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केंद्र और आरबीआइ के बीच तनातनी के आसार

रिजर्व बैंक के फरवरी, 2018 के सर्कुलर में पारंपरिक पुनर्गठन योजनाओं को खत्म कर दिया गया. और उसने यह नया नियम तय कर दिया कि अगर कोई कंपनी एक दिन की भी चूक पुनर्भुगतान में कर देती है तो उसे डिफॉल्टर मान लिया जाए.

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श्वेता पुंजनई दिल्ली, 04 September 2018
केंद्र और आरबीआइ के बीच तनातनी के आसार नॉर्थ ब्लॉक—रिजर्व बैंक

जब जून में तत्कालीन कार्यवाहक केंद्रीय वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने मुंबई स्थित महाराष्ट्र सरकार के गेस्ट हाउस में अर्थशास्त्रियों और बाजार के बड़े व्यापारियों से अर्थव्यवस्था को 10 फीसदी की विकास दर के स्तर तक लाने पर बात की थी, तो उन्होंने शुरुआत में ही एक शर्त रख दी थी—कोई भी सुझाव दिया जा सकता है बशर्ते उसका भारतीय रिजर्व बैंक से कोई लेना-देना न हो.

जब बढ़ती ब्याज दरों का मसला उठा तो उन्होंने फिर कहा कि इस तरह की चिंताओं पर रिजर्व बैंक से बात की जानी चाहिए. बैठक में शामिल बाकी लोगों के लिए यह नई बात थी और यह रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय में तनावपूर्ण रिश्तों का संकेत था.

अब स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक और संघ विचारक एस. गुरुमूर्ति को रिजर्व बैंक के बोर्ड में शामिल किए जाने के ताजा कदम को सरकार की तरफ से केंद्रीय बैंक को अहम आर्थिक मुद्दों पर सरकारी धारणा के अनुकूल लेकर आने की हताशा भरी कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, खास तौर पर मझोले और छोटे उपक्रमों (एमएसएमई) को ऋण की उपलब्धता के मामले में.

विशेषज्ञ इस बात को लेकर चिंतित हैं कि एक ऐसे समय में जब भारत समेत समूची दुनिया व्यापार पाबंदियों, अत्यधिक संरक्षणवादी कदमों और बढ़ती तेल कीमतों से पैदा हो रहे आर्थिक तूफानों का सामना कर रही है, वहीं भारत के दोनों शीर्ष संस्थान तालमेल नहीं बना पा रहे हैं.

खास तौर पर पिछले तीन साल में रिजर्व बैंक के सामने कई अनूठी किस्म की चुनौतियां पेश आई हैं—बैंकों के डूबत कर्जों के तेजी से बढऩे के साथ-साथ नोटबंदी तक. बैंक के तमाम फैसलों पर उसके मंत्रालय के साथ मतभेद खड़े हो गए हैं. हाल के दिनों में रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय कई मामलों पर एक-दूसरे के साथ वाद-विवाद में उलझते नजर आए हैं.

इनमें केंद्रीय बैंक को ज्यादा अधिकार, खराब ऋणों से निबटने के लिए मानक, ब्याज दरें और रिजर्व का हस्तांतरण आदि शामिल हैं. भारत के केंद्रीय बैंक के लिए और भी खराब बात यह है कि 1990 के बाद से पहली बार बैंक के गवर्नर और डिप्टी गवर्नर के पद पर एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे वित्त मंत्रालय के साथ काम करने का कोई खास अनुभव हो.

विडंबना है कि इन पदों पर नियुक्तियां सरकार ही करती है. लिहाजा वित्त मंत्रालय के ठिकाने—नॉर्थ ब्लॉक—और रिजर्व बैंक के संवाद में दरार अब सार्वजनिक हो चुकी है.

कठिन समाधान

सबसे हालिया और विवादित मुद्दा फरवरी में रिजर्व बैंक की ओर से जारी परिपत्र का है जिसमें डूबत कर्जों के पुनर्गठन की सारी योजनाओं को रद्द करके बनाए गए नए मानकों के तहत यह निर्दिष्ट किया गया था कि अगर किसी कर्ज के पुनर्भुगतान में एक दिन की भी देरी होती है तो कर्जदाता को उसे गैर-निष्पादित ऋण के रूप में मान लेना चाहिए.

