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प्राइवेट बैंकों का बिगड़ता हिसाब, सुधारने की जरूरत

आइसीआइसीआइ बैंक में भाई-भतीजावाद के आरोपों ने उसकी प्रतिष्ठा को दांव पर लगा दिया है. इससे निजी बैंकों में कॉर्पोरेट गवर्नेंस की समीक्षा करने की भी तत्काल जरूरत महसूस हो रही है ताकि लोगों के भरोसे को बनाए रखने वाले कदम उठाए जा सकें

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aajtak.in
एम.जी. अरुण/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 17 April 2018
प्राइवेट बैंकों का बिगड़ता हिसाब, सुधारने की जरूरत साख का संकट आइसीआइसीआइ बैंक की एमडी और सीईओ चंदा कोचर

महज एक महीने पहले हीरा व्यापारी नीरव मोदी के कारण मचे हो-हल्ले और भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की लगातार बढ़ती गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) या डूबते कर्ज की चेतावनियों के बीच निजी बैंकिंग सेक्टर बेहतर स्थिति में नजर आ रहा था.

पिछले साल यानी 2017 में 30 सितंबर तक सरकारी स्वामित्व वाले बैंकों का एनपीए जहां 7.34 लाख करोड़ रुपए हो गया था, वहीं सारे निजी बैंकों में कुल मिलाकर डूबते कर्ज की राशि महज 1.02 लाख करोड़ रु. थी.

इस रोशनी में सार्वजनिक क्षेत्र के (पीएसयू) बैंकों की उनकी अकुशलता, भ्रष्टाचार और स्वायत्तता के अभाव के लिए खासी आलोचना की जा रही थी क्योंकि इसके कारण उनके राजनीतिक दखलअंदाजी और सांठगांठ के पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज्म) के शिकंजे में फंसने की आशंका कहीं ज्यादा थी.

वहीं दूसरी तरफ निजी बैंकों को कुशलता, ग्राहक केंद्रित नजरिये और शेयरधारकों के हितों को ध्यान में रखने के उच्च प्रतिमान स्थापित करने और भारी मुनाफा कमाने वालों के तौर पर देखा जा रहा था. उद्योग संगठनों से जुड़े आयोजनों में निजी बैंकों के सीईओ हमेशा छाए रहते थे.

उनकी गिनती 'ताकतवर लोगों' में होती थी और उनका वेतन उन्हें अत्यधिक संपन्न लोगों की फेहरिस्त में शुमार करता था. लिहाजा, जब नीति-नियंता पीएसयू बैंकों में छाये संकट की तलाश करने लगे तो कुछ लोगों ने उन्हें सलाह दी कि उनकी दशा सुधारने के लिए उनका निजीकरण कर देना चाहिए.

अब जरा मौजूदा हाल पर आ जाइए. कुल 10.5 लाख करोड़ रु. की समेकित परिसंपत्ति वाला भारत का दूसरा सबसे बड़ा निजी बैंक आइसीआइसीआइ संकट में है. इस निरंतर गहराते संकट के कारण निजी क्षेत्र के बैंक भी उतने ही बदहाल नजर आ रहे हैं जितने कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक.

पहले जिसे बैंक में कॉर्पोरेट गवर्नेंस के मसले के तौर पर देखा जा रहा था, अब उसे निजी बैंकिंग ढांचे में निहित सबसे कमजोर कड़ी के रूप में देखा जा रहा है. अब शीर्ष निजी बैंकों (आइसीआइसीआइ बैंक, एक्सिस बैंक) की तुलना भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से की जाने लगी है और निजी बैंकों के शीर्ष अधिकारी भी अब निजी एजेंसियों की जांच के दायरे में आ गए हैं.

आइसीआइसीआइ बैंक मामले में कई प्रमुख लोगों के खिलाफ हवाई अड्डों को निगरानी (लुकआउट) नोटिस जारी कर दिए गए हैं. इनमें आइसीआइसीआइ बैंक की एमडी व सीईओ चंदा कोचर के पति दीपक कोचर, दीपक के भाई राजीव कोचर और वीडियोकॉन समूह के चेयरमैन वेणुगोपाल धूत शामिल हैं.

