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छोटे दलों की बड़ी चुनौती

हर राज्य में क्षेत्रीय और छोटी पार्टियों के एक मंच पर आने और कांग्रेस के साथ उनका प्रत्यक्ष या परोक्ष तालमेल आम चुनावों में भाजपा और मोदी के लिए परेशानी का सबब

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सुजीत ठाकुरनई दिल्ली, 15 January 2019
छोटे दलों की बड़ी चुनौती मोदी विरोधी मंचः कर्नाटक में एच.डी. कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान विपक्षी नेताओं का जम

उत्तर प्रदेश में अवैध खनन मामले में 5 जनवरी को सीबीआइ के छापों के पहले ही यह लगभग साफ हो गया था कि देश के इस सबसे बड़े सूबे में 2019 का लोकसभा चुनाव समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) साथ मिल कर लडेंग़ी. सो, सीबीआइ छापों की आंच जैसे ही सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की ओर उठती दिखी कि सपा-बसपा की गांठें कुछ और गहरी होने लगीं. आखिर 2012 से 2017 तक अखिलेश उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और 2012 से 2013 तक खनन विभाग भी उन्हीं के पास था. छापों के फौरन बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने न सिर्फ अखिलेश को फोन करके उनके साथ खड़े रहने का भरोसा दिलाया बल्कि पार्टी ने लिखित बयान जारी किया कि, ‘‘जैसे ही यह बात सामने आई कि सपा और बसपा के नेताओं की मुलाकात हुई है, भाजपा सरकार ने पुराने खनन केस में छापेमारी शुरू करवा दी. यह राजनैतिक षड्यंत्र है. भाजपा, बसपा के खिलाफ भी पहले यह हथकंडा अपना चुकी है.ʼʼ

सीबीआइ की यह कार्रवाई सियासी हो या न हो, 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा का एक साथ मिलकर चुनाव लडऩा भाजपा के लिए मुफीद तो नहीं है. भाजपा को सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि दूसरे सूबों में अपने गठबंधन एनडीए की खुलती गांठों और विरोध में पार्टियों के बीच मजबूत होती गांठों की काट तलाशनी है. उत्तर प्रदेश में बसपा, सपा और अजित सिंह के आरएलडी में तालमेल की खबरें हैं. बिहार में राजद, कांग्रेस, आरएलएसपी और ‘‘हमʼʼ का साझा मंच तैयार है. आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम और कांग्रेस का एका है. झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और झारखंड विकास पार्टी एकजुट हैं. महाराष्ट्र में राकांपा, कांग्रेस और शेतकरी स्वाभिमानी पक्ष एक साथ हैं. जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और कांग्रेस तो असम में एआइयूडीएफ, कांग्रेस, असम गण परिषद (अगप) और बीपीएफ का गठजोड़ बन रहा है. हरियाणा में आइएनएलडी, हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) और कांग्रेस साथ आ रहे हैं. तमिलनाडु में द्रमुक और कांग्रेस तथा कर्नाटक में जद (एस) और कांग्रेस एकजुट हैं. यानी राज्य-दर-राज्य 2019 के आम चुनाव के मद्देनजर भाजपा विरोधी गठजोड़ आकार लेने लगे हैं.

इन सियासी गठजोड़ों से भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परेशानी का सबब इस गणित से आसानी से समझा जा सकता है कि इन 10 राज्यों में लोकसभा की 304 सीटें हैं और इनमें भाजपा के बरअक्स मुख्य मोर्चे पर कांग्रेस नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दल हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इन राज्यों से कुल 165 सीटें जीती थीं. उस वक्त ये क्षेत्रीय दल कुछ अपवादों को छोड़कर अलग-अलग चुनाव में उतरे थे. इक्के-दुक्के मामलों में ही कांग्रेस के साथ किसी क्षेत्रीय दल का गठजोड़ था. लेकिन इस बार मामला उलटा है और परस्पर विरोधी क्षेत्रीय दल भी एकजुट होने लगे हैं.

मामला इतना ही नहीं है. क्षेत्रीय दलों के साथ स्थानीय स्तर पर पैठ रखने वाली छोटी-मोटी पार्टियां और सियासी समूह भी जुड़ रहे हैं. मसलन, बिहार में जीतनराम मांझी की पार्टी ‘‘हमʼʼ, महाराष्ट्र में राजू शेट्टी की पार्टी शेतकरी स्वाभिमानी पक्ष मोदी विरोधी गठजोड़ के साथ जुड़ चुकी हैं. असम में बोडोलैंड पीपल्स पार्टी या उत्तर प्रदेश की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी भी मोदी विरोधी गठजोड़ के साथ मिलने के कगार पर हैं. इन दलों के गठजोड़ से मुकाबिल होने के लिए भाजपा के पास न तो ‘‘कांग्रेस-मुक्त भारतʼʼ का नारा फिर उछालने का विकल्प बचा है, न ही प्रधानमंत्री मोदी के पास कांग्रेस के खिलाफ हमले करने का वैसा मौका है, जो 2014 में था.

