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रियल एस्टेट-मंदी की मार

त्त का यह भी कहना है कि अर्थव्यवस्था में 8 प्रतिशत और उससे अधिक की आर्थिक वृद्धि से ही रियल एस्टेट क्षेत्र को वास्तविक बढ़ावा मिल सकता है क्योंकि इससे नौकरियों की स्थिति सुधारेगी और परिणामस्वरूप आवास की मांग को बढ़ावा मिलेगा.

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aajtak.in
एम.जी. अरुण/ शुभम शंखधर नई दिल्ली, 25 September 2019
रियल एस्टेट-मंदी की मार रियल एस्टेट परियोजना

करीब साल भर से मीडियाकर्मी जेम्स जोसफ घर की तलाश में थे. अब तक वे अपने एक बेडरूम वाले फ्लैट में थे, जो चार लोगों के उनके परिवार के लिए छोटा पड़ रहा था. इसलिए वे नवी मुंबई में दो बेडरूम का फ्लैट खरीदना चाहते थे. उन्होंने अपने फ्लैट को बेच दिया और खारघर के आवासीय टावरों में एक अपार्टमेंट के लिए लगभग मन बना लिया था. 1,000 वर्ग फुट के फ्लैट की कीमत 1.3 करोड़ रु. से शुरू होती थी. वे फ्लैट खरीदने ही वाले थे कि मंदी का असर दिखने लगा. उनकी कंपनी ने कर्मचारियों की वेतन वृद्घि पर रोक लगा दी.

वे कहते हैं, ''जब नौकरी पर ही अनिश्चितता के बादल छा गए हों, तो 50,000 रु. से अधिक की मासिक किस्तों का कर्ज लेने का कोई मतलब नहीं है.'' जोसफ अब दो बेडरूम वाले किराए के फ्लैट में जाने की योजना बना रहे हैं. उनके दो बच्चे शहर के स्कूलों में पढ़ रहे हैं, तो, क्या वे भविष्य में मुंबई में फ्लैट खरीद पाएंगे? जोसफ कहते हैं, ''घर खरीदकर अपने लिए परेशानी क्यों मोल लेना? मैं अपने पैसे को ऐसी योजना में निवेश करूंगा, जिसमें बच्चों के कॉलेज में पहुंचने तक अच्छा रिटर्न मिले.'' ऐसा सोचने वाले वे अकेले शख्स नहीं है. मुंबई में कई संभावित खरीदार ऐसा ही सोच रहे हैं. रोजगार की बढ़ती अनिश्चितता के मद्देनजर घर खरीदने की योजनाएं टाल रहे हैं.

नीति आयोग के फरवरी के अनुमान के अनुसार, 8.3 लाख करोड़ रु. अनुमानित कारोबार वाला देश का रियल एस्टेट सेक्टर दशक की सबसे बड़ी मंदी की चपेट में है. जुलाई में प्रकाशित रियल्टी कंसल्टेंट नाइट फ्रैंक इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, आठ प्रमुख शहरों—मुंबई, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर), बेंगलूरू, चेन्नै, हैदराबाद, अहमदाबाद, पुणे और कोलकाता में अनबिके घरों की संख्या 2019 की पहली छमाही में 4,50,263 है. हालांकि 2019 की पहली छमाही में इन शहरों में नए लॉन्च 21 प्रतिशत तक बढ़ गए थे (2018 में समान अवधि की तुलना में) इसी अवधि में बिक्री केवल 4 प्रतिशत बढ़ी.

2019 की पहली छमाही में मुंबई महानगरीय क्षेत्र में सबसे ज्यादा अनबिके फ्लैट थे और यह संख्या 1,36,525 थी. 1,30,000 अनबिके फ्लैट के साथ एनसीआर दूसरे स्थान पर है, जबकि बेंगलुरू 85,387 अनबिके फ्लैट के साथ तीसरे स्थान पर है.

एनारॉक प्रॉपर्टी कंसल्टेंट्स के चेयरमैन अनुज पुरी कहते हैं, ''मध्यम अवधि के लिए तो भारत की आवासीय अचल संपत्ति का सुनहरा दौर अब गुजर चुका है.''

