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वजूद पर संकट

दरअसल बिहार में जद(यू) या महाराष्ट्र में शिवसेना अपने दम पर निर्णायक नहीं हैं. ये दल तभी प्रभावी प्रदर्शन करते हैं, जब भाजपा के साथ होते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा से अलग होकर लडऩे पर नीतीश की पार्टी सिर्फ दो सीट जीत सकी थी.

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सुजीत ठाकुरनई दिल्ली, 09 July 2019
वजूद पर संकट बने रहने की चुनौतीः कोलकाता में एकत्र हुए देशभर के क्षेत्रीय दलों के नेता

अपने चार साथियों के साथ तेलुगुदेशम पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए राज्यसभा सदस्य सी.एम. रमेश ने दिल्ली के पार्टी मुख्यालय में पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में दिलचस्प टिप्पणी की, ''हर राज्य में दल का मतलब कमल.'' यह टिप्पणी भले ही हास्य-विनोद में की गई हो लेकिन इसमें राज्यों में प्रभावी स्थानीय या क्षेत्रीय दलों (चाहे वह राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा रखती हो) के सिकुड़ते आकार और जनाधार का संकेत है. तो क्या भाजपा अब 'कांग्रेस मुक्त भारत' के साथ 'क्षेत्रीय दल मुक्त भारत' की ओर बढ़ रही है?

पार्टी महासचिव अरुण सिंह कहते हैं, ''वह जमाना लद गया जब कोई भी दल धर्म, जाति और परिवार की दुहाई देकर वोट हासिल कर लेता था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने काम के दम पर यह नैरेटिव सेट किया है कि वोट सिर्फ वही हासिल कर सकता है जो जनकल्याण के लिए दिन-रात काम करता हो.

जमीन पर लोगों के बीच जाकर काम करता हो. भाजपा यह कर रही है इसलिए कोई भी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दल जो इस हकीकत को नहीं समझ रहा है, वह अपना जनाधार और आकार खोता जा रहा है.''

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने स्थानीय दलों पर अपने निशाने की पटकथा तो 2014 में ही लिख दी थी, जब भाजपा को अपने दम पर बहुमत हासिल हो गया था.

पार्टी के एक अन्य महासचिव कहते हैं, ''अमित शाह ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पहला फोकस उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा जैसे राज्यों में पार्टी को मजबूत करने पर रखा, जहां स्थानीय दल मजबूत स्थिति में थे.''

शायद इसके पीछे यह समझ रही हो कि पश्चिम, मध्य और उत्तर भारत के राज्यों के अलावा बाकी राज्यों में पार्टी का विस्तार तभी हो सकता है, जब क्षेत्रीय दलों का जनाधार और आकार घटे. इसकी पृष्ठभूमि खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश में 2014 में अच्छी-खासी जीत ने तैयार कर दी थी.

इसमें सबसे बड़ा मोर्चा उत्तर प्रदेश का ही था. शाह भाजपा अध्यक्ष बनने से पहले 2014 में उत्तर प्रदेश में पार्टी के प्रभारी महासचिव थे और उस दौरान 403 में से 401 विधानसभाई चुनाव क्षेत्रों में प्रवास कर चुके थे.

इसलिए 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान जब शाह यह दावा कर रहे थे कि उत्तर प्रदेश में भाजपा 2014 के 73 (अपना दल के साथ) से ज्यादा सीट जीतेगी, तो वह सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए ही नहीं था. वे पार्टी पदाधिकारियों को बताया करते थे कि वे यह दावा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि ''मैं उत्तर प्रदेश को समझ गया हूं. दूसरी पार्टियों के नेताओं (मुलायम सिंह के अलावा) में कोई ऐसा नहीं है जो पूरे प्रदेश को समझता है.''

शाह की गिनती में सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं था. उन्होंने अपने महासचिवों को उन राज्यों में पूरी तरह से झोंक दिया, जहां स्थानीय दल मजबूत स्थिति में रहे हैं. उन्होंने महासचिव अरुण सिंह को ओडिशा, कैलाश विजयवर्गीय को पश्चिम बंगाल, अनिल जैन को हरियाणा और झारखंड, भूपेंद्र यादव को बिहार और सरोज पांडे को महाराष्ट्र में बिना ब्रेक के तैनात रखा. शाह नियमित रूप से इन महासचिवों से राज्य में हुई हर गतिविधि का ब्यौरा लेते थे और जरूरत पडऩे पर इन राज्यों में खुद भी कैंप करते रहे.

