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सोशल मीडिया: बोलने लगी है आपकी बात

सोशल नेटवर्क वर्चुअल कॉफी हाउस का काम कर रहे हैं, जहां लोग असंख्य तरीके से कम्युनिकेट कर रहे हैं. यह इतना कारगर है कि 24 घंटे में आपकी बात लाखों लोगों तक पहुंच जाती है.

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aajtak.in
दिलीप मंडलनई दिल्ली, 21 August 2013
सोशल मीडिया: बोलने लगी है आपकी बात

आपके पास कहने के लिए कोई बात है? और कोई जरिया नहीं मिल रहा है जिससे आप अपनी बात लोगों तक पहुंचा सकें? आपके पास न अपना अखबार है, न चैनल. यहां तक कि कंप्यूटर और मोबाइल फोन तक नहीं है. लेकिन चिंतित क्यों हैं? आपके पास बात है, बात कहने का सलीका है, तो चलिए पास के किसी साइबर कैफे में. आधे घंटे सर्फिंग के 10 रु. जमा कीजिए और ऑनलाइन हो जाइए. अपनी वह बात, या फोटो या वीडियो फेसबुक या ट्विटर जैसी किसी सोशल नेटवर्किंग साइट, ब्लॉग या यूट्यूब जैसी किसी वीडियो शेयरिंग साइट पर डाल दीजिए. अब बात बोलेगी. अगर आपकी बात में फैलने का दम है तो हो सकता है (यह बिलकुल संभव है और कई बार हो चुका है) कि 24 घंटे में आपकी बात कई लाख लागों तक पहुंच चुकी हो. उतने लोगों तक जितने लोगों तक किसी अखबार, पत्रिका या चैनल या फिल्म की पहुंच न हो.

जनसंचार या मास कम्युनिकेशन की नई दुनिया में आपका स्वागत है. यह दिग्गज और साधारण का भेद मिटाने में कार्ल माक्र्स के सिद्धांत से कम उपयोगी नहीं साबित हुआ है. आर्थिक क्षेत्र में नहीं भी, तो संचार के क्षेत्र में ही सही. यह सूचना तंत्र के व्यापक लोकतंत्रीकरण के नए युग की शुरुआत भी है. यहां बड़े-छोटे और साधारण-महान का भेद अकसर टूट जाता है. भारत के ज्ञात इतिहास में इतनी बड़ी संख्या में लेखक और कम्युनिकेटर कभी नहीं थे. सिर्फ फेसबुक के भारतीय यूजर्स को लें तो यह संख्या आठ करोड़ के आसपास पहुंच गई है. अगर इनमें से एक-चौथाई भी सक्रिय हैं तो इनकी संख्या दो करोड़ होती है. इतने लोग एक-दूसरे तक अपनी बात पहुंचाने में सक्षम हैं तो यह बात भारतीय समाज को निर्णायक रूप से बदलने की क्षमता रखती है.

फेसबुक जैसे किसी माध्यम पर आपको अचानक पता चलता है कि आप जैसा सोचते हैं, वह कोई पागलपन या अनूठा विचार नहीं है. एक जैसा सोचने वाले कई लोगों से जुडऩा नए ढंग से समुदायों का निर्माण कर रहा है. यह वर्चुअल गणराज्य के अंदर उप राज्यों के निर्माण की प्रक्रिया है. स्मार्ट फोन ने इंटरनेट को जिस तरह का विस्तार दिया है उसने संवाद की संभावनाओं को लगभग अंतहीन बना दिया है. यूनिकोड के आने के बाद हिंदीभाषी लोगों के लिए भी इंटरनेट पर कम्युनिकेट करने के रास्ते खुल चुके हैं. इंटरनेट पर आकर देखिए तो सही कि लोग भी किस तेजी से और क्या खूब लिख रहे हैं.  

भारतीय लोकतंत्र के लिए भी इंटरनेट और सोशल नेटवर्क एक सकारात्मक पहलू के रूप में सामने आया है. इसने उन तमाम तरह के आंदोलनकारी लोगों को भी स्वर दिया है, जिनकी आवाज पहले कम सुनाई देती थी. इसमें छोटे राज्यों के निर्माण के समर्थकों से लेकर कई जातीय-उपजातीय-वर्गीय-धार्मिक समूह तक शामिल हैं. वर्चुअल समूह कई बार रीयल गतिविधियां करने के लिए एकजुट हो रहे हैं. इंडिया अंगेस्ट करप्शन की शक्ल में और दिल्ली रेप केस के खिलाफ जनांदोलन में फेसबुक का इस्तेमाल हो चुका है. यूपी में आरक्षण के समर्थक और विरोधी इंटरनेट के जरिए आंदोलन का स्थान और समय तय कर रहे हैं. लोकवृत्त यानी पब्लिक स्फीयर की जर्मन विद्वान जुरगन हैबरमास की अवधारणा को सोशल नेटवर्क ने नया आयाम दिया है. 21वीं सदी में सोशल नेटवर्क वर्चुअल कॉफी हाउस का काम कर रहे हैं, जहां लोग एक दूसरे से असंख्य तरीके से कम्युनिकेट कर रहे हैं. प्रोफेशनल पत्रकारों के लिए इसके मायने ये है कि अब लोग सूचनाओं के लिए उन पर कम निर्भर हैं और पत्रकार आखिरी बात कहने के अधिकारी नहीं रह गए हैं.

सूचनाओं तक पहले पहुंच के पत्रकारों के कई विशेषाधिकार अब खंडित हो चले हैं. भारत सरकार पहले जो प्रेस रिलीज सिर्फ मान्यताप्राप्त पत्रकारों को देती थी, उन्हें अब सीधे पीआइबी की साइट पर डाल दिया जाता है, जिन्हें कोई भी देख सकता है. सूचनाओं के असंख्य स्रोतों के बीच मीडिया के लिए विश्वसनीयता और भी कीमती वस्तु हो चुकी है.

भारतीय संविधान नागरिकों को कुछ पाबंदियों के साथ विचार और अभिव्यक्ति की लगभग अबाध स्वतंत्रता देता है. संविधान निर्माताओं ने यह बात मौलिक अधिकारों के अध्याय में इसीलिए डाली थी, ताकि इसका हनन करना मुश्किल हो. इस अधिकार का इस्तेमाल पहले आसान नहीं था. अब यह आसान हो गया है. राज्य अभी संचार जगत की इस नई सचाई को स्वीकार करने और उसके अनुसार खुद को ढालने की प्रक्रिया में है. इस क्रम में कई बार राज्य दारोगा की शक्ल में लोगों के सामने आ रहा है. फेसबुक और ब्लॉग पर लिखने या फोटो डालने को लेकर कानूनी कार्रवाइयां भी हुई हैं. यह एक नई स्थिति है और सत्ता को उदारता और धैर्य के साथ संविधान के दायरे में ही इससे रू-ब-रू होना चाहिए. नियमों और मर्यादाओं का पालन जरूर होना चाहिए लेकिन अनावश्यक पाबंदियां विस्फोट और विद्रोह का कारक बन सकती हैं. संचार क्रांति के युग में मिस्र भारत से बहुत दूर नहीं है.

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