उनका कहना है, निवेश या रहने के लिए दोनों तरह के घर खरीदार निराश हैं. वे बताते हैं, ''2013 से 2019 के बीच सबसे अधिक बिक्री 2014 में 3,50,000 घरों की थी, लेकिन नोटबंदी के तुरंत बाद 2017 में यह घटकर 2,10,000 घरों पर आ गई.

रिहाइश के लिए घर खरीदने वाले बाजार अनुकूल होने की प्रतीक्षा में बैठे रहे जबकि निवेश के लिए घर खरीदने वालों ने पूरी तरह हाथ खींच लिया.'' वैसे, 2018 में कुछ समय के लिए बिक्री बढऩे के कुछ संकेत दिखने लगे थे, पर वर्तमान रुझानों से संकेत मिलता है कि बिक्री में तेजी का दौर लौटने की जल्द कोई संभावना नहीं है.

हालांकि, आवासीय रियल एस्टेट बाजार की तुलना में, वाणिज्यिक रियल एस्टेट ने अच्छी वृद्धि दिखाई है, जिसका हिस्सा प्रॉपर्टी बाजार में कुल 12 से 15 प्रतिशत मात्र ही है. पहली छमाही में ऑफिस स्पेस की बिक्री में 11 प्रतिशत की वृद्धि दिखी है. वजह: कॉर्पोरेट ऑफिस के लिए मजबूत मांग है.

मंदी के कारणों की पहचान करना मुश्किल नहीं है. मंदी के कारण नौकरियां लगातार घट रही हैं, वेतन में कोई वृद्धि नहीं हो रही और प्रॉपर्टी की कीमतें आसमान पर हैं, घरों की मांग में गिरावट आना लाजिमी है. जनवरी में, वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान इंडिया टुडे से बातचीत में आरबीआइ के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने बताया कि रियल एस्टेट उद्योग वास्तव में ऊंची कीमतों के कारण त्रस्त है. उन्होंने कहा, ''रियल एस्टेट उद्योग में कीमतें बहुत अधिक थीं. लिहाजा, मांग नहीं बढ़ रही थी. डेवेलपर्स कीमतों में कटौती करने को राजी नहीं थे क्योंकि वे कुछ अपार्टमेंट पहले ऊंची कीमतों पर बेच चुके थे.'

गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) में संकट के परिणामस्वरूप, रियल एस्टेट बाजार भी उधार की कमी का सामना कर रहा है जो घर के खरीदारों और डेवेलपरों, दोनों के लिए धन का एक प्रमुख स्रोत है. काले धन, विशेष रूप से रियल एस्टेट में काले धन, पर अंकुश लगाने के लिए नोटबंदी लागू की गई, जिससे इस क्षेत्र में निवेश प्रभावित हुआ है. न्यायिक सक्रियता ने भी इसे अल्पकालिक स्तर पर नुक्सान ही पहुंचाया है.

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप का हालिया मामला आम्रपाली और यूनिटेक का है, जिनकी अधूरी निर्माण परियोजनाओं को पूरा करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की हाउसिंग फर्म एनबीसीसी को निर्देश दिया गया. लिहाजा, खरीदारों को यकीन नहीं है कि घर जल्द पूरे हो जाएंगे क्योंकि एनबीसीसी नकदी की तंगी से जूझ रही है.

क्यों छाई है यह मंदी

मुंबई स्थित टाटा रियल्टी ऐंड इन्फ्रास्ट्रक्चर के एमडी और सीईओ संजय दत्त मंदी के कई कारक बताते हैं. वे कहते हैं, ''एक प्रमुख मुद्दा अतिरिक्त तेजी का है, जिससे अत्यधिक घरों का निर्माण हुआ और यह भी तथ्य है कि ये ज्यादातर नए घर रिहाइशी खरीदारों के लिए उपयुक्त ही नहीं थे. अन्य समस्याएं कीमतों को वाजिब करने और घर तैयार करने में डेवेलपरों की ओर से हुई देरी है जिससे खरीदारों का भरोसा डगमगाया है.'' यह क्षेत्र पूंजी की उच्च लागत के कारण पहले से ही नकदी का संकट झेल रहा था. उसी दौरान आए दो नए कानून रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 (रेरा) और माल व सेवा कर (जीएसटी) ने डेवेलपरों के लिए नकदी प्रवाह का संकट और गहरा दिया.