इससे यह हाल के समय का सबसे सनसनीखेज मामला बन गया है. आइसीआइसीआइ बैंक के बोर्ड पर इस बात के लिए दबाव बढ़ गया है कि वह हितों के टकराव और लेन-देन के मामलों की स्वतंत्र जांच कराए. इसी वजह से विशेषज्ञ फिर से यह दलील दे रहे हैं कि निजीकरण बैंकिंग क्षेत्र की सारी समस्याओं का समाधान नहीं है.

देश में सार्वजनिक क्षेत्र के 22 बैंक हैं, निजी क्षेत्र के 34 और 44 विदेशी बैंक हैं. हालांकि ज्यादातर ऋण और अग्रिम (दिसंबर 2017 में 69 फीसदी) पीएसयू बैंकों ने दिए हैं. उसके बाद निजी क्षेत्र के बैंकों (27 फीसदी) और विदेशी बैंकों (4 फीसदी) का नंबर आता है.

इस समय लांछन केवल आइसीआइसीआइ बैंक पर ही नहीं है. भारतीय रिजर्व बैंक ने एक्सिस बैंक के बोर्ड से भी यह कहा है कि बैंक में बढ़ते डूबत कर्ज की चिंताओं के मद्देनजर वह शिखा शर्मा को चौथे कार्यकाल के लिए एमडी व सीईओ नियुक्त करने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करे.

बैंक क्षेत्र के प्रेक्षक पिछले एक साल की कुछ अन्य घटनाओं का भी जिक्र करते हैं जो शिखा शर्मा के खिलाफ गई होंगी. इनमें एक्सिस बैंक समेत कई निजी क्षेत्र के बैंकों के अधिकारियों के मनी लांड्रिंग में शामिल होने के बारे में कोबरापोस्ट द्वारा किया गया स्टिंग और यह आरोप शामिल है कि नोटबंदी के ऐलान के तुरंत बाद एक्सिस बैंक की कुछ शाखाएं अपने ग्राहकों के लिए मुद्रा बदलने में लिप्त थीं.

शिखा शर्मा ने 2009 में काम संभाला था और एक्सिस बैंक की मुखिया के तौर पर उनका तीसरा कार्यकाल जून में खत्म हो रहा है. पिछले साल उन्हें जून, 2021 तक के लिए तीन साल का चौथा कार्यकाल देने का फैसला किया गया था.

हाल के सालों में एक्सिस बैंक का एनपीए पांच गुना बढ़कर मार्च, 2017 के अंत तक 21,280 करोड़ रु. और शुद्ध मुनाफा आधा होकर 3,679 करोड़ रु. रह गया था.

लिहाजा बैंक ने 9 अप्रैल को इस बात का ऐलान कर डाला कि उसने शर्मा का कार्यकाल दिसंबर तक समाप्त करने का प्रस्ताव किया है और वह उनके उत्तराधिकारी की तलाश कर रहा है.

कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि आरबीआइ ने बढ़ते एनपीए और कॉर्पोरेट गवर्नेंस में चूक की चिंताओं के मद्देनजर तीन शीर्ष निजी बैंकों- एचडीएफसी बैंक, आइसीआइसीआइ बैंक और एक्सिस बैंक के सीईओ का बोनस रोक दिया है.

खबरों के अनुसार, मार्च, 2017 में खत्म हुए साल को लेकर आरबीआइ के एक ऑडिट में यह सामने आया है कि एक्सिस बैंक ने तकरीबन 5,600 करोड़ रु. मूल्य के डूबे कर्जों का खुलासा नहीं किया था.

बोनस भी इसी साल के लिए देय था. एचडीएफसी बैंक ने भी एक विचलन का जिक्र किया था, वहीं आइसीआइसीआइ बैंक का यह कहना था कि उसे किसी तरह का डिसक्लोजर करने की जरूरत नहीं है.