इसमें यह प्रावधान भी निर्धारित कर दिया गया कि पुनर्भुगतान में चूक के 180 दिन के भीतर बैंकों को इस स्थिति के समाधान की योजना बना लेनी चाहिए, जिसमें नाकाम रहने के बाद कर्जदार को दिवालिया अदालतों के हवाले कर दिया जाना चाहिए.

अब यह डर व्यापक तौर पर कायम हो गया है कि इस कदम से उन कंपनियों का भी गला घोंट दिया जाएगा जो ऋण पुनर्गठन की प्रक्रिया के जरिए मुश्किलों से बाहर आना चाहती हैं.

केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी का कहना था कि पुनर्भुगतान में चूक करने वाले हर उद्यमी के खिलाफ कार्रवाई करने से आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और उद्यमी हतोत्साहित होंगे.

बैंकरों ने सरकार के पास जाकर इस बात के लिए लामबंदी शुरू कर दी कि बेहद सक्चत इनसॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (आइबीसी) पर ही पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय उन्हें कोई राहत या खराब ऋणों से निबटने का नया तरीका दिखाया जाए.

दरअसल, सरकारी बैंकों की सबसे बड़ी यूनियन ने तो बाकायदा दिल्ली हाइकोर्ट में एक याचिका दायर करके दिवालिया प्रक्रियाओं के बारे में रिजर्व बैंक के परिपत्र को चुनौती तक दे डाली.

सार्वजनिक क्षेत्र के 3,00,000 बैंक कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाली ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कनफेडरेशन का कहना था कि इस प्रावधान से तकरीबन एक लाख करोड़ रुपए का नुक्सान होगा और इससे बैंकों की वैधता ही खतरे में पड़ जाएगी.

द इंडिपेंडेंट पॉवर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने भी उक्त सर्कुलर को संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन करने वाला बताते हुए उसे चुनौती दी.

बिजली उत्पादकों का कहना था कि उक्त सर्कुलर विभिन्न उद्योग क्षेत्रों में दवाब वाली परिसंपत्तियों के अलग-अलग स्वरूपों में फर्क करने में नाकाम रहा है. इलाहाबाद हाइकोर्ट ने 27 अगस्त को निजी बिजली कंपनियों को रिजर्व बैंक के सर्कुलर से कोई राहत देने से इनकार कर दिया.

अब यह मसला सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में 4 सितंबर को आएगा. हालांकि रिजर्व बैंक के समर्थकों का कहना है कि उक्त सर्कुलर तो दरअसल आइबीसी का ही पूरक है. वे यह भी कहते हैं कि रिजर्व बैंक भी एमएसएमई पर पडऩे वाले प्रभाव से वाकिफ है और इसीलिए उसने छोटी कंपनियों के लिए गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के वर्गीकरण के मानकों को सरल किया है. जीएसटी और गैर-जीएसटी एमएसएमई के लिए 31 दिसंबर, 2018 तक के बकायों के लिए एनपीए माने जाने की अवधि को 180 दिन तक के लिए बढ़ा दिया गया.

सशक्त विकल्प

जून में सरकार ने खराब ऋणों को केंद्रित करके सशक्त समाधान योजना की घोषणा की थी. इसमें 500 करोड़ रु. से ज्यादा की परिसंपत्तियों के लिए एक या ज्यादा संपदा प्रबंधन कंपनियों को खड़ा करने की बात थी जबकि 500 करोड़ रु. से कम मूल्य की दबाव वाली परिसंपत्तियों के मामले में समाधान में तेजी लाने के लिए अंतर-कर्जदाता समझौता फ्रेमवर्क खड़ा करने की बात थी.