मंदी के कारण आवासीय संपत्ति की कीमतें गिरनी शुरू हो गई हैं, लेकिन वे इस स्तर पर भी नहीं पहुंचीं कि खरीदार घर खरीदने के लिए उत्साह दिखाने लगें. मसलन, 2019 की पहली छमाही में मुंबई और कोलकाता के बाजारों में कीमतों में केवल 1 प्रतिशत की गिरावट आई. 2019 की पहली छमाही के दौरान पुणे में 2 प्रतिशत की गिरावट देखी गई, चेन्नै और अहमदाबाद में कीमतों में कोई कमी नहीं की गई है. इस बीच, केरल में रियल एस्टेट की मांग में भारी गिरावट देखी गई है.

पंजीकृत भारतीय रियल एस्टेट डेवेलपर्स के एक शीर्ष निकाय कन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवेलपर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (क्रेडाइ) के पूर्व उपाध्यक्ष, और एसआइ प्रॉपर्टी लिमिटेड के एमडी एस.एन. रघुचंद्रन नायर कहते हैं, ''हमें ऐसे वक्त में अस्तित्व बचाए रखने के लिए नई रणनीतियों की आवश्यकता है.'' लखनऊ से भी मांग में भारी गिरावट की खबरें आ रही हैं. शालीमार कॉर्प के संयुक्त प्रबंध निदेशक खालिद मसूद के अनुसार, 40 लाख रु. से 3 करोड़ रु. की लागत वाले घरों की वास्तविक मांग में 50 प्रतिशत की गिरावट आई है.

इसके साथ ही एक और तथ्य है जो स्थिति को और बदतर बनाता है. हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में अपनी रेपो दर में कटौती की है जो इस वर्ष की शुरुआत के बाद से लगातार चौथी कटौती है और इस बार 35 आधार अंकों (0.35 प्रतिशत) की कटौती हुई. पर बैंक, रेपो रेट के रूप में आरबीआइ से मिली छूट का एक बहुत छोटा हिस्सा ही सस्ते ऋणों के रूप में खुदरा उपभोक्ताओं तक स्थानांतरित कर रहे हैं. इसके अलावा, रियल एस्टेट के संभावित खरीदार, अपना अंतिम निर्णय लेने में वन्न्त ले रहे हैं.

सस्ते घर बनाने वाले बेंगलूरू के एक डेवेलपर वीबीएचसी वैल्यू होक्वस के एमडी और सीईओ राम वाल्से कहते हैं, ''ग्राहकों ने घरों को खरीदने का फैसला आगे के लिए स्थगित कर दिया हैं क्योंकि उन्हें पता है कि कीमतें फिलहाल तो बढऩे वाली नहीं हैं. उन्हें सरकार या दूसरे किसी पक्ष की ओर से कुछ नई योजनाओं की घोषणा का इंतजार भी है.''

हालांकि, देर से ही सही पर सरकार ने मदद के लिए कदम बढ़ाए हैं. 14 सितंबर को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश में कई रुकी हुई सस्ती और मध्यम-आय वाली आवासीय परियोजनाओं को वित्तपोषण प्रदान करने के लिए एक विशेष कोष बनाने की घोषणा की. सरकार ने 10,000 करोड़ रु. का योगदान किया है और भारतीय जीवन बीमा निगम, बैंकों और सॉवरिन फंड से भी इतने योगदान की अपेक्षा की गई है.