भाजपा मीडिया विभाग के प्रमुख और राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी कहते हैं, ''बतौर पार्टी भाजपा हर राज्य में खुद को मजबूत कर रही है. सभी को यह हक है कि वह अपनी पार्टी का विस्तार करे. इसमें अब भाजपा की क्या गलती है कि ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस लगभग समाप्त हो चुकी है. कांग्रेस नहीं है तो उन राज्यों में जो दूसरे दल हैं उसके समर्थक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास की नीति को लेकर भाजपा की ओर रुख कर रहे हैं.''

क्या रणनीति अपनाई

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल अपने जातिगत समीकरण के दम पर मजबूत स्थिति में रहे हैं. चुनाव के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय भाजपा या कांग्रेस तीसरे और चौथे नंबर की पार्टी के तौर पर मुकाबले में रहती थीं. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव होने से पहले भाजपा ने सपा और बसपा दोनों के वोट बैंक में सेंध लगाने की चाक-चौबंद योजना बना ली. बसपा के गैर-जाटव और सपा के गैर-यादव वोट बैंक में सेंध लगाकर भाजपा ने इन दोनों पार्टियों को कमजोर कर दिया. ऊपर से मोदी लहर ने इन दोनों दलों को राज्य में लगभग पूरी तरह से किनारे लगा दिया. फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा इन दोनों दलों के वोट बैंक में और सेंध लगाने में सफल रही.

साथ ही उज्ज्वला जैसी लोकप्रिय योजना के दम पर भाजपा ने हर घर में खुद को चर्चा का मुद्दा बना दिया. स्थिति की नजाकत और भाजपा की आक्रमकता को देखते हुए सपा-बसपा-रालोद ने गठबंधन किया लेकिन यह प्रयोग सफल नहीं हुआ क्योंकि भाजपा यह संदेश देने में सफल हो गई कि यह चुनाव प्रधानमंत्री चुनने के लिए हो रहा है, सपा और बसपा के नेता पीएम बनने की रेस में नहीं हैं.

इसी तरह बिहार में 2015 के विधानसभा चुनाव में जद(यू), राजद और कांग्रेस साथ मिल कर लड़े और भाजपा को रोकने में सफल रहे. भाजपा के नेता यह मान रहे हैं कि बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी का अपना वोट बैंक भले न हो लेकिन नीतीश कुमार वहां एक ब्रांड हैं और वे राज्य में हुए विकास कार्यों के लिए जाने जाते हैं. ऐसे में नीतीश कुमार के साथ भाजपा ने बराबरी के साथ चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. राजद यहां बिना एक सीट जीते हाशिए पर चला गया. लेकिन नीतीश के बाद जद(यू) का ब्रांड एंबेसडर कौन है? बिहार भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''यहां एनडीए खुद ही अपना नेता चुन लेगा.''

दरअसल बिहार में जद(यू) या महाराष्ट्र में शिवसेना अपने दम पर निर्णायक नहीं हैं. ये दल तभी प्रभावी प्रदर्शन करते हैं, जब भाजपा के साथ होते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा से अलग होकर लडऩे पर नीतीश की पार्टी सिर्फ दो सीट जीत सकी थी. इसी तरह महाराष्ट्र में शिवसेना 2014 का विधानसभा चुनाव भाजपा से अलग होकर लड़ी और भाजपा यहां सबसे बड़ी पार्टी बन गई. तो क्या भाजपा के निशाने पर कहीं शिवसेना और जद(यू) भी तो नहीं हैं?

जद(यू) के एक नेता कहते हैं, ''बात सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं है. ये दोनों दल भाजपा के हाथों अपना काडर खो रहे हैं. शिवसेना और भाजपा के काडर में वैचारिक रूप से काफी समानता है. ऐसे में शिवसेना कमजोर होगी तो काडर खुद-ब-खुद भाजपा के पास चला जाएगा. जद(यू) के साथ भी यही है. भाजपा और जद(यू) दोनों ही बिहार में विकास के नाम पर राजनीति कर रहे हैं इसलिए जद(यू) और भाजपा कभी अलग हुई तो जद(यू) का काडर भाजपा की तरफ जाने की संभावना अधिक है क्योंकि राज्य में पार्टी का संगठन जद(यू) के संगठन से कहीं मजबूत स्थिति में है.''

लेकिन क्या पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दलों को आसानी से हिला देना भाजपा के बस में है? इन राज्यों में न तो भाजपा का संगठन मजबूत है, न ही वह तृणमूल या बीजेडी के काडर के माकूल है. राजनैतिक टीकाकार रजत राय कहते हैं, ''भाजपा बहुत ही सोच-समझ कर क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने की नीति पर चल रही है. पिछले तीन-चार साल में पश्चिम बंगाल में दर्जनों की तादाद में तृणमूल के बड़े और प्रभावी नेताओं को भाजपा अपने पाले में लाने में कामयाब रही.

