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देश की सबसे ऊंची अदालत की साख पर संकट!

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की बगावत ने देश को दो ध्रुवों में बांटकर भय और आशा-निराशा के भंवर में डाल दिया. क्या इससे सुधार के दरवाजे खुलेंगे या सबसे ऊंची अदालत दागदार होकर रह जाएगी?

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aajtak.in
दमयंती दत्तानई दिल्ली, 24 January 2018
देश की सबसे ऊंची अदालत की साख पर संकट! न्यायपालिका सुप्रीम कोर्ट

यह निर्जन इलाका है. यहां कोई फटक भी नहीं सकता, सुप्रीम कोर्ट के परिसर में जजेज लाउंज काला चोगा पहने 25 जजों का ही क्षेत्र है. वे रोज सुबह 10.15 बजे यहां इकट्ठा होते हैं, चाय पीते हैं और 10 बेशकीमती मिनटों के दौरान उस वक्त के अहम मामलों पर बातचीत करते हैं, फिर रोजमर्रा के कामकाज के लिए अपने-अपने कक्षों में लौट जाते हैं.

अदालत के भीतरी लोग बताते हैं कि यह ऐसा गरिमामय दस्तूर है जिससे जाले तो साफ हो ही जाते हैं, बल्कि देश में इंसाफ का खाका भी तय हो जाता है. वकील तो वैसे भी मन ही मन कल्पना करते होंगे कि काश! वे यहां की दीवारों पर मंडराती मक्खियां बन जाते. वहीं 12 जनवरी के बाद अब पूरा मुल्क उनकी खुसुर-पुसुर सुनने के लिए लालायित है.

सुप्रीम कोर्ट के ऊंचे-गोल स्तंभों पर रखी मेहराबों के भीतर कहीं एक पतला-सा दस्तावेज रखा है—'न्यायिक जीवन में मूल्यों का पुनर्कथन'. यह 1997 में आया था. इसमें कुल 16 सिद्धांत और कसौटियां बताई गई हैं—जज को चुनाव नहीं लडऩा चाहिए, बार के नजदीक नहीं होना चाहिए, परिवार और मित्रों को नहीं सुनना चाहिए, सार्वजनिक बहसों में नहीं पडऩा चाहिए, मीडिया के साथ बातचीत नहीं करनी चाहिए, तोहफे या मेहमाननवाजी स्वीकार नहीं करनी चाहिए, कारोबार, शेयर या स्टॉक में मुब्तिला नहीं होना चाहिए या वित्तीय फायदे लेने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए...

बल्कि उन्हें अलहदा और अलग-थलग रहना चाहिए, क्योंकि हरेक जज लगातार 'आम लोगों की नजर' में होता है. जज होने का कुल लब्बोलुआब यह है कि ''इंसाफ न केवल होना चाहिए बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए.'' अब ये पंक्तियां कुछ ज्यादा ही गूंजने लगी हैं और पूरे देश की नजर उसी ओर लग गई है.

संकट जिसका कोई नाम नहीं

जनवरी की 12 तारीख को, जब देश के चार सबसे सीनियर जजों—न्यायमूर्ति जस्टिस चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ—ने प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की और देश के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) दीपक मिश्र पर सत्ता और अदालत की परिपाटियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया, तो सारा देश हक्का-बक्का रह गया.

चार जजों ने कॉन्फ्रेंस में कम ही कोई अनमोल बात उजागर की, पर एक चिट्ठी में एक गैर-मामूली चेतावनी जरूर दी—कि हिंदुस्तान की सबसे ऊंची अदालत में सब कुछ 'सही नहीं' चल रहा है और इससे लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है.