इसी तरह 50 करोड़ रु. से कम के कर्ज के मामले में संबद्ध बैंक से दबाव को चिन्हित किए जाने के 90 दिन के भीतर समाधान की योजना तैयार करने की बात थी. इस घोषणा के कुछ ही दिन के भीतर कतिपय रूप से सुलह वाले अंदाज में रिजर्व बैंक ने बैंकों के दरम्यान कई सारे अंतर-ऋणदाता समझौतों को मंजूरी दे दी. इन समझौतों में अल्पमत कर्जदाताओं को इस बात के लिए बाध्य किया गया था कि अगर 66 फीसदी कर्जदाता राजी हो जाएं तो वे एक ऋण पुनर्गठन प्रस्ताव को क्रियान्वित करें.

हालांकि सरकार कर्जदारों को बकायेदार घोषित करके दिवालिया समाधान शुरू करने के लिए रिजर्व बैंक के सर्कुलर में निर्धारित 27 अगस्त की समयसीमा में चूक कर गई है. सरकार के भीतर कई लोग इस बात को मानते हैं कि फरवरी में जारी सर्कुलर के कई घातक नतीजे हो सकते थे.

सख्त मानकों के कारण ज्यादा बैंक त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई (पीसीए) के ढांचे के दायरे में आ जाएंगे. पहले ही 11 बैंक पीसीए ढांचे के अधीन हैं जो सरकारी स्वामित्व वाले सूचीबद्ध बैंकों के तकरीबन आधे हैं.

छह और बैंकों के इसमें शामिल किए जाने का खतरा है. इससे कुल उपलब्ध ऋण का 50 फीसदी तो पहुंच के ही बाहर हो जाएगा.

आलोचना यह हो रही है कि रिजर्व बैंक ने इस मामले में बड़ा मशीनी रवैया अख्तियार किया है. इससे वे कई व्यवसाय भी चूककर्ताओं के दायरे में रख दिए जा रहे हैं जो कमजोर व्यावसायिक चक्र की मुश्किलों से वाकई जूझ रहे हैं.

एक ऐसे समय में जब सरकार ऋण के बढऩे की दर और खर्च को बढ़ाना चाहती है, और पिछले दो साल में ज्यादातर निवेश सरकार की तरफ से रहे हैं, ऐसे में ऋण का संकुचन वाकई अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी हो सकता है. कॉर्पोरेट द्वारा लिया जाने वाला ऋण बहुत कम रहा है और वृद्धि वाले कई सारे क्षेत्र—टेलीकॉम, ऊर्जा आदि गहरे दबाव में हैं.

एचएसबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, बैंक पुनःप्रतिभूतीकरण में उल्लेखनीय वृद्धि के बावजूद ऋण गतिविधियों में निकट भविष्य में कोई सुधार होने की संभावना नहीं है.

ज्यादा बैंकों को पीसीए के दायरे में लाने का मतलब है ज्यादा चूककर्ताओं के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू किया जाना.

इससे पहले से ही संघर्ष कर रहा नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल और भी दबाव में आ जाएगा. एक बैंकर का कहना था, "एक-साल तक चूक करने वाले प्रवर्तकों को अपनी ही संपत्ति के लिए बोली लगाने से रोकने के राजनीतिक फैसले का असर मूल्य हासिल करने पर होना ही था क्योंकि बाकी बोली लगाने वाले (फंड और सामरिक खिलाड़ी) बड़ी बोली लगाने को तैयार नहीं थे.''

फिर रुख में थोड़ी नरमी लाते हुए सरकार ने फ्लैट मालिकों को पुनर्गठन या पुनरुद्धार में अपनी बात रखने का हक दे दिया और साथ ही एमएसएमई प्रवर्तकों को एक साल की चूक के नियम से छूट दे दी. यानी उन्हें अपनी ही परिसंपत्तियों की बोली लगाने की छूट दे दी गई.

हालांकि कई विशेषज्ञ हैं जो खराब ऋणों के लिए आरबीआइ के रास्ते का पक्ष लेते हैं. पिछले चार दशकों से आरबीआइ का अध्ययन करने वाले एक बैंकिंग विशेषज्ञ का कहना था, "यह एक तरह से कीमोथेरेपी से गुजरने जैसा है.

स्वाभाविक है कि कुछ बैंकर खुश नहीं हैं, लेकिन विश्लेषक तो हैं. बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा की घोषणा करने से लेकर खराब ऋणों के लिए मानकों को सख्त बनाने तक, कई कदम तो उठाए ही गए हैं. हालांकि भारत में बैंकिंग के लिहाज से इसे सबसे खराब दौर माना जा सकता है.