वित्त मंत्रालय के इस कदम से करीब 3,50,000 हाउसिंग यूनिट को फायदा होगा. उन वित्तपोषण सस्ती और मध्यम आय वाली परियोजनाओं के लिए भी अंतिम ऋण उपलब्ध कराया जाएगा जो कम से कम 60 प्रतिशत पूर्ण हैं, हालांकि यह उन परियोजनाओं पर लागू नहीं होगा जो राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के तहत वियोजन (रिजॉल्यूशन) प्रक्रियाओं से गुजर रही हैं.

दत्त कहते हैं, ''इससे ग्राहकों को राहत मिलेगी और इस क्षेत्र में विश्वास बहाल करने में मदद मिलेगी.'' वे कहते हैं कि इस क्षेत्र को 3 लाख करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि की आवश्यकता है और सरकार का यह कोष उस दिशा में पहला कदम है. किफायती आवास के लिए बाहरी वाणिज्यिक उधार के माध्यम से धन जुटाने के मानदंडों में ढील दी जाएगी और सरकारी कर्मचारियों को कम ब्याज दरों पर घर बनाने के लिए अग्रिम मिलेगा.

हालांकि, क्रेडाइ के राष्ट्रीय अध्यक्ष, जैकब शाह का कहना है कि इसका सीमित प्रभाव होगा क्योंकि इस फंड के लाभ से उन परियोजनाओं को बाहर रखा गया है जो दिवालिया कार्रवाई का सामना कर रही हैं या एनपीए बन गई हैं. वे कहते हैं, ''पिछले महीने, हमने वित्त मंत्री से मुलाकात की और मांग बढ़ाने के लिए कई कदम उठाने का अनुरोध किया. पर उन पर कुछ फैसला नहीं हुआ है.''

वित्त मंत्री ने 23 अगस्त को बाजार की धारणा में सुधार, मांग को बढ़ावा देने और ऋण प्रवाह में सुधार के लिए एक पैकेज की घोषणा की थी. इस पैकेज में घरेलू और विदेशी निवेशकों के लिए पूंजीगत लाभ पर अधिभार को वापस लेने के साथ-साथ वित्तीय प्रणाली को मजबूत करने के लिए सरकारी बैंकों में 70,000 करोड़ रु. की पूंजी डालना और रेपो दरों में कटौती का फायदा जनता तक पहुंचाने के लिए आरबीआइ की रेपो दरों को खुदरा ऋण दरों के साथ जोडऩे जैसे प्रयास भी शामिल थे. लेकिन रियल एस्टेट सेक्टर को पुनर्जीवित करने में ये उपाय कितने सहायक होंगे?

आगे की राह

कोई फौरी समाधान नहीं हैं, लेकिन उद्योग के बड़े खिलाड़ी रियल एस्टेट सेक्टर में जान डालने से जुड़े कुछ आवश्यक हस्तक्षेप सुझाते हैं:

अर्थव्यवस्था में जान फूंकें: विशेषज्ञों का कहना है कि मांग में कमी का प्राथमिक कारण कुल मिलाकर खपत में गिरावट है. मंदी के संकेत कई व्यापक आर्थिक मानकों में दिखाई दे रहे हैं—2019-20 की पहली तिमाही में देश की जीडीपी वृद्धि दर 5 प्रतिशत के साथ छह साल के निचले स्तर पर पहुंच गई. एक साल पहले यह 8 प्रतिशत थी. विशेषज्ञों का कहना है कि देश एक लंबी मंदी के दौर में प्रवेश कर चुका है.

नाइट फ्रैंक इंडिया के कार्यकारी निदेशक गुलाम जिया कहते हैं, ''सवाल यह है—आपको खरीदार कहां मिलेंगे? यहां तक कि आइटी क्षेत्र में, वैश्विक मंदी के कारण कुछ चिंताजनक संकेत हैं.'' अर्थव्यवस्था के अधिकांश हिस्सों में छंटनी और वेतन में बढ़ोतरी बंद हो जाना आम बात हो गई है. ऑटोमोबाइल क्षेत्र में 300 से अधिक डीलरशिप बंद हो गए हैं और निर्माताओं ने अपनी इन्वेंट्री को बढ़ाने से बचने के लिए कारखानों में काम में कटौती शुरू कर दी है.