जजों ने एक 'बिना तारीख की' चिट्ठी बांटी जिसमें सीजेआइ के खिलाफ गड़बड़ी के कोई ठोस आरोप नहीं लगाए गए, न ही इसमें किसी निश्चित फैसले की आलोचना की गई. इसके बजाए, इसमें यह आरोप लगाया कि तमाम पीठों को—जो वरिष्ठता पर बहुत ज्यादा जोर देती हैं—मामले सौंपने में पारंपरिक प्रक्रियाओं को तोड़कर प्रधान न्यायाधीश वह होने दे रहे हैं जिसे इन चार जजों ने 'संस्था की ईमानदारी पर सवाल' खड़े होना कहा है.

कइयों के लिए यह 'स्वागतयोग्य' कदम था, तो कुछ को कतई 'नामंजूर' था. इसके नतीजतन हुए विरोध प्रदर्शनों ने देश को दो ध्रुवों में बांट दिया और डर और उम्मीद दोनों को बढ़ा दिया. डर इस बात को लेकर कि न्यायिक अंतर्कलह और चिंताजनक आरोप सबके सामने खुले में आ गए हैं जो पहले मुश्किल से ही कभी हुआ होगा.

और उम्मीद यह कि इससे न्यायपालिका में आखिरकार नए सुधारों और कहीं ज्यादा पारदर्शिता के दरवाजे खुल जाएंगे. देश भर में तीखी बहसें छिड़ गई हैं और आरोप-प्रत्यारोप के खेल शुरू हो गए हैं—आखिर कौन सही है, कौन गलत है?

इनके दोनों छोरों पर विचारधाराएं भी हैं और पार्टियां भी. इसने हिंदुस्तान को एक भरे-पूरे संकट की जद में धकेल दिया है, क्योंकि संविधान में इस किस्म की स्थिति से निबटने के लिए न तो कानून हैं और न परंपराएं. तमाम नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सुप्रीम कोर्ट में अब आगे क्या होता है—क्या वहां कोई संधि या युद्धविराम होगा और अमन-चैन की शुरुआत होगी? क्या उथल-पुथल और कठोर भावनाएं कायम रहेंगी? क्या काले चोगे वाले बंधु-सखा साथ मिलकर विचार-विमर्श करेंगे और यह पक्का करेंगे कि सुप्रीम कोर्ट की वैधता दागदार न हो?

बेपरदा और खुले में

रहस्यों में घिरी और सत्ता के रौब-दाब से लैस सबसे अव्वल जजों की दुनिया मुश्किल से ही कभी रोशनी में आती है. वे फौरन पहचानी जा सकने वाली मीडिया शख्सियतें नहीं हैं, उन तक आसानी से नहीं पहुंचा जा सकता. अदालत के कमरों में टीवी कैमरे और सेलफोन लेकर आने की इजाजत नहीं है.

सियासतदानों के उलट वे सोशल मीडिया से दूर ही रहते हैं. उनकी शानदार प्रतिष्ठा की कुछ वजह यह भी हो सकती है कि उन्हें 'चोगा पहने सियासतदानों' के तौर पर नहीं देखा जाता. पूर्व सीजेआइ आर.एम. लोढ़ा कहते हैं, ''उन्हें वहां टीवी पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस तरह देखना, मेरे लिए यह दुखद तजुर्बा था.

उनमें से सभी कभी न कभी मेरे साथ पीठ में आसीन हुए हैं.'' उनके लिए चार जजों का विरोध बताता है कि ''अगर चार जज इस तरह महसूस करते हैं, तो आम वादी-प्रतिवादी क्या महसूस करते होंगे?'' वे कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट अधिकारों का रक्षक है, अकेली संस्था जो राज्यसत्ता के दूसरे अंगों को संतुलित करती है, संविधान की अंतिम तौर पर व्याख्या करती है, राज्यसत्ता की ताकत के खिलाफ हमारे सबसे कमजोर नागरिकों के अधिकारों की हिफाजत करने वाली, जहां सबसे आला दर्जे के, सबसे ज्यादा विवादों से घिरे और सबसे ज्यादा सियासी मामलों पर फैसले दिए जाते हैं.

