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खास रपटः फसल पर फिरा पानी

उत्तर भारत के कुछ शहरों में एक किलो प्याज के दाम 80 रुपए पर पहुंच गए. सरकार के आंकड़े दिल्ली में प्याज की कीमत 57 रुपए प्रति किलो बता रहे हैं. भोपाल में तीन सप्ताह पहले प्याज खुदरा बाजार में 20 रुपए प्रति किलो बिक रहा था.

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aajtak.in
राहुल नरोन्हा नई दिल्ली, 07 October 2019
खास रपटः फसल पर फिरा पानी चढ़ता प्याज महाराष्ट्र की लासलगांव मंडी में ट्रक पर लादा जाता प्याज

यह रुझान हर कुछेक साल में लौट-लौटकर आता है, लेकिन नीति निर्माता कोई सबक सीखते दिखाई नहीं देते. यह सरकारें बना और बिगाड़ सकता है. फिर भी वे इसे नजरअंदाज करते हैं और आखिरकार इसकी कीमत चुकाते हैं. सितंबर के दूसरे सप्ताह से प्याज के खुदरा दाम राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में तकरीबन 100 फीसदी चढ़ गए, जबकि उत्तर भारत के दूसरे शहरों में तो इसमें करीब 300 फीसदी की उछाल आ गई. इसकी मार घरों के बजट पर पड़ी.

सरकार ने इसका जवाब अपने बफर स्टॉक का प्याज बाजार में उतारकर दिया, ताकि यह आसानी से मिल सके. उसने निर्यात रोकने के लिए न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) बढ़ाकर 850 अमेरिकी डॉलर प्रति टन एफओबी (फ्री ऑन बोर्ड) कीमत कर दिया. इतना ही नहीं, 29 सितंबर को केंद्र सरकार ने प्याज निर्यात पर पाबंदी लगा दी और इसे जमा करने की सीमा तय कर दी. केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने आने वाले कुछ दिनों में हालात सामान्य होने की बात कही है. केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान कहते हैं, ''बारिश और बाढ़ से परिवहन में दिक्कत आ रही है. केंद्र सरकार प्याज का बफर स्टॉक जारी कर रही है. जो भी राज्य चाहे, नैफेड से प्याज ले सकता है.''

उत्तर भारत के कुछ शहरों में एक किलो प्याज के दाम 80 रुपए पर पहुंच गए. सरकार के आंकड़े दिल्ली में प्याज की कीमत 57 रुपए प्रति किलो बता रहे हैं. भोपाल में तीन सप्ताह पहले प्याज खुदरा बाजार में 20 रुपए प्रति किलो बिक रहा था. मध्य सप्ताह तक इसकी कीमत छलांग लगाकर 50-60 रुपए प्रति किलो पर पहुंच गई.

प्याज उत्पादक ज्यादातर हिस्सों में भीषण बारिश को दामों में उछाल की मुख्य वजह माना जा रहा है. गोदामों में रखे प्याज को भी मूसलाधार बारिश से नुक्सान पहुंचा है. बाढ़ और जलभराव की वजह से प्याज बाजार में देर से पहुंचा और कीमतें आसमान छूने लगीं.

भारत में साल में दो बार प्याज की पैदावार होती है. मुख्य तौर पर मॉनसून के जाने के बाद अक्तूबर-नवंबर के महीनों में बुआई की जाती है और कटाई शुरू होती है फरवरी में, जो अप्रैल के आखिर तक चलती रहती है. यह फसल चक्र रबी की फसल के साथ आता है और देश के ज्यादातर हिस्सों की प्याज की मांग, तकरीबन 70 फीसदी तक, पूरी करता है. व्यापारी इसी चक्र में उगाए गए प्याज का कुछ हिस्सा जमा करके रख लेते हैं, जिसे वे मॉनसून में बाजार में उतारते हैं जब कीमतें आम तौर पर बढ़ जाती हैं.

प्याज उगाने का इससे छोटा चक्र भी होता है. इसमें प्याज की जल्दी पैदा होने वाली किस्में मध्य भारत और महाराष्ट्र के कई हिस्सों में उगाई जाती हैं. इस चक्र में रोपाई खरीफ सीजन के साथ-साथ की जाती है और उखाडऩे का काम सितंबर में शुरू होता है जो अक्तूबर तक चलता रहता है. इसी दौरान प्याज को महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान और पश्चिमी मध्य प्रदेश में बहुत ज्यादा बारिश की मार सहनी पड़ी है.

मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में प्याज उगाने वाले बड़े इलाके गांधी सागर बांध के डूब क्षेत्र में आ गए. इससे नुक्सान हुआ. मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जैसै कई नेता इलाके का दौरा कर चुके हैं और राहत में सरकारी अमला जुटा हुआ है.

महाराष्ट्र के प्रमुख प्याज उत्पादक जिलों नासिक और अहमदनगर के किसानों के पास केवल 20 प्रतिशत प्याज बचा है. जब तक नया प्याज तैयार नहीं होता तब तक इसी प्याज से काम चलाना होगा जो कि पर्याप्त नहीं होगा. ज्यादा बारिश के कारण इस वर्ष प्याज उत्पादन घटने की आशंका है.

बढ़ते दाम को देखकर केंद्र सरकार के कृषि विभाग के अधिकारी आनन फानन 20 सितंबर को लासलगांव पहुंचे. बाजार में उपलब्ध प्याज और दाम अचानक कैसे बढ़े, इसकी जानकारी लेकर वे अधिकारी चले गए. उनके जाने के चार दिन बाद ही प्याज के दाम प्रति क्विंटल औसतन 450 रुपए गिरकर 3,651 रु. हो गए. सितंबर के पहले दो सप्ताह में दाम प्रति क्विंटल 4,000 रु. थे. केवल एक दिन 19 सितंबर को प्याज के दाम 5,100 रुपए को छू गए थे. नासिक के किसानों ने गर्मी में होनेवाला प्याज ठीक तरह से स्टोर करके रखा था. आवश्यकता और उपलब्धता में 30 से 40 प्रतिशत का फर्क होने के कारण नासिक में उपलब्ध प्याज पर बाजार के दाम तय हो रहे हैं.

लखमापुर के प्याज उत्पादक के.टी. बच्छाव का मानना है कि अगर प्याज की कमी होने के कारण किसानों को कुछ पैसे ज्यादा मिलते हैं तो सरकार को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. ''पिछले वर्ष पूरा सीजन बरबाद हो गया था. हमें एक रुपया भी नहीं मिला. इस वर्ष कुछ पैसे मिल रहे हैं तो सरकार को इससे दूर रहना चाहिए.'' किसानों ने दीवाली तक प्याज के दाम सामान्य होने की संभावना जताई है.

भारत दुनिया में चीन के बाद प्याज का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है. दुनिया का लगभग 20 फीसद प्याज भारत में उगाया जाता है. एपीईडीए या एपीडा के मुताबिक, देश में तकरीबन 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्याज उगाया जाता है. ज्यादातर साल में 1.5 करोड़ मीट्रिक टन उत्पादन होता है. भारत में कई दूसरी फसलों की तरह प्याज की खेती बड़े क्षेत्र में होती है पर उत्पादकता कम है. इंडियन हॉर्टिकल्चर के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में पांच सबसे ज्यादा प्याज उगाने वाले राज्य हैं महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, बिहार और मध्य प्रदेश.

सरकार ने बाजार में दखल के जिन उपायों का सहारा लिया है, उनसे कुछ समय में कीमतों में ठहराव आ सकता है. मगर लंबे वक्त के लिए सरकार को महंगी टेक्नोलॉजी में निवेश करने की जरूरत है ताकि गोदामों में रखे प्याज को कुदरत के कहर से बचाया जा सके. बदकिस्मती से ज्यादातर सरकारों ने महंगी टेक्नोलॉजी में निवेश में दिलचस्पी नहीं दिखाई है, बावजूद इसके कि प्याज कई बार चुनावी नतीजे बदल चुका है. 1998 में विधानसभा चुनाव में दिल्ली और मध्य प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में लौट सकी, तो इसके पीछे प्याज के दामों में उछाल को ही मुख्य वजह बताया जाता है.