निजी क्षेत्र के कर्जदाताओं में आइसीआइसीआइ बैंक के खातों में सबसे ज्यादा एनपीए दर्ज हैं (सितंबर, 2017 के अंत तक 44,237 करोड़ रु.). फिर एक्सिस बैंक, एचडीएफसी बैंक और जम्मू ऐंड कश्मीर बैंक का नंबर आता है.

बोर्ड की निगाहों की जरूरत

आइसीआइसीआइ बैंक-वीडियोकॉन घपले ने कॉर्पोरेट गवर्नेंस की अहमियत और स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका को रेखांकित किया है. क्या स्वतंत्र निदेशक संकट में तब्दील होने से पहले इस मसले की ओर ध्यान खींच सकते थे? भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआइसी) आइसीआइसीआइ बैंक में सबसे बड़ा शेयरधारक है (12.3 फीसदी) और उसके चेयरमैन वी.के. शर्मा बैंक के बोर्ड में शामिल हैं.

बैंक के बाकी गैर-कार्यकारी निदेशक तुषार शाह, दिलीप चोकसी, अमित अग्रवाल, उदय चिताले (स्वतंत्र निदेशक) और नीलम धवन (अतिरिक्त और स्वतंत्र निदेशक) हैं.

विशेषज्ञों को यह बात बड़ी अजीब लगती है कि किसी भी निदेशक ने पिछले दो साल में बैंक में कॉर्पोरेट गवर्नेंस का मसला नहीं उठाया. विशेषज्ञ कहते हैं कि जब कोई बोर्ड कॉर्पोरेट गवर्नेंस में हो रही चूक की तरफ से आंखें मूंद लेता है तो यह उसकी इस मामले में मिलीभगत के बराबर है.

कई बोर्डों में स्वतंत्र निदेशक के तौर पर शामिल उद्योग क्षेत्र के एक दिग्गज ने अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा, ''आइसीआइसीआइ बैंक के बोर्ड को शुरू में ही चंदा कोचर को क्लीन चिट देने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए थी.

अब वे फंस गए हैं. कोचर को क्लीन चिट देने से पहले वे एक स्वतंत्र जांच करा सकते थे.'' जांच करने के लिए बोर्ड की एक कमिटी स्थापित की जा सकती थी और दायरे में शामिल अधिकारियों को तलब किया जा सकता था.

एकाउंटेंसी और सलाहकार फर्म हरिभक्ति समूह के मैनेजिंग पार्टनर और सीईओ शैलेश हरभक्ति का कहना है कि ताकतवर पदों पर बैठे लोगों को बाकी तमाम चीजों से ज्यादा अपने विवेक का सहारा लेना चाहिए.

हरिभक्ति कहते हैं, ''अधिकारियों को ऐसी किसी भी चीज को बर्दाश्त न करने की संस्कृति विकसित करनी चाहिए जिससे बेईमानी की बू आती हो. किसी संदेह की छाया की भी पूरी पड़ताल होनी चाहिए और यह पूरी निष्पक्षता से होना चाहिए.''

इसीआइसीआइ बैंक के मामले में सार्वजनिक पड़ताल और कई जांच एजेंसियों की छानबीन के बावजूद बैंक के बोर्ड ने अभी तक स्वतंत्र जांच का आदेश नहीं दिया है और इसके बजाय वह अपने सीईओ का पक्ष लेने में जुट गया है और बैंक के काम में किसी किस्म के भाई-भतीजावाद के आरोपों को नकार रहा है.

ग्लोबल रेटिंग एजेंसी फिच ने कहा है कि आइसीआइसीआइ बैंक में मौजूदा संकट ने कॉर्पोरेट गवर्नेंस को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं और बैंक की साख तक दांव पर लग गई है. एजेंसी ने 10 अप्रैल को कहा, ''क्रेडिट कमेटी में बैंक के सीईओ की मौजूदगी और स्वतंत्र जांच का समर्थन करने में बैंक की हिचक से हमारी राय में उसकी कॉर्पोरेट गवर्नेंस पद्धतियों को लेकर संदेह खड़े हो गए हैं.''