मुश्किल इसलिए भी अधिक है क्योंकि भाजपा या एनडीए शासित राज्यों में क्षेत्रीय दलों के गठजोड़ में कुछ और दलों के जुडऩे की संभावना बनती जा रही है. बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, असम, महाराष्ट्र, हरियाणा ऐसे ही राज्य हैं. इन राज्यों से 2014 में भाजपा को लोकसभा में जबरदस्त सफलता प्राप्त हुई थी. अब इन्ही राज्यों में क्षेत्रीय दलों की तरफ से भाजपा को सबसे अधिक चुनौती मिलती दिख रही है. यह चुनौती इसलिए भी गंभीर है क्योंकि जिन राज्यों में भाजपा का मुकाबला सीधे कांग्रेस से होना है, उनमें अब भाजपा अपराजेय नहीं रह गई है. 2014 में गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, गोवा और उत्तराखंड की सभी 69 सीटें भाजपा जीत गई थी. इसके अलावा मध्य प्रदेश की 29 में से 27 और छत्तीसगढ़ की 11 में से 10 सीटें भाजपा की झोली में आई थीं. इन सभी राज्यों में भाजपा से कांग्रेस का सीधा मुकाबला है और इनमें कुल 127 संसदीय सीटों में से 2014 में कांग्रेस सिर्फ 3 सीट ही जीत सकी थी. इस बार इन सभी में कांग्रेस मजबूत टक्कर देने की स्थिति में दिख रही है. इसकी ताकीद छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान केहालिया विधानसभा चुनाव नतीजों से होती है. मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा का वोट शेयर लगभग बराबर हैं. छत्तीसगढ़ में तो काफी ज्यादा है.

क्षेत्रीय दलों की यह मजबूती अनायास नहीं है. 2014 के बाद जितने भी राज्यों में उपचुनाव हुए, वहां एकजुट विपक्ष के सामने भाजपा को हार का सामना करना पड़ा. हर लोकसभा उपचुनाव में भाजपा को सिर्फ हार ही मिली. विधानसभा उपचुनावों में इक्के- दुक्के नतीजों को छोड़ दें तो भाजपा कहीं जीत हासिल नहीं कर सकी. राजद प्रवक्ता और राज्यसभा सदस्य मनोज झा कहते हैं, ‘‘उपचुनावों के नतीजों ने क्षेत्रीय दलों को यह बता दिया कि भले उनकी (क्षेत्रीय दलों) मौजूदगी राष्ट्रीय स्तर पर न हो लेकिन स्थानीय स्तर पर मौजूद दलों के साथ गठजोड़ करके भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों को हराया जा सकता है.ʼʼ वे यह भी कहते हैं, ‘‘2019 के लिए क्षेत्रीय दलों की एकता दिन प्रति दिन मजबूत होती जा रही है क्योंकि मोदी सरकार के खिलाफ लोगों की नाराजगी बढ़ती जा रही है.ʼʼ

गठबंधन के दूसरे पहलू की ओर इशारा करते हुए स्वाभिमानी पक्ष के राजू शेट्टी कहते हैं, ‘‘2013 में जब मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने, भाजपा ने क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे लेकिन प्रभावी दलों को एनडीए में शामिल करना शुरू किया.ʼʼ तब स्वाभिमानी पक्ष, रामदास अठावले की आरपीआइ, हजकां, अपना दल, आरएलएसपी, तेलुगु देशम, डीएमडीके, अगप, बोडोलैंड पीपल्स पार्टी, एमडीएमके, आरएसपी (बोल्शेविक), हम जैसे तीन दर्जन से अधिक दल एनडीए के पाले में आ गए थे. इनमें कई दलों का भले ही कोई सांसद नहीं बन सका लेकिन जिन जगहों पर इन दलों का आधार है, वहां इनके वोट भाजपा को जीत दिलाने में मददगार साबित हुए.