सभी नजरें अदालत पर

सुप्रीम कोर्ट में, या कम से कम उसके कुछ हिस्सों में, सामान्य कामकाज फिर अपने ढर्रे पर लौट आया है. सुबह 9.30 बजे से वकील और वादी-प्रतिवादी, अदालत के तमाशबीन और अफसर-कारिंदे अदालत के कमरों में हमेशा की तरह जुटने लगते हैं—यहां एक दिन में कोई 8,000 से ज्यादा लोगों के कदम पड़ते हैं. 10.30 बजे जब बेलिफ या अदालत के नाजिर श्सब खड़े हो जाएं'' का ऐलान करते हैं, न्यायमूर्ति अदालत कक्षों की विनम्र शालीनता के साथ मामलों की सुनवाई शुरू करते हैं, जो एक दिन में आम तौर पर 60 से ऊपर तक होते हैं.

12 जनवरी के बाद भी उन्होंने मुखौटा सरकने नहीं दिया है. अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने 15 जनवरी को कहा, ''अब सब कुछ तय हो चुका है. अदालतें काम कर रही हैं. यह चाय के प्याले में तूफान था.'' लेकिन अगले ही दिन उन्होंने कड़े मन से स्वीकार किया, ''मामला अनसुलझा-सा लगता है.''

सीजेआइ मिश्र ने कोई बयान नहीं दिया. लेकिन पिछले नवंबर में जब बतौर 45वें प्रधान न्यायाधीश उनके चार महीने के कार्यकाल में एक मेडिकल कॉलेज के रिश्वत के मामले में आला जजों और तेजतर्रार जनहित याचिका वकीलों के बीच अप्रत्याशित तकरार छिड़ी तब उन्होंने अदालत में कहा था, ''ये आरोप इस महान संस्था को दागदार बनाने की साजिश के तहत उछाले जा रहे हैं. इससे व्यवस्था पर छींटे पड़े हैं और अब हर कोई सुप्रीम कोर्ट पर संदेह करेगा, वह भी एक अटकल के आधार पर. इसकी भरपाई हम कैसे करेंगे?''

इसका एक उपाय प्रशासकीय सुधार हो सकता है. सीजेआइ मिश्र को अपने कार्यकाल में 10 जजों की नियुक्ति करनी है. सुप्रीम कोर्ट में 31 जजों के पद हैं, लेकिन अभी 25 जज ही हैं. नरेंद्र मोदी सरकार जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया के अंतिम दस्तावेज पर कुंडली मारे बैठी है.

24 हाइकोर्ट 672 जजों के सहारे चल रहे हैं जबकि 407 जजों के पद रिक्त हैं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट केरिकॉर्ड से पता चलता है कि सीजेआइ मिश्र केकार्यकाल में लंबित मामलों की संख्या घटी है. सितंबर-अक्तूबर 2017 में 2,174 मामले घटे हैं. इसी दौरान यह भी देखा गया कि सीजेआइ की अदालत में एक दिन में 100 से ज्यादा मामले निबटाए गए और अदालत शाम 4 बजे चलती रही.

सर्वोच्च अदालत में लंबे वक्त से खदबदाता तनाव पहली बार पिछले नवंबर में भी खौलकर बाहर आ गया था, जब सीजेआइ पर मेडिकल कॉलेज घोटाले से जुड़े एक मामले में गलत रुख अपनाने का आरोप लगाया गया था और जिसमें हाइकोर्ट के पूर्व जज को सुप्रीम कोर्ट के जज को रिश्वत की पेशकश करते बताया गया था.

यह वह मामला था जिसे वह खुद देख रहे थे. हालांकि उनके ऊपर रिश्वत लेने का आरोप नहीं था, पर सीनियर वकीलों ने बार-बार दखल देने और मामले की सुनवाई केवल उनके पसंदीदा जजों को ही करने देने के लिए सीजेआइ की तीखी आलोचना की थी.