तकरीबन पचास फीसदी बैंकों ने ऋण देने बंद कर दिए हैं. पिछले तीन दशकों में ऐसा नहीं हुआ. निवेश आधारित किसी भी अर्थव्यवस्था को ऋण तो चाहिए ही होते हैं. हमें एक पूरी तरह से सक्रिय बैंकिंग क्षेत्र चाहिए.''

एक अन्य विवादित मुद्दा रिजर्व या लाभांश के हस्तांतरण का है. सरकार 2016-17 में रिजर्व बैंक के दिए गए लाभांश से नाखुश थी. रिजर्व बैंक ने अपने अधिशेष में से 30,659 करोड़ रु. सरकार को हस्तांतरित किए जो 2015-16 में हस्तांतरित किए गए 65,900 करोड़ रु. से आधे से भी कम थे.

आम तौर पर रिजर्व बैंक अपने मुनाफे का 90 फीसदी सरकार को हस्तांतरित कर देता है. पिछले गवर्नर रघुराम राजन इस सीमा को 99 फीसदी तक ले गए थे.

मौजूदा गवर्नर उर्जित पटेल ने हालांकि पिछले साल मुनाफे का 87 फीसदी ही हस्तांतरित किया. रिजर्व बैंक संचित कोष को फिर से खड़ा करने की जरूरत पर जोर दे रहा है और उस नीति की व्यवहार्यता का अध्ययन कर रहा है जिसमें उसे उसके मुनाफे का एक तयशुदा हिस्सा हस्तांतरित करने की जरूरत होती है.

बीते 8 अगस्त को रिजर्व बैंक ने जून 2018 में खत्म हुए साल के लिए सरकार को 50,000 करोड़ रु. के लाभांश का भुगतान किया. यह उससे पिछले के साल की तुलना में ज्यादा था और बजट अनुमानों के अनुरूप था.

ब्याज दरों पर विवाद

ब्याज दरें सरकार की तकलीफों का एक और बड़ा कारण हैं. एक धारणा यह है कि जब तेल की कीमतें कम थीं और मुद्रास्फीति की चिंता कुछ ज्यादा नहीं थी, उस समय रिजर्व बैंक को ज्यादा आक्रामक तरीके से ब्याज दरों को कम करना चाहिए था. लेकिन उसके बजाए उसने हिचक दिखाई. ब्याज दरें 2013 में 8 फीसदी से गिरकर 2017 में 6 फीसदी हो गई थीं.

मुद्रास्फीति की दर 2013 में दुहरे अंकों में थी जबकि नवंबर, 2016 से अक्तूबर, 2017 के बीच मुद्रास्फीति की दर 4 फीसदी से भी कम थी और खाद्य उत्पादों में मुद्रास्फीति की दर अप्रैल से दिसंबर 2017 के बीच औसतन 1 फीसदी चल रही थी. सरकार के भीतर धारणा है कि नोटबंदी के बाद के दौर में रिजर्व बैंक ब्याज दर में 50-75 बेसिस अंकों की कमी ला सकता था क्योंकि बैंकों के पास खासी तरलता थी और मुद्रास्फीति 4 फीसदी के आसपास चल रही थी.

मुंबई के आइडीएफसी इंस्टीट्यूट में राजनीतिक अर्थशास्त्र के सीनियर फैलो विवेक देहेजिया का कहना है, "सरकारों को कम ब्याज दरें पसंद आती हैं. रिजर्व बैंक का मकसद मुद्रास्फीति के लक्ष्य को कायम रखना होता है. इसलिए दोनों में एक स्वाभाविक टकराव होता है. ब्याज दरों को कम करने को लेकर हमेशा राजनीतिक दबाव रहेगा.''

इस समिति का गठन 2016 में किया गया था और यह ब्याज दरों के निर्धारण को ज्यादा समावेशी और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम था जो रिजर्व बैंक की स्वायत्तता में भी इजाफा करता है. समिति की अध्यक्षता रिजर्व बैंक के गर्वनर के पास है और इसमें छह सदस्य हैं—तीन रिजर्व बैंक की तरफ से और तीन सरकार की ओर से नामित. एमपीसीआइ से यह सुनिश्चित हो जाता है कि ब्याज दरों के लिए सिर्फ रिजर्व बैंक गवर्नर को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जाए.

