नाते अपने महल से पालकी पर आते हैं और रथ पर चंवर लेकर सिंहासन के नीचे चरण के पास सफाई करते हैं. पर मौजूदा विवाद के बाद अब दइतापतियों ने शंकराचार्य के भी रथ पर चढ़कर पूजा करने पर रोक लगाने की ठान ली थी और मामला हाइकोर्ट में पहुंच गया था. प्रमुख दइतापति जगन्नाथ स्वैन का कहना था, ''शंकराचार्य नियम-कानून से ऊपर नहीं हैं.'' इस पर हाइकोर्ट ने शंकराचार्य को नोटिस देकर पूछा कि किन शास्त्रों में रथ पर शंकराचार्य के जाने की बात लिखी है?

रथों का निर्माण अक्षय तृतीया से शुरू कर छह हफ्ते में पूरा कर लिया जाता है. रथ यात्रा के ठीक 15 दिन पहले स्नान पूर्णिमा आयोजित की जाती है जिसमें भगवान जगन्नाथ को स्नान कराया जाता है. पुरानी परंपरा के अनुसार रथयात्रा का सारा इंतजाम दइतापतियों के हाथ में होता है. भगवान जगन्नाथ के कुल 36 श्रेणी के सेवायत हैं, जिनमें एक दइतापति भी होते हैं. इनका काम रथयात्रा तक ही होता है. महाप्रभु, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रह को बाहर लाकर स्नान कराने से लेकर रथ यात्रा के दौरान के सारे धार्मिक अनुष्ठान दइतापतियों की देख-रेख में ही होते हैं. बहुधा इनकी मनमानी पर कोई रोक-टोक नहीं होती. यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि दइतापति कमाई के चक्कर में भक्तों को विग्रह स्पर्श करने देते हैं. इस बार स्नान पूर्णिमा वाले रोज इन्हीं लोगों ने विग्रह स्पर्श की अनुमति देकर माहौल बिगाड़ दिया था. विग्रहों को स्पर्श को लेकर भक्तजनों में भगदड़ मच गई और एक महिला की जान चली गई थी. स्पर्श से विग्रह भी कुरूप होते गए. इस घटना के बाद रथ यात्रा की तैयारी संबंधी बैठक मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की अध्यक्षता में हुई, जिसमें साफ कहा गया कि अबकी रथ पर चढऩे की अनुमति किसी को नहीं मिलेगी.

गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने ही भक्तों को रथयात्रा पर चढऩे की अनुमति न देने की सलाह दी थी. उनके मुताबिक, आम भक्तों का विग्रह स्पर्श शास्त्र सम्मत नहीं है. मंदिर के मुक्ति मंडप (पंडितों का समूह) के महामंत्री भगवान महापात्र कहते हैं, ''शंकराचार्य का कथन सही है, विग्रह स्पर्श के लिए शास्त्र अनुमति नहीं देते.'' दूसरी ओर, शंकराचार्य की इस व्यवस्था को चुनौती देने कुछ भक्तजन कोर्ट चले गए. उनका कहना है कि शंकराचार्य को किस स्थिति में रथ पर चढऩे की अनुमति मिलेगी? वहीं प्रमुख दइतापति जगन्नाथ स्वैन उर्फ जगुनि ने इंडिया टुडे को बताया कि रथ पर चढ़कर पूजा और विग्रह स्पर्श भक्तों का अधिकार है. जगुनि का कहना है ''शंकराचार्य कानून से ऊपर नहीं हैं और उन्हें भी रथ पर नहीं आने दिया जाएगा.'' 

भगवान जगन्नाथ की नौ दिन चलने वाली यात्रा 6 जुलाई को जबरदस्त उमस और सुरक्षा व्यवस्था के बीच तय समय से आधे घंटे देर से शुरू हुई. इससे पहले शंकराचार्य ने परंपरा के मुताबिक रथों पर पूजा-अर्चना की और बाद में नौ लाख श्रद्धालुओं की भीड़ में से कई ने भगवान के दर्शन किए. शंकराचार्य और दइतापति के विवाद को जनता जनार्दन ने खुद सुलझा लिया.

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