सीजेआइ मिश्र के नाम लिखे गए पत्र में चार जजों ने कहा, ''ऐसे भी दृष्टांत रहे हैं जिनमें देश और संस्था के लिए दूरगामी नतीजों वाले मामले इस अदालत के प्रधान न्यायाधीश ने चुनिंदा ढंग से ''अपनी पसंद की'' पीठों को सौंपे थे, जबकि इन्हें सौंपे जाने के पीछे कोई विवेकसंगत तर्क नहीं था. इसके खिलाफ हर कीमत पर सतर्कता बरती ही जानी चाहिए.''

जजों की चिट्ठी में उस मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर (एमओपी) का भी जिक्र है जो 2015 में एनजेएसी के फैसले के बाद बनाया गया था. इसके केंद्र में सवाल यह थाः जजों को जज कौन करेगा? उस साल 16 अक्तूबर को 31 दिनों की मैराथन सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों—न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर, जे. चेलमेश्वर, मदन बी. लाकुर. कुरियन जोसेफ और ए.के. गोयल—ने 99वें संविधान संशोधने अधिनियम 2014 और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम 2014 को असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया था.

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों और हाइकोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की 'कॉलेजियम प्रणाली' को सक्रिय घोषित कर दिया गया था. दो हिस्सों वाले इस फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि केंद्र सरकार सीजेआइ तथा कॉलेजियम के अन्य सदस्यों के साथ सलाह-मशविरा करके एमओपी को अंतिम रूप देगी.

यह इसका प्रभावी हिस्सा था, जिसमें पारदर्शिता की बात कही गई थी और यह भी कि सुप्रीम कोर्ट के प्रस्तावित कुछ नामों को सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा की बिना पर खारिज कर सकती है या नहीं.

लंबी समझौता वार्ताएं हुई थीं और उनके बाद ही न्यायमूर्ति खेहर की अगुआई में कॉलेजियम ने इसे अंतिम रूप दिया था. सरकार को इसे केवल प्रकाशित करना था, मगर उसने ऐसा नहीं किया, जिससे तमाम न्यायिक नियुक्तियां ठप पड़ गईं और इससे अदालतों पर मुकदमों के बोझ और तनाव में और भी इजाफा हो गया, जैसा कि चार जजों की चिट्ठी कहती है.

इन दो आरोपों की व्याख्या करते हुए कानूनी अध्येता उपेंद्र बख्शी कहते हैं, चेलमेश्वर और तीन अन्य बंधुओं ने संवैधानिक परिपाटी का नजरिया अपनाया है कि सीजेआइ मनमाने ढंग से वरिष्ठता को नजरअंदाज नहीं कर सकते. वे सवाल करते हैं, ''क्या सीजेआइ इस परिपाटी का विरोध करेंगे?'' एक बार फिर, सीजेआइ और कॉलेजियम ने मार्च 2017 में एमओपी को अंतिम रूप दिया था और इसे केंद्र को भेज दिया गया था.

चार जजों ने कहा है कि आप इतने अहम मामले को लटकाकर नहीं रख सकते—आपको तय करना ही चाहिए. या फिर कॉलेजियम बुलाएं और उसे तय करने दें. बहुत सारा वक्त गुजर चुका है. उन्होंने स्मरण पत्र भी भेजे. बख्शी कहते हैं, ''तो यही अगला चरण है.

यह सुझाव दिया गया है कि अगर एमओपी पर आखिरी फैसला नहीं लिया जाता है, तो उन्हें सरकार की खामोशी को उसकी सहमति मान लेना चाहिए. सरकार को इत्तिला दे दी गई है, सुप्रीम कोर्ट को अब एमओपी उसकी जगह स्थापित कर देना चाहिए.'' क्या सीजेआइ ऐसा करेंगे?