पिछले साल जून में तब एक विवाद पैदा हो गया था जब वित्त मंत्रालय मौद्रिक नीति की समीक्षा से पहले एमपीसीआइ के सदस्यों से बैठक करने पर जोर दे रहा था. गवर्नर पटेल ने पारंपरिक मीडिया संवाद में बताया कि एमपीसीआइ के सभी सदस्यों ने इस अनुरोध को ठुकरा दिया. मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम का कहना था कि विकास दर में गिरावट और कम होती मुद्रास्फीति के चलते यह वांछनीय था कि मौद्रिक नीति को थोड़ा उदार बनाया जाए. फिर 1 अगस्त को रिजर्व बैंक ने तकरीबन पांच साल में पहली बार एक के बाद एक दो बार ब्याज दरों में वृद्धि की.

उसका मकसद मुद्रास्फीति को कम करना और वैश्विक व्यापार जंग के तेज होने के कारण रुपए को किसी गिरावट आने से बचाना था. एमपीसीआइ ने दरों को 25 बेसिस अंक बढ़ाकर 6.5 फीसदी करने के पक्ष में 5-1 से फैसला किया.

बला टालू रवैया

हालांकि पटेल को एनडीए सरकार ने ही नियुक्त किया था, लेकिन वित्त मंत्रालय से उनके रिश्तों की शुरुआत ही बड़ी गड़बड़ रही क्योंकि रिजर्व बैंक को नोटबंदी के बाद के असर से जूझना पड़ा. रिजर्व बैंक कई कदम उठाता रहा और फिर उन्हें पलटता रहा जिससे लोगों ने उसका नाम ही "रिवर्स बैंक ऑफ इंडिया'' रख दिया.

फिर जब इस साल पंजाब नेशनल बैंक में 11,300 करोड़ रुपए का घोटाला सामने आया तो वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसका दोष रिजर्व बैंक के मत्थे मढ़ दिया. जेटली ने 23 फरवरी को नई दिल्ली में कहा, "नियामक ही आखिरकार खेल के नियम तय करते हैं और इन नियामकों के पास तीसरी आंख होनी चाहिए जो उन्हें हमेशा खुली रखनी चाहिए. लेकिन दुर्भाग्य है कि भारतीय व्यवस्था में हम राजनीतिकों को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है और नियामकों को नहीं.''

पटेल ने इस आरोप का 14 मार्च को जवाब दिया. "दोष मढऩे का पुराना खेल चल रहा है. टोपी दूसरे के सिर रख दी जा रही है. ज्यादातर अल्पावधि और तात्कालिक प्रतिक्रिया देखने में आ रही है. इससे इस शोरशराबे में शामिल लोग गहराई में जाकर आत्मालोचन नहीं कर पा रहे हैं.''

असल में, रिजर्व बैंक जहां बैंक नियामक है, वहीं सरकार बैंक मालिक है. चीन के अलावा दुनिया में कहीं भी और ऐसी स्थिति नहीं है. सत्ता में अपने पहले चार साल में सरकार में तकरीबन एक साल तक कोई पूर्णकालिक वित्त मंत्री नहीं रहा. वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के बीच कोई अनौपचारिक संवाद तंत्र भी पूरी तरह से नदारद है.

यह रस्साकशी स्थिति को और खराब ही कर रही है. एक मैक्रो निवेशक सवाल करते हैं, "अगर रुपया गिरकर 72 रुपय प्रति डॉलर तक पहुंच जाए तो किसको बयान देना चाहिए? रिजर्व बैंक गवर्नर को, वित्त मंत्री को या प्रधानमंत्री को?'' जरूरी है कि यह भ्रम की स्थिति जल्द से जल्द दूर हो जाए, खास तौर पर जब अर्थव्यवस्था इतने चुनौतापूर्ण समय से गुजर रही है.

—साथ में आनंद अधिकारी

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