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रियल एस्टेट कानूनः खत्म होगी बिल्डरों की मनमानी

केंद्र सरकार जमीन-जायदाद के मामले में ऐसा कानून लेकर आ गई है जिससे बड़े बिल्डरों के हाथों फ्लैट खरीदारों के शोषण और ठगे जाने पर काफी हद तक अंकुश लगेगा.

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aajtak.in
पीयूष बबेले नई दिल्ली, 01 April 2016
रियल एस्टेट कानूनः खत्म होगी बिल्डरों की मनमानी

कई बरस के इंतजार के बाद आखिरकार 26 मार्च को रियल एस्टेट (रेगुलेशन ऐंड डेवलपमेंट) अधिनियम 2016 भारत सरकार के राजपत्र में छप गया. इससे पहले संसद के दोनों सदनों में यह पारित हुआ और इसने संसद में सत्ताधारी और विपक्षी दलों को एक राय होने का मौका भी दिया. लेकिन इस राजनैतिक एकता से कहीं बड़ी बात यह हुई कि शहरों में फ्लैट या मकान खरीदने वाले, अब पहले से कहीं कम धांधली का शिकार होंगे. अपनी गाढ़ी कमाई से मकान बुक करने के बाद पूरी तरह बिल्डर के रहमोकरम पर आ जाने का दौर खत्म होगा. और संभवतः पहली बार देश के मध्यम वर्ग की जिंदगीभर की कमाई के बड़े हिस्से पर पनपने वाला रियल एस्टेट कारोबार एक बेहतर नियामक की निगरानी में काम करेगा.

अधिनियम पर नजर डालें तो सबसे पहले कुछ खास बातों पर ध्यान जाता है. अधिनियम के अंतर्गत हर राज्य सरकार को साल भर के अंदर अपने यहां रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (आरईआरए) का गठन करना होगा. रियल एस्टेट से जुड़ा सारा बड़ा काम इस अथॉरिटी की निगरानी में चलेगा. मसलन, अब कोई बिल्डर मुंह उठाकर, सीधे बड़े-बड़े विज्ञापन और फ्लैट की बुकिंग शुरू नहीं कर पाएगा. यह काम करने से पहले उसे अथॉरिटी में पंजीकरण कराना होगा. पंजीकरण तभी होगा, जब वह सारी जरूरी अनापत्तियां अथॉरिटी को बता देगा. यह सारा काम ऑनलाइन किया जाएगा. बिल्डर को अथॉरिटी को यह भी बताना होगा कि प्रोजेक्ट कब तक पूरा होगा. अगर तय समय पर ग्राहक को मकान नहीं मिलता तो मकान बुक करने वाले को मय ब्याज के रकम वापस लेने का अधिकार होगा. इसके अलावा बिल्डर को अथॉरिटी की तरफ से तय किए गए जुर्माने या दंड का सामना भी करना होगा.
 तो, क्या ये चीजें आम आदमी को राहत देंगी. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में सबसे ज्यादा विवादों का शिकार रहे नोएडा एक्सटेंशन (अब ग्रेटर नोएडा वेस्ट) में फ्लैट बुक करने वाले हजारों लोगों से ज्यादा बेहतर तरीके से इस सवाल का मर्म और कौन समझ सकता है. यहां बुक किए गए हजारों मकानों का पजेशन तय समय सीमा से तीन से चार साल तक पीछे चल रहा है. नया कानून बनवाने के पीछे यहां के पीड़ित लोगों के दबाव की भी बड़ी भूमिका रही है.

छह साल पहले मकान बुक करने के बाद अब तक पजेशन के लिए भटक रहीं श्वेता भारती, अपनी ही तरह के पीड़ित लोगों की संस्था नोएडा एक्सटेंशन फ्लैट ओनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की महासचिव हैं. श्वेता को याद है कि यूपीए सरकार के जमाने में इस बिल पर जब काम शुरू हुआ तो तत्कालीन शहरी विकास मंत्री अजय माकन ने किस तरह उन लोगों के सुझाव सुने थे. इसके बाद विधेयक पर मंथन करने वाली संसद की स्थायी समिति ने इन लोगों के सुझाव लिए और शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने भी पीड़ित लोगों से बातचीत की, ताकि ऐसा कानून बने जो दूरगामी होने के साथ ही वक्ती जरूरतों पर भी खरा उतरे. श्वेता बताती हैं, ''लंबी लड़ाई के बाद इस कानून से उम्मीद जगी है. कम से कम अथॉरिटी के रूप में एक जगह तो ऐसी होगी, जहां फ्लैट और बिल्डर से जुड़ी सारी बातें और शिकायतें की जा सकेंगी.'' हालांकि उन्हें अभी यह स्पष्ट नहीं है कि उनके अपने फ्लैट के बारे में यह कानून लागू होगा या नहीं?