इंदौर के एक प्रगतिशील किसान समर विजय सिंह कहते हैं, ''हमने मध्य प्रदेश सरकार को प्याज भंडारण का एक मॉडल दिया है, मगर उसने मंजूर ही नहीं किया.'' विजय सिंह ने 2013-14 में केंद्र सरकार के विज्ञान और टेक्नोलॉजी महकमे को प्रस्ताव दिया था. उसने वह मंजूर कर लिया था और राज्य सरकार से कहा था कि इसे कुछ वित्तीय सहायता दी जाए. विजय सिंह कहते हैं, ''इस प्रोजेक्ट में प्याज के जीनोटाइप या जीन के प्रकारों का पूरा अध्ययन करके उन किस्मों की पहचान करनी थी जिन्हें ज्यादा लंबे वक्त तक जमा करके रखा जा सकता है. भारतीय संदर्भ में ऐसी टेक्नोलॉजी की पहचान की जानी थी जो जमा करके रखे गए प्याज में अंकुर फूटने से रोकती और भंडारण की सुविधाओं की इंजीनियरिंग पर काम करना था.''

टेक्नोलॉजी के अलावा मध्य प्रदेश के कुछ किसानों ने मॉनसून के महीनों के दौरान प्याज सुरक्षित रखने के लिए कुछ सस्ते विकल्प विकसित किए हैं. धार जिले के डेडला गांव के एक किसान रोहित पटेल ने कम लागत का एक भंडारण विकल्प तैयार किया है, जो नुक्सान को बड़ी हद तक कम कर देता है. उन्होंने बताया, ''इसमें जमीन से तकरीबन एक फुट ऊपर लोहे की एक जाली लगाई जाती है. बेकार ड्रमों का एक के ऊपर एक अंबार लगाकर उसके सबसे ऊपर एक ताकतवर एग्जॉस्ट पंखा लगा दिया जाता है.

पंखा चलाने पर हवा ड्रमों से हाकर पूरे कमरे में फैल जाती है और इससे प्याज को भी हवा लगती रहती है.'' पंखे को गर्मियों में रात में 5-6 घंटे और सर्दियों में दिन में इतने ही घंटे चलाना पड़ता है. इस टेक्नोलॉजी से रोहित को अपने नुक्सान को 5 फीसद तक घटाने में मदद मिली, जो प्याज को सीधे जमीन पर रखने पर 30 फीसद हुआ करता था. करीब 10310 फुट के कमरे में, जिसमें 6 टन तक प्याज जमा करके रखा जा सकता है, इस टेक्नोलॉजी को लगाने और चलाते रहने की लागत आती है—5,000 रुपए. इस पर बिजली का खर्च हर महीने 600-700 रुपए आता है.

वैसे प्याज के दामों में गिरावट के अनेक दौर आए हैं. 2017 में मध्य प्रदेश के किसानों को 1 रुपए प्रति किलो जितने कम दाम पर प्याज बेचने की नौबत आ गई थी, जिसके बाद राज्य सरकार ने 8 रुपए प्रति किलो के भाव से प्याज खरीदने का ऐलान किया था. वह दौर पश्चिमी मध्य प्रदेश के किसानों के आंदोलन का भी गवाह बना था, जब पुलिस की गोलीबारी में छह किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी. सरकार ने किसानों से 8 रुपए किलो के भाव से प्याज खरीदा और व्यापारियों को 2 रुपए किलो के भाव से बेचा, जिसके नतीजतन आने वाले महीनों में व्यापारियों ने बाजार में 10-15 रुपए किलो के भाव से प्याज बेचकर मोटा मुनाफा कमाया था.

प्याज के ऊंचे दामों के दौर में भी किसानों को फायदा मिलता दिखाई नहीं देता. भोपाल जिले के टांडा गांव के एक किसान बदामी लाल नायक कहते हैं, ''ज्यादातर किसानों ने गर्मी के महीनों में अपनी फसल मंडियों में बेच दी थी जिसके चलते उनके पास बहुत ही कम स्टॉक बचा है. इसकी जमाखोरी तो ज्यादातर व्यापारी ही कर रहे हैं.'' जाहिर है, सस्ते प्याज के लिए अभी नई फसल का इंतजार करना होगा. —साथ में किरण डी. तारे

नासिक और अहमदनगर जिलों में किसानों के पास केवल 20 प्रतिशत प्याज ही बचा है. नई फसल आने तक इससे काम चलाना कठिन होगा

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