जब लोग अपनी नौकरी को लेकर इतने अनिश्चित हो जाते हैं, तो नए घर या कार जैसी चीजें खरीदने की प्रवृत्ति में तेजी से गिरावट आती है. पिछले पांच वर्षों में स्थिति और खराब हो गई है. 2018 में हालांकि घरों की बिक्री में थोड़ी वृद्धि हुई थी. ऐसा विशेष रूप से कम लागत वाले आवास में हुआ क्योंकि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 31 मार्च, 2022 तक दो करोड़ किफायती घरों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है और इसकी बिक्री को बढ़ावा देने के लिए कुछ कर छूट भी दी हुई है लेकिन यह गति जल्द ही लडख़ड़ा गई.

विशेषज्ञों का विचार है कि किसी भी बाजार में मजबूती लौटने में आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि की मुख्य भूमिका होती है. जिया कहते हैं, ''रियल एस्टेट एक माध्यमिक उद्योग है जो उन उपभोक्ताओं से तैयार होता है जो अपने प्राथमिक उद्योगों में अच्छा कर रहे हैं. हम कृत्रिम साधनों के जरिए अचल संपत्ति को पुनर्जीवित नहीं कर सकते हैं.'' कुछ लोगों का तर्क है कि सरकार बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश के अपने वादे पर चले तो इससे सेक्टर को बढ़ावा मिलेगा. दत्त का यह भी कहना है कि अर्थव्यवस्था में 8 प्रतिशत और उससे अधिक की आर्थिक वृद्धि से ही रियल एस्टेट क्षेत्र को वास्तविक बढ़ावा मिल सकता है क्योंकि इससे नौकरियों की स्थिति सुधारेगी और परिणामस्वरूप आवास की मांग को बढ़ावा मिलेगा.

कर्ज का प्रवाह आसान बनाएं: परेशानी का एक और प्रमुख कारक खरीदारों और डेवेलपरों को कर्ज मुहैया कराने वाले एनबीएफसी क्षेत्र के साथ चल रही दिक्कतें भी हैं. पिछले साल जुलाई में, एक प्रमुख एनबीएफसी कंपनी आइएलऐंडएफसी अपने अल्पकालिक ऋण और बॉन्ड पर ब्याज के भुगतान में चूक करने लगी. इसके बाद दीवान हाउसिंग फाइनेंस के साथ भी ऐसी ही दिक्कतें शुरू हुईं. इसके कारण एनबीएफसी क्षेत्र की फंडिंग के प्रमुख आपूर्तिकर्ता म्युचुअल फंड्स ने इस क्षेत्र में अपना हिस्सा घटा लिया. जुलाई 2018 में म्युचुअल फंड से इस क्षेत्र को जहां 2.66 लाख करोड़ रु. मिले थे, वह जून 2019 में घटकर 2.02 लाख करोड़ रह गया.

प्रॉपर्टी डेवेलपरों को मिलने वाले ऋणों में एनबीएफसी (और अन्य हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों) का अंशदान 60 प्रतिशत तक है लेकिन इसके सामने आई पैसे की किल्लत के परिणामस्वरूप रियल एस्टेट में भी कर्ज की एक बड़ी समस्या खड़ी हुई जिससे उसकी कर्ज की लागत ऊंची हो गई. आरबीआइ ने आवास ऋणों के लिए कठोर मानदंड निर्धारित किए, जो नीम पर करेला चढऩे जैसा था. संकट और बढ़ गया. हाल के समय में, लोन-टू-वैल्यु (किसी दिए गए मूल्य की संपत्ति के लिए मंजूर अधिकतम ऋण का अनुपात)—को 70 प्रतिशत तक सीमित कर दिया गया है. पुरी कहते हैं कि अगर इसे सरल शब्दों में कहें तो अब संपत्ति के खरीदारों को घर की लागत का 30 फीसदी अपनी तरफ से लगाना होगा.

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