लेकिन सरकार बनने के बाद भाजपा ने छोटे और स्थानीय दलों से तो किनारा करना शुरू किया ही, गठबंधन के बड़े दलों को भी तवज्जो नहीं दी. लिहाजा, एनडीए में बिखराव शुरू हो गया. यह भी आशंका बनी हुई है कि फिलहाल एनडीए में मौजूद सहयोगी भी साथ छोड़ सकते हैं. मसलन, महाराष्ट्र में शिवसेना या उत्तर प्रदेश में अपना दल. 2014 से लेकर अब तक 13 पार्टियां एनडीए का पाला छोड़ चुकी हैं. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘‘मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा इस मुगालते में है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर चलने में सक्षम नहीं है लेकिन हो रहा है उसके उलट. कांग्रेस का रुख लचीला है. कर्नाटक इसका उदाहरण है, जहां पार्टी ने जद (एस) को बिना शर्त समर्थन देने का फैसला किया.ʼʼ

क्षेत्रीय एकजुटता की वजह

11 दिसंबर, 2017 को राहुल गांधी जब कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो पार्टी की तरफ से फीलर देकर यह पता करने की कोशिश की गई कि राहुल के नेतृत्व में मोदी विरोधी दलों के एकजुट होने की कितनी संभावना है. कथित तौर पर तब कांग्रेस को नकारात्मक संकेत मिले. इसी बीच तीसरे मोर्चे (गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस) की पहल भी शुरू हुई. टीआरएस, तेलुगु देशम, तृणमूल कांग्रेस और बीजद जैसे अपने राज्य के प्रभावी दल मोदी के खिलाफ कैसे एकजुट हो सकते हैं, इसकी संभावनाओं की तलाश शुरू हुई. तेलुगु देशम नेता थोता नरसिंहन कहते हैं, ‘‘तीसरे मोर्चे में जिन दलों की बात हो रही है, वे अपने राज्य में खुद के दम पर भाजपा को रोकने का सामर्थ्य रखते हैं. मोर्चा बने या न बने, ये दल उतने ही प्रभावी रहेंगे, जितने अभी हैं.ʼʼ

सूत्रों के मुताबिक, यही सियासी एहसास क्षेत्रीय दलों की एकजुटता की राह प्रशस्त कर रहा है. आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में जहां क्षेत्रीय दल तेलुगु देशम, टीआरएस, तृणमूल और बीजद मजबूत हैं, वहां 2014 में भाजपा सिर्फ 5 सीट ही जीत सकी थी. 2019 में भाजपा ये पांच सीटें गंवा भी देती है तो उसकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला. कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला कहते हैं, ‘‘ऐसा नहीं है. आज देश का मूड मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को हराने का बन चुका है. सभी दल चाहे क्षेत्रीय हों या राष्ट्रीय, अपने प्रभाव वाले इलाके में भाजपा को हराएंगे. ज्यादातर राज्यों में मोदी विरोध क्षेत्रीय गठबंधनों में कांग्रेस शामिल है.

बात चाहे बिहार की हो या महाराष्ट्र या फिर तमिलनाडु या कर्नाटक की.ʼʼ कांग्रेस के एक नेता कहते हैं, ‘‘मोदी विरोध की हर संभावना को अवसर में बदलने के लिए कांग्रेस तैयार है. इसका उदाहरण कर्नाटक विधानसभा के चुनाव नतीजे हैं. यहां भाजपा को रोकने की संभावना दिखी और कांग्रेस ने उसे अवसर में बदला.ʼʼ वे बताते हैं कि एच.डी. कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में मोदी का विरोध करने वाली शायद ही कोई पार्टी बची, जो मौजूद नहीं थी. मतलब मोदी के खिलाफ सभी दल 2019 में एक साथ हैं.

हालांकि क्षेत्रीय दलों की इस एकजुट कोशिश को भाजपा बहुत गंभीरता से नहीं ले रही. पार्टी का मानना है कि लोकसभा का चुनाव राष्ट्रीय स्तर का होता है, उसमें स्थानीय मुद्दे और दल अधिक प्रभावी नहीं होते हैं. पार्टी के मुताबिक, लोकसभा का चुनाव प्रधानमंत्री चुनने के लिए होता है इसलिए वोटर यह देखेगा कि मोदी के सामने प्रधानमंत्री का विकल्प कौन है. क्षेत्रीय दल या कांग्रेस यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि मोदी का विकल्प कौन है. क्या ममता बनर्जी या नवीन पटनायक राहुल गांधी को प्रधानमंत्री मानेंगे? भाजपा के मीडिया विभाग के प्रमुख और राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी कहते हैं, ‘‘2014 में भी क्षेत्रीय दल मोदी और भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर लड़ रहे थे, कोई प्रत्यक्ष तो कोई परोक्ष रूप से. लेकिन, लोगों ने 30 साल के बाद पूर्ण बहुमत की सरकार चुनी और इस बार भी लोग पूर्ण बहुमत की सरकार चुनेंगे और भाजपा को 2014 से भी अधिक सीटें मिलेंगी.ʼʼ