ओडिशा में भी भले कम लेकिन वहां भी पार्टी वही कर रही है. आंध्र प्रदेश में राज्यसभा के 4 सांसदों को भाजपा अपने साथ ले गई. जहां भाजपा का संगठन कमजोर है वहां दूसरी पार्टियों के मजबूत लोगों को अपने पाले में करके भाजपा खुद को मजबूत बना रही है. लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे इसके गवाह हैं.'' राय कहते हैं, ममता जैसी नेता से मुकाबला करने के लिए भाजपा को जिस काडर की जरूरत है, उसे भी वह बने-बनाए मिल गया. वामपंथी पार्टियों का काडर हाल के चुनाव में ममता को हराने के लिए भाजपा की ओर चला गया.

आगे की सोच

भाजपा अगले पांच साल तक हर राज्य में सबसे प्रमुख दल बनने की योजना लेकर चल रही है. खासकर उन राज्यों में जहां स्थानीय दलों का दबदबा है. अमित शाह का 50 फीसदी वोट पाने का लक्ष्य इसी योजना के मुताबिक है. यह लक्ष्य कैसे हासिल होगा? भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता जी.वी.एल. नरसिंह राव कहते हैं, ''जिन नेताओं के दम पर क्षेत्रीय दल बने थे, वे अब उम्रदराज हो गए हैं या फिर सक्रिय नहीं हैं. लालू यादव मुलायम सिंह, शरद पवार, चंद्रबाबू नायडू, मायावती, केसीआर, एचडी देवेगौड़ा, शिबू सोरेन जैसे नेताओं के बाद इन दलों के पास दूसरा कोई नहीं है. इनके जो उत्तराधिकारी हैं या जिनके बनने की संभावना है, उसे बनी बनाई पार्टी अपने-आप मिल गई लेकिन उत्तराधिकारी में वह स्पार्क नहीं दिखता जो इन दलों के संस्थापकों में था.''

लेकिन क्या एक राष्ट्रीय दल (भाजपा) राज्यों में स्थानीय दल का विकल्प बन सकता है? क्षेत्रीय दलों का तानाबाना स्थानीय जरूरतों और मुद्दों पर आधारित होता है इसलिए उसका स्वरूप राष्ट्रीय दल से मेल नहीं खाता. मसलन, आंध्र प्रदेश की भाजपा इकाई राज्य के लिए विशेष दर्जे की मांग कर सकती है लेकिन केंद्रीय भाजपा के लिए यह करना कठिन होगा. बिहार के संदर्भ में भी यही बात है. बिहार भाजपा के उपाध्यक्ष देवेश कुमार कहते हैं, ''भाजपा में यह खासियत है कि वह राज्य और केंद्र दोनों के मुद्दों को एक समान ढंग से संभालती है. दरअसल भाजपा लोगों तक यह बात तर्कपूर्ण रूप से ले जाने में सफल रही है कि जायज और जरूरी मुद्दों पर पार्टी किसी भी राज्य के हितों की उपेक्षा नहीं होने देगी.''

असल में आंध्र प्रदेश में जब भाजपा टीडीपी की सहयोगी थी तो वह विशेष राज्य का दर्जा मांगती थी. लेकिन बकौल देवेश कुमार, ''भाजपा ने आर्थिक रूप से राज्य को उससे कहीं ज्यादा आर्थिक मदद की जितना विशेष राज्य का दर्जा हासिल करने के बाद भी राज्य के हिस्से में नहीं आता.'' इसलिए उनका तर्क है कि भाजपा उन राज्यों में भी उतनी ही लोकप्रिय सरकार चला रही है जहां पहले किसी स्थानीय दल का कब्जा माना जाता था.

बहरहाल, उत्तर प्रदेश, असम, त्रिपुरा और अब बंगाल में भी भाजपा को बड़ी सफलता मिल चुकी है. अगले विधानसभा चुनाव में मुकाबला भाजपा और तृणमूल में ही होना तय है. जिन राज्यों में अभी क्षेत्रीय दल सत्ता या विपक्ष में हैं, वहां आने वाले दिनों में भाजपा एक नए विकल्प के रूप में जगह बना रही है. क्षेत्रीय दलों के लिए वे दिन लद गए जब तीसरी पार्टी का विकल्प ही नहीं था. भाजपा ने इस खाली जगह को भर दिया है. स्थानीय दल नहीं चेते तो भाजपा 'कांग्रेस मुक्त भारत' से अब 'क्षेत्रीय दल मुक्त भारत' की ओर बढ़ चलेगी. ठ्ठ

जिन नेताओं के दम पर क्षेत्रीय दल बने थे, वे अब उम्रदराज हो चुके हैं और सक्रिय नहीं रह गए हैं. उनके उत्तराधिकारियों में वह दमखम नहीं है

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