दरअसल अधिनियम में कहा गया है कि अधिनियम लागू होने के वक्त तक जो प्रोजेक्ट लंबित हैं, उन पर यह कानून लागू होगा. दूसरी तरफ अथॉरिटी के गठन को एक साल की समय सीमा दी गई है. ऐसे में व्यावहारिक रूप से कानून तभी लागू होगा जब संबंधित राज्य अथॉरिटी का गठन कर लेंगे. लेकिन इन शुरुआती नुक्तों से इतर, दूर की राह बेहतर बताई जा रही है. बिल्डरों की संस्था क्रेडाई एनसीआर के अध्यक्ष मनोज गौर इसे रियल एस्टेट कारोबार में पारदर्शिता के नए युग की शुरुआत के रूप में देखते हैं. गौर ने कहा, ''ईमानदारी से काम करने वाले डेवलपर्स के लिए यह कानून बहुत अच्छा है. शुरुआत में आरआइआरए को लेकर स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं है, लेकिन शेयर मार्केट के लिए जब सेबी का गठन हुआ था, तब भी यही स्थिति थी. आज सेबी ने संस्थागत निवेशकों और आम निवेशक को बराबरी पर लाकर खड़ा कर दिया है. यह कानून अंततः मकान खरीदने वालों को और इस तरह से पूरे कारोबार को मजबूत करेगा.''

हालांकि मकान बुक कराने वालों से ली गई 70 फीसदी राशि को डेवलपर को अलग बैंक एकाउंट में जमा करने की बंदिश को वह और स्पष्ट किए जाने की जरूरत महसूस करते हैं.

दरअसल कानून में प्रावधान है कि किसी प्रोजेक्ट के लिए ग्राहकों से ली गई रकम का 70 फीसदी हिस्सा डेवलपर को अलग एकाउंट में रखना होगा. इस पैसे का इस्तेमाल प्रोजेक्ट के निर्माण और इसके लिए जमीन की खरीद पर ही खर्च करना होगा. इस प्रावधान को खासा महत्वपूर्ण बताते हुए ग्रेनोवेस्ट प्रोपर्टीज डॉट कॉम के एमडी प्रातनु बिस्वास कहते हैं, ''बहुत से मामलों में डेवलपर ग्राहकों से मिली रकम का इस्तेमाल दूसरे प्रोजेक्ट में या अन्य तरह के कामों में कर लेते हैं. इस लालच में मूल प्रोजेक्ट के लिए पैसे की कमी पड़ जाती है. रकम के प्रोजेक्ट तक सीमित करने से डेवलपर को प्रोजेक्ट के लिए पैसे की कमी नहीं पड़ेगी. इससे प्रोजेक्ट समय पर पूरा करने में मदद मिलेगी.''

नए कानून में व्यवस्था है कि जैसे-जैसे प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य आगे बढ़ता जाएगा, उसी अनुपात में डेवलपर रकम निकाल सकता है. ऐसा करने के लिए उसे सक्षम इंजीनियरों और आर्किटेक्ट से प्रमाणपत्र लेना होगा. इस तरह से सरकार की कोशिश है कि डेवलपर हर हाल में ग्राहक का पैसा उसके लिए मकान बनाने में ही लगाए, न कि चुनाव और दूसरे काम-धंधों में पैसे को लगा दे.

लेकिन इन सख्त फैसलों के बीच इस बात का ख्याल रखा गया है कि छोटे बिल्डरों को बहुत ज्यादा सख्ती का सामना न करना पड़े. इसीलिए 500 वर्ग मीटर के प्लॉट या आठ फ्लैट तक बनाने वाले छोटे डेवलपर को अथॉरिटी में रजिस्ट्रेशन कराने से छूट दी गई है. इन लोगों का काम मौजूदा व्यवस्था के अनुसार ही चलता रहेगा. उधर, बड़े बिल्डर इस कानून को अपनी एक पुरानी मांग को पूरा करने की दिशा में पहले कदम के रूप में भी देख रहे हैं. रियल एस्टेट सेक्टर लंबे समय से बुनियादी ढांचा क्षेत्र का दर्जा देने की मांग कर रहा था, नए नियामक के आने के बाद उस दिशा में पहल होगी.

लेकिन सबसे बड़ी राहत तो आखिर उन लोगों को मिलनी है, जिनकी गाढ़ी कमाई दबाकर, कई बिल्डर चुप साध जाते थे और पैसा लगाने वालों को न तो मकान मिलता था और न ही पैसा वापस. कम से कम अब उनके पास अपना पैसा वसूलने के लिए सीधी व्यवस्था तो है. दूसरी तरफ डेवलपर्स को उम्मीद है कि बढ़े हुए भरोसे के बल पर रियल एस्टेट बाजार में छाई सुस्ती दूर होगी.

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