भाजपा की बेचैनी

लेकिन जमीनी हकीकत से भाजपा में बेचैनी साफ दिख रही है. कांग्रेस उसके लिए नई चुनौती बन गई है. दिसंबर में जिन पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आए, उसने भाजपा की न सिर्फ नींद उड़ा दी बल्कि 2019 के लिए विपक्ष को एकजुट होने का मौका भी दे दिया. कांग्रेस भाजपा से तीन राज्य छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान छीनने में सफल रही. मिजोरम में भाजपा सफल नहीं हो सकी और तेलंगाना में सिर्फ 1 सीट ही जीत सकी, जो 2014 के चुनाव से 4 सीटें कम है. भाजपा को चिंता इसलिए है क्योंकि पार्टी लगातार यह कहती आ रही है कि 2019 में दक्षिणी राज्यों तथा पूर्वोत्तर में वह अच्छा प्रदर्शन करेगी.

लेकिन तेलंगाना और मिजोरम के नतीजों से साफ है कि उसके दावे सही नहीं बैठे. 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले असम में सहयोगी पार्टी अगप भाजपा को छोड़ कर चली गई है और भाजपा के लिहाज से दक्षिण के एकमात्र मजबूत राज्य कर्नाटक में जद (एस) और कांग्रेस एक साथ आ गए हैं. दक्षिण के दूसरे राज्य तमिलनाडु में भाजपा को उम्मीद है कि वह परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से अन्नाद्रमुक के साथ मिलकर कुछ सीटें निकाल सकती है. राज्य में द्रमुक और कांग्रेस एकजुट हैं और सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण देने के मुद्दे पर अन्नाद्रमुक अपना विरोध जता चुका है.

हालांकि भाजपा को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से उम्मीद है क्योंकि आंध्र में जगन मोहन रेड्डी (वाइएसआर कांग्रेस) और तेलंगाना में केसीआर से गठबंधन का विकल्प बचा हुआ है. हालांकि, भाजपा के ही नेता यह कहते हैं कि इन दोनों दलों से चुनाव बाद गठबंधन की संभावना तो बन सकती है लेकिन चुनाव-पूर्व गठबंधन कठिन है. वजह यह कि जगन मोहन रेड्डी भाजपा से हाथ मिलाते हैं तो राज्य में उनके विरोधी चंद्रबाबू नायडू को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि जगन ने उस नेता (मोदी) का साथ दिया जिसने आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया. केसीआर को हाल के विधानसभा चुनाव में बड़ी सफलता मिली है. वे भाजपा के साथ जाकर न तो अपनी सीटें शेयर करेंगे, न ही मुस्लिम वोटरों को नाराज करने का जोखिम उठाएंगे.

चुनाव-पूर्व गठबंधन को लेकर भाजपा की उदासीनता स्पष्ट है. पार्टी नेता परोक्ष रूप से यह कहते हैं कि गठबंधन के लिए विभिन्न राजनैतिक दलों की ओर से पहल तभी होती है जब राष्ट्रीय पार्टी अपने दम पर ज्यादातर सीटें हासिल करे. केंद्र में विपक्षी गठबंधन का आकार बहुत बड़ा नहीं होता. अलबत्ता जो राष्ट्रीय दल सबसे अधिक सीटें हासिल करता है, उसकी तरफ क्षेत्रीय दल झुक जाते हैं. भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘‘बिहार में नीतीश कुमार भाजपा से अलग होकर लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़े. लेकिन बाद में साथ आ गए. एक-दो छोटी पार्टियां एनडीए गठबंधन से अलग जरूर हुई हैं लेकिन 2019 के बाद फिर ये दल भाजपा की तरफ लौटेंगे. शिवसेना भी अलग होकर विधानसभा चुनाव लड़ी थी लेकिन बाद में हम साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं.ʼʼ

भाजपा के इन दावों के बावजूद एक प्रत्यक्ष चुनौती पार्टी के सामने साफ दिख रही है कि जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल एकजुट हो रहे हैं या हो चुके हैं, उसमें कांग्रेस भी शामिल है. उत्तर प्रदेश में भले कांग्रेस, सपा-बसपा गठबंधन का हिस्सा न हो लेकिन उन्हें चुनाव बाद भाजपा विरोध के नाम पर कांग्रेस का साथ देने में परहेज नहीं होगा. मोदी विरोध में खड़ी ममता बनर्जी या फिर केरल में बची एकमात्र वामपंथी सरकार भी 2019 में मोदी को रोकने के लिए अपना समर्थन उस गठबंधन या दल को देने में संकोच नहीं करेगी, जो ऐसा करने की कूव्वत रखता हो. इसलिए मोर्चाबंदी पूरी है.

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