और यह कोई पहला मामला नहीं है. साल 2009 में सत्यम मामले में भी स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका पर सवाल उठे थे. उसमें कंपनी के प्रवर्तक रामलिंग राजू ने मुनाफा बढ़-चढ़ाकर दिखाने के लिए खातों में हेराफेरी करने की बात स्वीकार की थी.

पिछले साल कंपनी के बोर्ड और उसके संस्थापकों के बीच टकराव से इन्फोसिस में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को लेकर गंभीर मसले खड़े हुए थे. पिछले साल कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर कोटक महिंद्रा बैंक के चेयरमैन उदय कोटक की अध्यक्षता वाली सेबी की एक कमेटी ने सूचीबद्ध कंपनियों में स्वतत्र निदेशकों की नियुक्तिकी प्रक्रिया में कई बड़े बदलावों की सिफारिश की थी.

कंपनी कानून में कम से कम तीन निदेशकों की अनिवार्यता के बारे में कहा गया है जबकि नई सिफारिशों में छह निदेशकों की बात कही गई. यह प्रस्ताव भी किया गया कि निदेशक बोर्ड की कम से कम आधी बैठकों में हिस्सा जरूर लें.

साथ ही गैर-कार्यकारी निदेशकों की उम्र सीमा 75 साल निर्धारित करने की बात कही गई. पैनल ने यह सिफारिश भी की कि किसी निदेशक को आठ से ज्यादा बोर्ड का हिस्सा नहीं होना चाहिए. हरिभक्ति का कहना है कि केवल कुछ मामलों के आधार पर सभी निजी बैंकों को संदेह के नजरिए से देखना वाजिब नहीं होगा क्योंकि कई निजी व सार्वजनिक, दोनों तरह के बैंकों ने कॉर्पोरेट गवर्नेंस के उच्च मानक स्थापित किए हैं.

वह कहते हैं, ''हमारे देश ने खुद को क्रोनी कैपिटलिज्म के दौर से बाहर निकाला है. स्वतंत्र निदेशकों को उच्चतम स्तर की ईमानदारी दिखानी चाहिए. बेईमानी के आरोपों के चलते उनसे उम्मीदें भी बढ़ गई हैं.''

हितों का टकराव

आइसीआइसीआइ बैंक के संकट के मूल में बैंक और वीडियोकॉन, दोनों के एक शेयरधारक अरविंद गुप्ता का 2016 में प्रधानमंत्री को लिखा एक पत्र है जिसमें उन्होंने बैंक पर इस हाथ ले और उस हाथ दे का काम करने का आरोप लगाया था.

गुप्ता ने दावा किया कि दीपक कोचर ने चंदा से अपने रिश्ते का लाभ उठाया और अपने एनर्जी स्टार्ट-अप नूपॉवर रिन्यूएबल्स में धूत को निवेशक के रूप में शामिल कर लिया. जांच एजेंसियां अब नूपॉवर के कई सौदों की छानबीन कर रही हैं इनमें धूत से 64 करोड़ का कर्ज, अलग-अलग इकाइयों की स्थापना और वीडियोकॉन समूह को आइसीआइसीआइ बैंक से 3,250 करोड़ रु. का कर्ज मिलने के छह महीने बाद धूत के स्वामित्व वाले सारे शेयर दीपक कोचर को हस्तांतरित किया जाना शामिल है.

इसके अलावा जांच राजीव कोचर के व्यावसायिक लेनदेन की भी हो रही है जिनकी कंपनी एविस्ता एडवाइजरी ग्रुप आइसीआइसीआइ बैंक के ग्राहकों को मशविरा देने का काम किया करती थी. इसे हितों के टकराव के प्रत्यक्ष मामले के तौर पर देखा जा रहा है.

प्रबंधन सलाहकार और योजना आयोग के पूर्व सदस्य अरुण माइरा का कहना है, ''उन्हें सुनिश्चित करना चाहिए था कि रिश्तेदारों के व्यावसायिक हित बैंक के व्यावसायिक हितों से काफी दूर रहें.'' आधिकारिक तौर पर तो दीपक कोचर ने यही दावा किया है कि उनकी पत्नी वीडियोकॉन से उनके व्यावसायिक रिश्तों के बारे में अनजान थीं.