आला जजों की टकराहट

क्या यह अहं के टकराव से कुछ ज्यादा का मामला है? सुप्रीम कोर्ट में सीजेआइ और वरिष्ठ जजों के बीच टकराव का पुराना इतिहास रहा है. 1980 के दशक में तत्कालीन सीजेआइ वाइ.वी. चंद्रचूड़ और दूसरे नंबर के वरिष्ठ जज पी.एन. भगवती के बीच विचारधारा की टकराहट अक्सर खुलकर बाहर आ जाती थी.

सुप्रीम कोर्ट के वकीलों को न्यायाधीश सैम पिरोज भरूचा और ए.एस. आनंद के बीच टकराहटों की भी याद है, जो 2002 में उनकी जगह सीजेआइ बनने वाले थे.

जानकार बताते हैं कि पारदर्शिता पर टकराहटें सीजेआइ टी.एस. ठाकुर के दौर में शुरू हुईं. एनजेएसी मामले में इकलौते असहमति वाले जज जे. चेलमेश्वर कॉलेजियम व्यवस्था में कुछ पारदर्शिता चाहते थे. अगस्त 2016 में कॉलेजियम ने केरल हाइकोर्ट के जज दमा शेषाद्रि नायडू की अपने गृह राज्य आंध्र प्रदेश में तबादले की अर्जी पर फैसला टाल दिया (क्योंकि न्यायमूर्ति चेलमेश्वर के वकील बेटे से उनके पेशागत रिश्ते रहे थे और वे मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडु के भी करीबी थे) तो चेलमेश्वर ने अपने को कॉलेजियम की बैठक से हटा लिया था लेकिन वे कमरे से बाहर नहीं गए थे जिससे इस मामले में फैसला लटका रहा था.

सितंबर 2016 में उन्होंने जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता की कमी पर सीजेआइ ठाकुर को तीन पन्नों की चिट्ठी लिखी, जो किसी तरह बाहर आ गई थी. अक्तूबर 2016 से चेलमेश्वर सीजेआइ समेत चार जजों के साथ जजों की नियुक्ति केमामले में नहीं बैठ रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट के सूत्रों का कहना है कि सीजेआइ ने कॉलेजियम की बैठक में शिरकत के लिए चेलमेश्वर को पत्र लिखा मगर उन्होंने इनकार कर दिया. असल में कॉलेजियम की बैठकों में न जाना एक चलन बन गया है. चेलमेश्वर बैठक के जारी मिनिट्स पर अलबत्ता टिप्पणी करते रहे हैं. यही सीजेआइ खेहर के दौर में भी जारी रहा.

फरवरी 2017 में उन्होंने उत्तराखंड के मुख्य न्यायाधीश के.एम. जोसफ को सुप्रीम कोर्ट में न लिए जाने पर विरोध किया था. जस्टिस जोसफ ने ही 2016 में उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन को खारिज कर दिया था. अक्तूबर 2017 में जब चेलमेश्वर कॉलेजियम में दूसरे वरिष्ठ जज बन गए तो यह फैसला किया गया कि कॉलेजियम की नियुक्ति और दूसरी सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाएगा.

आगे की राह

समाधान के तरीके बताए जाने लगे हैं. हालांकि ये अभी शुरुआती चरण में ही हैं. यहां कुछ विशेषज्ञों से बात करके हमने इस मसले पर उनकी राय जुटाई है. जितना जल्द इन पर अमल हो, उतना बेहतर.

आर.एम. लोढ़ा कहते हैं, ''अगर सीजेआइ और उनके साथी जस्टिस साथ में बैठ जाते तो इसका हल निकल आता. मैं प्रधान न्यायाधीश रहा हूं और मैं आपको बताता हूं कि आपके साथी जज आपके परिवार के सदस्य की तरह होते हैं. अगर मुद्दे उठते हैं तो उन पर विचार करके उनका हल निकालना चाहिए.'' अगर सर्वोच्य अदालत के जज एक नजिरए के साथ संवैधानिक फैसला दे सकते हैं तो ये मामले क्यों नहीं हल कर सकते?

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