वहीं राजीव कोचर के मामले में बैंक ने बचाव में यह कहा है कि सीईओ के पति का भाई कंपनी कानून में 'रिश्तेदारों' की तय परिभाषा के तहत नहीं आता, लिहाजा बैंक के लिए उसके व्यावसायिक हितों को जाहिर करना जरूरी नहीं था.

लेकिन क्या यह स्वाभाविक नहीं है कि आम लोग और उनके साथ-साथ इस प्रतिष्ठित बैंक के निवेशक और शेयरधारक, सब उसके शीर्ष अधिकारी से ईमानदारी और पारदर्शिता के उच्चतम स्तर की अपेक्षा करें.

माइरा कहते हैं, ''जब व्यावसायिक मसलों की बात आती है तो आप सीढ़ी पर जितना ऊपर चढ़ते जाते हैं, आपको उतनी ही दूरी अपने निकट के रिश्तेदारों से बना लेनी चाहिए. यह हमें खुद लागू करनी चाहिए किसी कानून के तहत नहीं.''

भारत में रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड की पूर्व सीईओ व चेयरमैन मीरा सान्याल ने जांच एजेंसियों की पड़ताल के निष्कर्षों के सामने आने से पहले ही किसी नतीजे पर पहुंच जाने को लेकर आगाह किया है. वे कहती हैं, ''आइसीआइसीआइ बैंक मामले में जिस तरह के हितों के टकराव के आरोप लगाए जा रहे हैं, वह काफी गंभीर हैं.

हम उम्मीद ही कर सकते हैं कि चंदा ने इन नातों को पहले जाहिर कर दिया होगा, जो कि गवर्नेंस मानकों के अनुसार किसी भी सीईओ या वरिष्ठ प्रबंधक से अपेक्षित है.'' हालांकि धूत दीपक कोचर के साथ व्यावसायिक रिश्तों में किसी तरह की गड़बड़ी से साफ इनकार करते हैं. उन्होंने फोन पर बातचीत में इंडिया टुडे से कहा, ''मैंने नूपॉवर में कोई निवेश नहीं किया था.''

धूत कहते हैं कि जब उन्होंने और कोचर ने साथ मिलकर काम करने का फैसला किया था तो कंपनी को एक लाख रु. की पूंजी के साथ स्थापित किया गया था. उसके बाद उनका कंपनी से कोई वित्तीय लेनदेन नहीं हुआ.

शेयर बाजार को दिए बयान में आइसीआइसीआइ बैंक ने कहा है कि उसे चंदा कोचर में ''पूरा भरोसा है' और ''जैसा कि विभिन्न अफवाहों में आरोप लगाया जा रहा है, सौदेबाजी या भाई-भतीजावाद या हितों के टकराव का कहीं कोई सवाल नहीं उठता है.'' बैंक के  बोर्ड की अगली बैठक 7 मई को होगी और उसमें 2017-18 के लिए कंपनी के लेखांकित नतीजों पर विचार किया जाएगा.

नियामक की भूमिका

इन मामलों ने निजी बैंकों में कॉर्पोरेट गवर्नेंस में हो रही चूक पर आरबीआइ की बेध्यानी को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है. आइसीआइसीआइ बैंक के मामले में विशेषज्ञों ने व्हिसब्लोअर अरविंद गुप्ता के दो साल पहले पत्र लिखने के बाद भी आरबीआइ के खामोश बने रहने पर सवाल उठाए हैं.

एक विशेषज्ञ का कहना है कि आरबीआइ कम से कम इतना तो कर ही सकता था कि वह आइसीआइसीआइ बैंक को इन आरोपों की स्वतंत्र पड़ताल के लिए बोर्ड की एक कमेटी बनाने को कहता. आरबीआइ के पास निजी क्षेत्र के बैंकों को नियमित करने के व्यापक अधिकार हैं.

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